जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
गुरु और शब्द महिमा । ७६
किरपा करि निरबाह करन कहँ,
अवसर भल इह पायो ॥ २ ॥
हूक चूक होत मन मोरे,
जब तब रहि बिसरायो ।
अब निःसंक नाहिं डेर लागत,
जब तें मंत्र सिखायो ॥ ३ ॥
अजपा जपि चढ़ि गयो गगन कहँ,
सतगुर दरस दिखायो ।
जगजीवन बिस्वास बास मे,
चरनन सीस लगायो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
मैं देख्यों निरखि निहारि मूरति पर वारी ॥टेक॥
भा बिस्वास पास बासा करि,
दुनिया सकल बिसारी ।
चमकत दृष्टि बरनि नहिं आवै,
बिनु दीपक उजियारी ॥ १ ॥
नीर पिंड बिनु रूप बिराजत,
रबि ससि की छबि वारी ।
अस निर्गुन निर्बान अमूरति,
सिव बिरंच लाये ताड़ी ॥ २ ॥
सब्द कहत अस प्रगट पुकारे,
बिरले कोउ जन लेहिं बिचारी ।
जगजीवन के सतगुरु समरथ,
सीस ताहि के चरनन वारी ॥ ३ ॥
८०
जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ३१ ॥
चरनन में लागी रहिहौं री ॥ टेक ॥
और रूप सब तिरथ बतावै,
जल नहिं पैठ नहैहौं री ।
रहिहौं बैठि नयन तें निरखत,
अनत न कतहूँ जैहौं री ॥ १ ॥
तुम्हों तें मन लाइ रहिहौं,
और नहीं मन अनिहौं री ।
जगजीवन के सतगुरु समरथ,
निर्मल नाम गहि रहिहौं री ॥ २ ॥
॥ शब्द ३२ ॥
सुरति बसी मन नाम फिरत मतवारी ॥ टेक ॥
चित तौ लाग्यो अपने पिय सों,
डग मग पाँव न जात सँभारी ।
अंतर देखि चुपाइ रहिउँ मैं,
सूरति तुम्हरी रहिउँ निहारी ॥ १ ॥
सूरति पर मूरति वह साँची,
सो मैं रहि हौं नाहिं बिसारी ।
जगजीवन सतगुरु कै मूरति,
सो मैं रहिउँ सँभारी ॥ २ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
बनत न कतहूँ अनत न जाय ।
देखहु चरन सरन ठहराय ॥ १ ॥
नीचे तकत ऊँचे काँ जाय ।
गगन मंडल माँ तब ठहराय ॥ २ ॥
गुरु और शब्द महिमा। ८१
बिन कर चरन पकरि कस जाय।
सिर नहिं माथ रहै लपटाय ॥ ३ ॥
स्त्रवन बिहूना सुनि धुनि आय।
नैन बिहून दरस तकि पाय ॥ ४ ॥
जगजीवन अस मत जेहिं आय।
मिलि सत मत तब सिद्ध कहाय ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
साधौ कहै तौ कहा न जाय।
आपन घर मत कोइ न बूझै,
हमहिं कहै समुझाय ॥ १ ॥
पंडित जोगी दंडी तपसी,
बहु बिबाद करैं धाय।
नाहिन नाम की ओर गही तिन्ह,
तीरथ बर्त लौ लाय ॥ २ ॥
नाहिन काहू जीत कहाँ लहि,
कहँ लहि कहै समुझाय।
करै जाइ तस जेहिं जस भावै,
भुग्तै तैसे आय ॥ ३ ॥
बिरला कोई भजन करतु है,
चाल चलै दिनताय।
जगजीवन सतगुरु की मूरति,
चरन रहे लपटाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
महिमा प्रभु मो सों वरनि न जाय ॥ टेक ॥
अनहद बानी मूरति बोलै, सुनहु संत चित लाय।
अनहद ताल पखावज बाजै, तहाँ सुरति चलि जाय ॥ १ ॥
अवर न रूप कहाँ लहि बरनों, सब छवि रहे समाय।
