जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ३१ ॥
चरनन में लागी रहिहौं री ॥ टेक ॥
और रूप सब तिरथ बतावै,
जल नहिं पैठ नहैहौं री ।
रहिहौं बैठि नयन तें निरखत,
अनत न कतहूँ जैहौं री ॥ १ ॥
तुम्हों तें मन लाइ रहिहौं,
और नहीं मन अनिहौं री ।
जगजीवन के सतगुरु समरथ,
निर्मल नाम गहि रहिहौं री ॥ २ ॥
॥ शब्द ३२ ॥
सुरति बसी मन नाम फिरत मतवारी ॥ टेक ॥
चित तौ लाग्यो अपने पिय सों,
डग मग पाँव न जात सँभारी ।
अंतर देखि चुपाइ रहिउँ मैं,
सूरति तुम्हरी रहिउँ निहारी ॥ १ ॥
सूरति पर मूरति वह साँची,
सो मैं रहि हौं नाहिं बिसारी ।
जगजीवन सतगुरु कै मूरति,
सो मैं रहिउँ सँभारी ॥ २ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
बनत न कतहूँ अनत न जाय ।
देखहु चरन सरन ठहराय ॥ १ ॥
नीचे तकत ऊँचे काँ जाय ।
गगन मंडल माँ तब ठहराय ॥ २ ॥