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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 541, कुल 766 में से

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पृष्ठ 541

छूटे । या माया कैसीहै काहूको तौ सुखदहै काहू कैति उदास है। कहे
उनको स्पर्शनहीं करिसकैहै । अर्थात् जे साहब को जानैहैं तिनकी कैति उदासहै
तिनहींके दास तुम्हूं होउ तब उबार होइगो माया ब्रह्मजीवके परे श्रीरामच-
न्द्रही हैं तामें प्रमाण ॥ “ राम एव परं ब्रह्म राम एव परंतपः। राम एव परंतत्त्वं
श्रीरामो ब्रह्म तारकं ” इतिश्रुतेः ॥ ४ ॥
इति आठवां बसन्त समाप्त ।
अथ नवां बसन्त ॥ ९ ॥
ऐसो दुर्लभ जात शरीर । रामनाम भजु लागै तीर ॥ १ ॥
गये वेणुं वलि गेहैं कंस । दुर्योधन गये बूड़े बंस ॥ २ ॥
पृथु गयै पृथवी के राव । विक्रम गये रहे नहिंकाव ॥ ३ ॥
छौ चकवे मंडलीके झार । अजहूं हो नर देखु विचार ॥४॥
हनुमत कश्यप जनकौ वार । ई सब रोंके यमके धार ॥५॥
गोपिचंद भल कीन्हों योग । रावण मरिगो करतै भोग॥६॥
जात देखु अस सबके जाम । कह कबीर भजु रामै नाम॥७॥
चौरासी लाख योनिनमें भटकत भटकत यह शरीर पायो दुर्लभ सो वृथाही
जायहै सो राम नामको भजु सेवा करु जाते तीर लगै । छौ चकवे कहिये १ वेणु
२ बलि ३ कंस ४ दुर्योधन ५ पृथु ६ विक्रम ये छवो चक्रवर्ती भूमिमंडल के, ते शरीर
छोड़िकै जातभये। सो हे नर अजहूं विचारिकै तू देखु औ हनुमत कश्यप अदिति जनक
कहे ब्रह्मा, बार कहे सनकादिक ते ये अबलौं रामनाम कहि यमको धाररोकेंहैं ।
अर्थात् जे उनके मतमें जाय रामनाम कहैंहैं ते संसारते छूटिही जायँहैं उनपै यम-
को बल नहीं चलैहै । औ गोपीचन्द योगिरहे रावण भोगिरह्यो पै रामनाम
नहीं भजे ते दोऊ मरिगये सो श्री कबीरजी कहै हैं कि याही भांति
१ अन्य प्रतियों में वेणुके स्थानमें विष्णु लिखाहै ।
२ दूसरी प्रतियोंमें धारकी जगह द्वार लिखाहै ।