जगजीवन साँई कहँ लहि बरनौ, रहे चरन चितलाय ॥ २ ॥
॥ शब्द ३६ ॥
तीरथ ब्रत की तजि दे आसा।
सत्त नाम की रटना करि कै,
गगन मँडल चढ़ि देखु तमासा ॥ १ ॥
ताहि मँदिल का अंत नहीं कछु,
रबी बिहून किरिन परगासा।
तहाँ निरास वास करि रहिये,
काहे क भरमत फिरै उदासा ॥ २ ॥
देउँ लखाय छिपावहुँ नाहीं,
जस मैं देखेउँ अपने पासा।
ऐसा कोऊ सब्द सुनि समुझै,
कटि अघ कर्म होइ तब दासा ॥ ३ ॥
नैन चाखि दरसन रस पीवै,
ताहि नहीं है जम की त्रासा।
जगजिवन दास करम तेहि नाहीं,
गुरु के चरन करै सुख बिलासा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३७ ॥
चलु चढ़ौं अटरिया धाई री।
महल म टहल करै नहिं पाई,
करिये कौन उपाई री ॥ १ ॥
यहँ तौ बैरी बहुत हमारे,
तिन तें कछु न बसाई री।
पाँच पचीस निस दिन संतावहिं,
राखा इन अरुझाई री ॥ २ ॥
गुरु और शब्द महिमा । ८६
साँई तो निकट बैठि सुख बिलसहि,
जोतिहि जोति मिलाई री ।
जगजीवन दास अपनाय लेहिं वै,
नाहीं जीव डेराई री ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३८ ॥
नाम बिनु केहि काम का कह जीवनं संसार ॥ टेक ॥
आपनो जग कहत आहै कठिन माया जार ॥ १ ॥
लाग धागा गरे बाँधे नाहिं छूटनहार ॥ २ ॥
दास बास विस्वास जगतं निरखि रूप निहार ॥ ३ ॥
जगजीवन कोइ अहँ बिरले उतरि होवैं पार ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३९ ॥
नाम रटि रटत त्रकुटी गगन चढ़ि आयउँ ॥ टेक ॥
मैं तैं पचीस पाँच डोरि एक लायउँ ।
मैं तौ रँग संग भयो सीस ताहि नायउँ ॥ १ ॥
सतगुरु से पाय भेद जगत नाहिं आयउँ ।
मिटेव अँधकार, ज्यों भानु भे प्रकास,
निरखि दृष्टि आयउँ ॥ २ ॥
जुगति किये रहै ऐसी प्रगट सो बतायउँ ।
जगजीवन दास अम्मर भे जुग जुग जस गायउँ ॥ ३ ॥
॥ शब्द ४० ॥
भक्त जक्त त्यागि जागि लागि बरन रहु रे ॥ टेक ॥
जग प्रसंग ध्यान भंग जानि हानि तजु रे ।
रहु इकंत तंत१ लागि जानि नाम गहु रे ॥ १ ॥
पाँच औ पचीस डोरि पोढ़ि बाँधि रहु रे ।
साधि चित्त निश्च भाव चरनन गुरु परु रे ॥ २ ॥
(१) तत्व ।
८४ जगजीवन साहब की बानी
रहि निहारि निरखि रूप अनत नाहिं टरु रे ।
जुक्ति जोग भक्ति का उपदेस ऐसे करु रे ॥ ३ ॥
पाय खा अघाय अमी जुग जुग नहिं मरु रे ।
जगजिवन दास आस राखु नाहिं फाँस परु रे ॥ ४ ॥
कर्म भर्म निषेध और उपदेश सतगुरु व शब्द भक्ति का ।
॥ शब्द १ ॥
हे मन थकहु तो तकहु निसान ।
बैठहु मंडफ लाय धुनि धुनो, अनत करु न पयान ॥ १ ॥
पाँच पचीस लगाय धागा, बाँधि रहु ठहरान ।
नैन दरसन नीर पीवै, चाखि भे मस्तान ॥ २ ॥
नाहिं दुख सुख पवन पानी, नाहि ससि नहिं भान ।
नाहिं ब्रह्मा सिवं सक्ती, निर्गुनं निरवान ॥ ३ ॥
दियो दुइ कर सीस चरनन, नाहिं भावै आन ।
