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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 540

( ४९४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ आठवां बसन्त ॥ ८ ॥
कर पल्लवके बलखेलैनारि।पण्डित जो होयसोलेइविचारि १
कपरा नहिं पहिरै रह उघारि।निरजीवै सो धनअतिपियारि२
उलटी पलटी बाजै सो तार।काहुहि मारै काहुहि उवार॥३॥
कह कबीर दासन के दास।काहुहि सुख दे काहुहि उदास४॥
कर पल्लवके बलखेलैनारि।पण्डित जो होयसोलेइविचारि १
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, नारि जो माया सो पल्लव जो राम नाम सो
करमें लैके वाहीके बल खेलैहै । जब प्रथम यह जगत् की उत्पत्ति भई तब
राम नाम लैके बाणी निकसी है तामें प्रमाण ॥ “ रामनामलैउचरीबाणी ॥ ”
ताही जगत मुख अर्थ में चारिउ वेद ईश्वर ब्रह्म सब संसार निकसेहैं तामें
प्रमाणसायरको ॥ “ रामनामके दोई अक्षर चारिउवेद कहानी ” ॥ सो तौनेहीके
बलते सबसंसार बांधि लियोहै । सो जो कोई पंडित होइ सो बिचारिकै लैलेइ ।
जगत्मुख साहब मुख यामें दोऊ अर्थ हैं सो साहब मुख अर्थ रामनाममें लेइ
जगत्मुखअर्थ केवल माया खेलैहै ताको छोड़िदेइ ॥ १ ॥
कपरा नहिं पहिरै रह उघारि।निरजीवै सोधन अति पियारि२
उलटी पलटी बाजै सो तार । काहुहि मारै काहुहि उवार ३॥
सो वा नारि माया कैसी है कि कपरा नहीं पहिरै उघारही रहै है अर्थात
वह माया सबको मूंदेहै वाको मूंदनवारो कोई नहीं है । जो कहो वाको ब्रह्म
मूंदे होइगो तौ निर्जीव जो ब्रह्म सो धन जो माया ताको अति प्यारहै
अर्थात् वाहूको सबलित कियेहै ॥ २ ॥ औ पुनि कैसीहै कि उलटी पलटी
तार बाजैहै कहे काहूको अविद्यामें डारिकै नरकदेइहै औ काहूको विद्यारूपतें
स्वर्ग सत्यलोकादि देइ है ॥ ३ ॥
कह कबीर दासनके दास।काहु सुख दै काहू उदास॥४॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि, दासनके दास कहे ब्रह्मादिक जे माया के
दास तिनहूंके दास जीव तुम्हारी माया कैसे छूटे वे ब्रह्मादिकै मायाते नहीं