जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ जगजीवन साहब की बानी
उत्तम मध्यम तहँवाँ कछु नहिं,
नाहिं छाँह नहिं अहै घाम ।
पानि पवन उहँ भूख प्यास नहिं,
नाहीं दुख नहिं अहै अराम ॥ २ ॥
झलमल निर्मल निरख देखु तहँ,
उत्तम बना गगन भल ग्राम ।
जगजीवन डर नाहिं काल का,
सतगुर चरन तें राखहु काम ॥ ३ ॥
॥ शब्द २७ ॥
मन महँ समुझि भजहु रे भाई ।
बिना नाम नाहीं सुख पैहौ, छाँड़ि देहु गफिलाई ॥ १ ॥
बादसाह तख्त चढ़ि भूला, सूबा करत सुबाई ।
राजा राज-काज महँ भूला, कबहुँ न बंदगी आई ॥ २ ॥
साहूकार दाम तकि भूला, दाया जिन्ह बिसराई ।
साँईं खैंचि लीन्ह सब माया, जहँ तहँ गयो बिलाई ॥ ३ ॥
जोगी जोग जुक्ति महँ भूला, पंडित करि पंडिताई ।
भोगी भोग पाप महँ भूला, सुधि बुधि गै बिसराई ॥ ४ ॥
तपसी करत तपस्या भूला, मनुवाँ कसा न जाई ।
पाँच साँच माँ आवत नाहीं, मिले बबूरिहि १ जाई ॥ ५ ॥
षट-दरसन दुनियाँ सब भरमत, जहँ तहँ तीरथ न्हाई ।
घटत न कर्म रहत अघ लादे, मन का मैल न जाई ॥ ६ ॥
बिना नाम कोइ पार न पाइहि, कहे देत गोहराई ।
जगजीवन सतगुर के चरनन, कबहुँ न मन बिसराई ॥ ७ ॥
(१) बबूल यानी काँटे में।