जगजीवन ते भये गुरमुख, अमर जोग दृढ़ान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
कर न सुमिरिनी लेहु, अंतर धुनि लावहु रे ।
मैं तैं माला डारि देहु, तुम दीन लीन ह्वै गावहु रे ॥ १ ॥
जो मनुवाँ करि खाक रहहु, वहि काहेक लगावहु रे१ ।
चंदन चरन टेक रहु निर्भय, काहेक भौजल आवहु रे ॥ २ ॥
एहु उपदेस कहि तुमहिं सुनावहुँ, मन अँदेस बिसरावहु रे ।
जगजीवन दास निहारि निरख कै, सुरति म सुरत मिलावहु रे ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३ ॥
साँई मोहिं सब कहत अनारी ।
हम कहँ कहत अजान अहँ यह, चतुर सबै संसारी ॥ १ ॥
( १ ) जब मन को खाक कर डाला तो भभूत लगाने का क्या काम है ।
कर्म भर्म निषेध। ८५
अहै अभेद भेद नहिं जानत, सिखि पढ़ि कहत पुकारी।
देखि करत सो आवत नाहीं, डारिन यजन बिगारी ॥ २ ॥
कहा कहौं मन समुझि रहत हौं, देख्यौं दृष्टि पसारी।
समुझाये कोइ मानत नाहीं, कपट बहुत अधिकारी ॥ ३ ॥
बिरले कोइ जन करत बंदगी, मैं तैं डारत मारी।
जगजीवन गुरु चरन सीस दै, निरखत रूप निहारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
संत कह्यौ रमज१ से बानी।
तत्त सार बताय दीन्ह्यो, काहू भेद न जानी ॥ १ ॥
बहुतक अंधे बंधे माया, आहहिं गर्व गुमानी।
समुझाये जे समुझत नाहीं, होइहि तिन की हानी ॥ २ ॥
साधन की गति कहि नहिं आवै, केहि मुख कहौं बखानी।
जगजीवन चरनन तें लागे, निरखि जोति निर्बानी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५ ॥
दुनियाँ हमहिं सिखावत ज्ञान।
आपु तौ भवजाल भूले, हमहिं कहैं हैवान ॥ १ ॥
गुणन तें मन गूंथि करि कै, करत प्रगट बखान।
नाहिं बूझत सूझ नाहीं, लागि नहिं हिय बान ॥ २ ॥
धाइ धाइ सिखाइ औरै, दोऊ भरम भुलान।
करत अहिं अस देखि नैनन, प्रगट भाखौं ज्ञान ॥ ३ ॥
बहुत फूलि कै भूलि परि हाँहिं, होइ है नुकसान।
जगजीवन जानत अहै सब, नाहिं कछू छिपान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
साधौ नाम भजन जिन ठाना।
केतौ कोइ समुझाय सिखावत,
मनहिं न आवत आना ॥ १ ॥
(१) भेद।
८ जगजीवन साहिब की बानी
तीरथ ब्रत और दान तपस्या,
नाहीं एकौ माना।
सब बिसराइ मनहि नहिं आवत,
ध्यान धरै निर्बाना ॥ २ ॥
निरखत निर्मल जोति सदा वै,
तज दिये पानि१ पखाना२।
तस आचार बिचार हैं उनके,
काहू गति नहिं जाना ॥ ३ ॥
सतगुरु पासहिं बास किहे हहिं,
नाहीं और तेवाना३।
जगजीवन गुरु चरनन लागे,
आपुहिं करै निभाना४ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
साधौ बिन किरपा भक्ति न होय।
रात दिन जो करै बंदगी, कबूल परै नहिं सोय ॥ १ ॥
जज्ञ जान उदान५ बास करै, कंदमूरि भखि सोय।
बरत रहै अस्नान तीरथ, भक्ति तबहुँ न होय ॥ २ ॥
पढ़ै चारौ बेद बिद्या, ज्ञान कबिता होय।
