जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअवर न रूप कहाँ लहि बरनों, सब छवि रहे समाय।
जगजीवन साँई कहँ लहि बरनौ, रहे चरन चितलाय ॥ २ ॥
॥ शब्द ३६ ॥
तीरथ ब्रत की तजि दे आसा।
सत्त नाम की रटना करि कै,
गगन मँडल चढ़ि देखु तमासा ॥ १ ॥
ताहि मँदिल का अंत नहीं कछु,
रबी बिहून किरिन परगासा।
तहाँ निरास वास करि रहिये,
काहे क भरमत फिरै उदासा ॥ २ ॥
देउँ लखाय छिपावहुँ नाहीं,
जस मैं देखेउँ अपने पासा।
ऐसा कोऊ सब्द सुनि समुझै,
कटि अघ कर्म होइ तब दासा ॥ ३ ॥
नैन चाखि दरसन रस पीवै,
ताहि नहीं है जम की त्रासा।
जगजिवन दास करम तेहि नाहीं,
गुरु के चरन करै सुख बिलासा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३७ ॥
चलु चढ़ौं अटरिया धाई री।
महल म टहल करै नहिं पाई,
करिये कौन उपाई री ॥ १ ॥
यहँ तौ बैरी बहुत हमारे,
तिन तें कछु न बसाई री।
पाँच पचीस निस दिन संतावहिं,
राखा इन अरुझाई री ॥ २ ॥