मौन ह्वै कै लाय तारी, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ३ ॥
काया कासी जाय कल्पै, डारि सर्बस खोय।
द्वारिका भुज लेय छापा, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ४ ॥
मुड़ाइ मूड़ औ पहिरि माला, भ्रमत फिरै सब कोय।
धीच६ तूरै करि तपस्या, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ५ ॥
(१) पानी। (२) पत्थर। (३) फ़िक्र।' (४) निबाह। (५) पाँच मुख्य पवन
में से शरीर की स्थिति है यह हैं-प्रान, अपान, व्यान, उदान, समान। (६) प्राणायाम
कर्म भर्म निषेध । ८७
पाँच अगिन तन दहि भूल भूला, पवन भच्छै सोय ।
बाँह तूरै रहहि ठाढ़े, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ६ ॥
लाइ अंग बिभूति जोगी, नारि रत नहिं होय ।
तजै माया मुलुक सर्बस, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ७ ॥
कृपा भै दिनताइ आई, सुमन मन भा सोय ।
जगजिवन डोरी लाय पोढ़ी, रह्यो चरन समोय ॥ ८ ॥
॥ शब्द ८ ॥
साधौ नाम चाखि बौराना ॥ टेक ॥
लागे रहें चरन तें निसि दिन, भावै और न आना ।
तजो अचार बिचार जगत को, सब तें रहि बिलगाना ॥ १ ॥
उन कै गति कोउ जानत नाहीं, को करि सकै बखाना ।
मरि कै अमर भये हैं सोई, भये हैं सिद्ध निमाना ॥ २ ॥
हेत आस नहिं राखै काहू, गुरु निरखहिं निरबाना ।
जगजीवन वै सांई मिलिगे, परगट करहुँ बखाना ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६ ॥
साधौ देखहु अंतर माहीं ।
भाँवरि भवन दिहे रहि रहिये,
अवर अहै कछु नाहीं ॥ १ ॥
बड़ बिस्तार अहै काया का,
अंत खोज कछु नाहीं ।
जिन खोजा पाया काया महँ,
बहुतेक भर्म भुलाहीं ॥ २ ॥
पाँच पचीस डोरि बसि करिये,
बत्तु गुरु अहै ताहीं ।
जगजीवन निर्बानी मूरति,
मिलिगे सूरत माहीं ॥ ३ ॥
॥ शब्द १० ॥
बहुतक देखी देखा करहीं।
जोग जुक्ति कछु आवै नाहीं,
अंत भर्म महँ परहीं ॥ १ ॥
गे भरुहाइ१ अस्तुति जेइ कीन्हा,
मनहिं समुझि ना परई।
रहनी गहनी आवै नाहीं,
सब्द कहे तें लरई ॥ २ ॥
नहीं बिबेक कहै कछु औरै,
और ज्ञान कथि करई।
सुझि बूझि कछु आवै नाहीं,
भजन न एकौ सरई ॥ ३ ॥
कहा हमार जो मानै कोई,
सिद्धि सच चित धरई।
जगजीवन जो कहा न मानै,
झार२ जाय सो परई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ११ ॥
साधौ भक्ति सहजहि ध्यान ।
मनहिं ब्यापत साँचु नाहीं, कहा प्रात अस्नान ॥ १ ॥
कहा कंठी कंठ बाँधे, सैल्हि मुद्रा कान ।
कहा माला लै सुमिरनी, हिये नहिं पहिचान ॥ २
ठाढ़ बैठे घोंच तूरहिं, तकत हैं असमान ।
वृथा सब परतीत बिनु है, भ्रम भूले हैवान ॥ ५ ॥
खोज काया करहु थिर मन, त्यागि कपट सयान ।
भजहु अंतर नाम वाहै, राम सत्त प्रमान ॥ ६ ॥
लाउ रसना नाहिं बिसरै, प्रगट करु न बखान ।
जगजीवन बिस्वास निरमल, होहु जैसे भान ॥ ७ ॥
॥ शब्द १२ ॥
बौरे मन को नहिं भरमाव ।
तीन लोक के करता साँई, ताहि सों ध्यान लगाव ॥ १ ॥
तीरथ कोटि साज जिन कीन्हेउ, सो संतन हिये आव ।
चढ़ि कै गगन देखु सूरति को, ताहि काँ सीस नवाव ॥ २ ॥
सूरति सत्त प्रेम रस पानी, ताहि में चित अन्हवाव ।
अमर होहु भवसागर उतरहु, नहिं आवहु नहिं जाव ॥ ३ ॥
सतगुरु सत्त कहा यहि बानी, अलख नाम धुनि लाव ।
जगजीवन साहब को छबि में, आपनि सुरति समाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मन गृह ग्राम यह अस्थान ।
सात दोप नव खंड पृथ्वी, सिर उर तेहि माँ जान ॥ १ ॥
तीनि लोक बिस्तार है तेहिं, रमत गन ससि भान ।
चौथ इहै बनाय दोन्ह्यौ, संत राखत ध्यान ॥ २ ॥
दरवाज नौ दस प्रगट आहैं, काहु तें न छिपान ।
रमत तेहि के ब्रह्म भीतर, नहीं कहुँ बिलगान ॥ ३ ॥
काया भीतर खेल खेलहु, अनत करु न पयान ।
बाहर तौ सब देखिबे को, घट अहै सो प्रमान ॥ ४ ॥
कहत हौं उपदेस छोड़ु, अँदेस रहु ठहरान ।
जगजीवन निर्बान सतगुरु, चरन रहु लिपटान ॥ ५ ॥
६० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १४ ॥
मन तुम रहहु चरन सरनाई ।
यहि काया का अंत खोज नहिं, काहू भेद न पाई ॥ १ ॥
तीनि लोक काया रचि दीन्ह्यौ, चौथा दीन्ह बनाई ।
तीरथ कोटि अहैं याही में, संतन दीन्ह बताई ॥ २ ॥
अजपा जाप जपत रहु निसु दिन, प्रगट न देहु जनाई ।
इहि तें मंत्र नहीं है एकौ, भर्म न परहु भुलाई ॥ ३ ॥
सेस महेस बिस्नु औ ब्रह्मा, रहे हैं ध्यान लगाई ।
निर्गुन निरंकार वह मूरति, तेहि माँ रहौ समाई ॥ ४ ॥
रहु ठहराय गगन करु बासा, निरखि देखु निरथाई ।
जगजीवन सतगुरु की मूरति, रबि ससि छवि छिपि जाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द १५ ॥
साधौ भेष बाँधि गफिलाने ।
रहै अभेष भेद तब छूटहि, सहज रीति मन जाने ॥ १ ॥
जब तें माला कंठी पहिरी, गर्ब भयो इतराने ।
कर्म भर्म निषेध। ६१
दान पुन्यं करि तपस्या, बर्त बहुत रहाहिं।
त्यागि बस्ती बैठि बन महँ, कंदमूरहिं खाहिं ॥ २ ॥
पाठ करि पढ़ि बहुत बिद्या, रैन दिनहिं बकाहिं।
गाय बहुत बजाइ बाजा, मनहिं समुझत नाहिं ॥ ३ ॥
करहिं स्वाँसा बंद कष्टित, भाँड़ की गति आहिं।
साधि पवन चढ़ाय गगनहिं, कमल उलटै नाहिं ॥ ४ ॥
साध नहिं केहु कीन ऐसे, सिखे बहुत कहाहिं।
प्रीति रस मन नाहिं उपजत, परे ते भव माहिं ॥ ५ ॥
जस सँजोग बियोग तैसे, तत अच्छर दुइ आहिं।
रटत अंतर भेंट गुरु तैं, मंत्र अजपा माहिं ॥ ६ ॥
कहौं प्रगट पुकारि जेहि के, प्रीति अंतर आहिं।
जगजीवन दासँ रीति अस,
तब चरन महँ मिलि जाहिं ॥ ७ ॥
॥ शब्द १७ ॥
चरन सरन रहौं, कहूँ अंतै नाहिं जाऊँ ॥ टेक ॥
रही पास किहे बास, त्यागि सर्ब और आस,
भजत रहौं नाऊँ ॥ १ ॥
तीनि त्यागि चौथ तत्त, पाँह बैठि निरभय ह्वै,
तकौं ना उराऊँ१ ॥ २ ॥
मारि आसन रहौं बैठि, नैनन टक लाय डोरि,
निरमल सत नीर पाइ, नित्त सो अन्हाऊँ ॥ ३ ॥
जुग जुग जग बैठि संग, मगन रसँ तेहि रंग,
जगजीवन दास सतगुरु सो, चेला ताहि क आऊँ२ ॥ ४ ॥
(१) दूसरी ओर। (२) हूँ।
६२ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १८ ॥
सब खाकहि मिलिहै रे भाई ।
किया चहहु कर लेहु बंदगी, मन तें छाँड़हु गफिलाई ॥ १ ॥
भूलै फूलै देखि न दौलत, काहु क संग न जाई ।
पैदा भये निपैद भये ते, केहु की खबर न केह पाई ॥ २ ॥
कहँ धौं गये कहाँ धौं वह घर, कहाँ जाइ धौं रहे समाई ।
छत्री जोधा जोगी दानौ१, काल लीन्ह सब खाई ॥ ३ ॥
बचा नहीं कोउ ना कोइ बचिहै, मन्द कहत गोहराई ।
जगजिवन दास नाम गहि उबरे, सतगुर चरनन सरनाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १९ ॥
बहु पद जोरि जोरि करि गावहिं ।
साधन कहा सो काटि कपटि२ कै,
अपन कहा गोहरावहिं ॥ १ ॥
निंदा करहिं विवाद जहाँ तहँ,
बक्ता बड़े कहावहिं ।
आपु अंध कुछ चेतत नाहीं,
औरन अर्थ बतावहिं ॥ २ ॥
जो कोउ नाम का भजन करत है,
तेहि कौं कहि भरमावहिं ।
माला मुद्रा भेष किये बहु,
जग परमोधि३ पुजावहिं ॥ ३ ॥
जहँ ते आये सो सुधि नाहीं,
झगरे जन्म गँवावहिं ।
जगजीवन ते निन्दक बादी,
बास नर्क महँ पावहिं ॥ ४ ॥
(१) राक्षस । (२) काट छाँट कर । (३) राजी कर के ।
कर्म भर्म निषेध । ६३.
॥ शब्द २० ॥
अन्तर जो कोउ नाम धुनि लावै ।
अजपा रसना सदा लागि रहै, नाहीं भेद बतावै ॥ १ ॥
इत उत आस निरास होय जब, मन अस्थिर लै पावै ।
रहै ठहराय सिखर है सीतल, निरखि रूप तब आवै ॥ २ ॥
देखत अहै सुनत है सरवन, काहेक कहि गोहरावै ।
भयो मस्त रस पाय अमृतै, काहेक घंट बजावै ॥ ३ ॥
तब बैराग भयो अनुरागी, काल निकट नहिं आवै ।
जगजीवन सतगुरु की किरपा, नहिं आवै नहिं जावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अब तौ ज्ञान कथै को भाई ।
सब्द कहत सो मानत नाहीं, केतौ कहि समुझाई ॥ १ ॥
भेष जगत सब भूले मैं तैं, सुमति न हिये समाई ।
बहु जलधर बरषहिं पखान पर, सोखत नाहीं जाई१ ॥ २ ॥
दोख परत सब हिये सबहिन का, सुरति नाहिं ठहराई ।
जहाँ तहाँ भरमत बीतत है, नाहीं भजन दृढ़ाई ॥ ३ ॥
बहु अभिमान गुमान गर्ब तैं, करहिं बाद अधिकाई ।
सो करतूति भुगुति है काया, परै नर्क में जाई ॥ ४ ॥
कोइ कोइ जन मन को थिर राखैं, अन्तर रटनि लगाई ।
जगजीवन ते भक्त कहाये, सतगुरु लीन्ह सिखाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द २२ ॥
और कछु मंत्र नाम सम नाहिं ।
चलै न जिभ्या मुख नहिं बोलै, रटत रहै मन माहिं ॥ १ ॥
(१) जैसे बादल कितनाहीं मेंह बरसाते हैं पर पत्थर के भीतर नहीं
धसता इसी तरह जगत भेष को जितना चाहे उपदेश करो पर हृदय में असर
नहीं करता ।
६४' जगजीवन साहब की बानी
कोउ कासी कोउ जात द्वारकै, हित कर तीरथ न्हाहिं ।
कोउ ब्रत दान अचार करै बहु, कोऊ तपस्यहिं जाहिं ॥ २ ॥
तूरत बाहैं धींच गगन मुख१, उलटी धूम घुटाहिं२ ।
पीवत दूध दूब फल बन के, कंद मूरि खनि३ खाहिं ॥ ३ ॥
कोउ रहैं ठाढे कोउ रहैं बैठै, कोउ होइ जोगी जोग कराहिं ।
कोउ जागै निसि दिन नहिं सोवैं, कोउ दम साध रहाहिं ॥ ४ ॥
जज्ञ राग रस निर्त रंग कबि, ज्ञानी ज्ञान कथाहिं ।
पंडित कथा पुरान बखानहिं, पढ़तै जन्म सिराहिं४ ॥ ५ ॥
माला मुद्रा भस्म लगावहिं, चंदन तिलक कराहिं ।
सलिग्राम औ पीतर पुतरी, पूजि पूजि हरषाहिं ॥ ६ ॥
एह सब करै सरै न भजन बिन, मन थिर होवै नाहिं ।
परहिं आय भौजाल फेरि फिरि, समुझि समुझि पछिताहिं ॥ ७ ॥
कर्म धर्म निषेध । ६५
परपंची परपंच करहिं जे, परा ते भव प्रतिकूला ।
जगजीवन एहि देखि तमासा, सतगुर छवि गहि मूला ॥ ४ ॥
॥ शब्द २४ ॥
सब जग दीन्ह धंधे लाय ॥ टेक ॥
जहाँ तहाँ लगाय धागा, सुद्धि गई भुलाय ।
जारि डारि संसार माया, लीन्ह सबहिं विरुफाय१ ॥ १ ॥
बिना दाया नाहिं छूटै, करै कोटि उपाय ।
पाँच और पचीस मिलि कै, अपथ गैल चलाय ॥ २ ॥
चुभे पाँवन कर्म काँटा, दरद भे अधिकाय ।
गये गल पचि नाम बिनु बहि, ज्यों बुल्ला बुंद बिलाय ॥ ३ ॥
करि कृपा मन खैंचि लीन्ह्यो, राखि लइ सरनाय ।
जगजीवन सोइ भयो निर्भय, काल तें न डेराय ॥ ४ ॥
॥ शब्द २५ ॥
भे जे नाम भजि मस्तान ।
सदा लागी रहत तारी नाहिं सूझत आन ॥ १ ॥
दीनता गहि सीस वारे तजे गर्व गुमान ।
अबल कोऊ कहै नहिं तेहिं महा है बलवान ॥ २ ॥
काल तिन तें करत बिनती रहत सदा हैरान ।
कहत सब्द पुकारि कै सुनि मान ले परमान ॥ ३ ॥
रहत नीचे तकत ठाढ़े जहँ सतगुर निर्वान ।
जगजीवन गहि चरन मन तें, भये ताहि समान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २६ ॥
कर मुकाम जहाँ निर्गुन नाम ।
ए मन बैठ रहौ तेहिं के ढिग,
तबही सुख पैहौ बिस्राम ॥ १ ॥
(१) ऐसा उलझना कि फिर न छूटै ।
६६ जगजीवन साहब की बानी
उत्तम मध्यम तहँवाँ कछु नहिं,
नाहिं छाँह नहिं अहै घाम ।
पानि पवन उहँ भूख प्यास नहिं,
नाहीं दुख नहिं अहै अराम ॥ २ ॥
झलमल निर्मल निरख देखु तहँ,
उत्तम बना गगन भल ग्राम ।
जगजीवन डर नाहिं काल का,
सतगुर चरन तें राखहु काम ॥ ३ ॥
॥ शब्द २७ ॥
मन महँ समुझि भजहु रे भाई ।
बिना नाम नाहीं सुख पैहौ, छाँड़ि देहु गफिलाई ॥ १ ॥
बादसाह तख्त चढ़ि भूला, सूबा करत सुबाई ।
राजा राज-काज महँ भूला, कबहुँ न बंदगी आई ॥ २ ॥
साहूकार दाम तकि भूला, दाया जिन्ह बिसराई ।
साँईं खैंचि लीन्ह सब माया, जहँ तहँ गयो बिलाई ॥ ३ ॥
जोगी जोग जुक्ति महँ भूला, पंडित करि पंडिताई ।
भोगी भोग पाप महँ भूला, सुधि बुधि गै बिसराई ॥ ४ ॥
तपसी करत तपस्या भूला, मनुवाँ कसा न जाई ।
पाँच साँच माँ आवत नाहीं, मिले बबूरिहि १ जाई ॥ ५ ॥
षट-दरसन दुनियाँ सब भरमत, जहँ तहँ तीरथ न्हाई ।
घटत न कर्म रहत अघ लादे, मन का मैल न जाई ॥ ६ ॥
बिना नाम कोइ पार न पाइहि, कहे देत गोहराई ।
जगजीवन सतगुर के चरनन, कबहुँ न मन बिसराई ॥ ७ ॥
(१) बबूल यानी काँटे में।
कर्म भर्म निषेध । ६७
॥ शब्द २८ ॥
अरे मन अंतै कतहूँ न धाव ।
रहै अंतर प्रीत लागी, जगत सब बिसराव ॥ १ ॥
तीन चौथ बनाय दीन्ह्यौ, नाहिं जान्यौ भाव ।
पाय औसर चूक नाहीं, इहै आहै दाव ॥ २ ॥
तीर्थ ब्रत और दान पुन्यं, एह न मन में लाव ।
एह सब अहैं गुलाम भक्त के, सीस नाहीं नाव ॥ ३ ॥
त्यागु सर्वस आस मन तें, गगन गाँव बसाव ।
जगजिवनदास निहारि मूरति, नयन दरसन पाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द २९ ॥
जो कोइ यहि बिधि तीरथ न्हाय ॥ टेक ॥
मन का मैल लेइ मिसाय१, तब तिरबेनी घाट अन्हाय ॥ १ ॥
माया मोह दाल दै डारि, काम क्रोध मद देइ लुटाय ॥ २ ॥
काहे क कासी गंगहिं जाय, नाम तें मैलहिं डार छुड़ाय ॥ ३ ॥
जगजीवन दास कहै गोहराय,
बिन सतगुरु कोउ पार न जाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
ऐसी डोरि लगावहु पोढ़ि ।
टूटै डोरि लेहु फिरि जोरि ॥ १ ॥
जब लगि मुख तें कहिये बात ।
तब लगि नाम बिसरि मन जात ॥ २ ॥
जग प्रपंच संगति नहिं करिये ।
हिये नाम की रटना धरिये ॥ ३ ॥
चित माँ चित जो राखै लाय ।
ता पर काल कि कछु न बसाय ॥ ४ ॥
( १ ) उबटन लगा कर साफ करना ।
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६८ | जगजीवन साहब की वानी
जगजीवन के चरन अधार ।
सतगुरु संत उतारहिं पार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३१ ॥
बिन वहि नाम तरै कोउ नाहीं ।
देखहु समुझि बूझि मन माहीं ॥ १ ॥
तीरथ ब्रत बहु भाँति कराय ।
जो पै अन्तर देखि न पाय ॥ २ ॥
जल तन धोय मैलि गा धोय ।
मन यहु नाम तें निर्मल होय ॥ ३ ॥
भूले करि षट कर्म अचार ।
याही तें भूला संसार ॥ ४ ॥
सहज डोरि जो राखै लाय ।
अंतर भजि तब भक्त कहाय ॥ ५ ॥
झूंठ साँच बहुत नहिं बोलै ।
रहि जग अपने मारग डोलै ॥ ६ ॥
रहै छिपित नहिं देइ जनाय ।
तब भजि अंतर भक्त कहाय ॥ ७ ॥
गर्ब गुमान त्यागि चलै चालू ।
दुख तेहिं देह न कबहुँ कालू ॥ ८ ॥
जगजीवन निर्मल निर्बान ।
सतगुरु चरन रहै धरि ध्यान ॥ ९ ॥
॥ शब्द ३२ ॥
मनुवाँ रहहु जिकिरि लगाय ।
और आस न राखु एकौ, देहु सब बिसराय ॥ १ ॥
कथा ग्रंथ पुकारि भाषैं, देत संत सिखाय ।
नाहिं एहि तें कछु उत्तम, त्यागि दे अमताय ॥ २ ॥