जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंठाढ़ बैठे घोंच तूरहिं, तकत हैं असमान ।
वृथा सब परतीत बिनु है, भ्रम भूले हैवान ॥ ५ ॥
खोज काया करहु थिर मन, त्यागि कपट सयान ।
भजहु अंतर नाम वाहै, राम सत्त प्रमान ॥ ६ ॥
लाउ रसना नाहिं बिसरै, प्रगट करु न बखान ।
जगजीवन बिस्वास निरमल, होहु जैसे भान ॥ ७ ॥
॥ शब्द १२ ॥
बौरे मन को नहिं भरमाव ।
तीन लोक के करता साँई, ताहि सों ध्यान लगाव ॥ १ ॥
तीरथ कोटि साज जिन कीन्हेउ, सो संतन हिये आव ।
चढ़ि कै गगन देखु सूरति को, ताहि काँ सीस नवाव ॥ २ ॥
सूरति सत्त प्रेम रस पानी, ताहि में चित अन्हवाव ।
अमर होहु भवसागर उतरहु, नहिं आवहु नहिं जाव ॥ ३ ॥
सतगुरु सत्त कहा यहि बानी, अलख नाम धुनि लाव ।
जगजीवन साहब को छबि में, आपनि सुरति समाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मन गृह ग्राम यह अस्थान ।
सात दोप नव खंड पृथ्वी, सिर उर तेहि माँ जान ॥ १ ॥
तीनि लोक बिस्तार है तेहिं, रमत गन ससि भान ।
चौथ इहै बनाय दोन्ह्यौ, संत राखत ध्यान ॥ २ ॥
दरवाज नौ दस प्रगट आहैं, काहु तें न छिपान ।
रमत तेहि के ब्रह्म भीतर, नहीं कहुँ बिलगान ॥ ३ ॥
काया भीतर खेल खेलहु, अनत करु न पयान ।
बाहर तौ सब देखिबे को, घट अहै सो प्रमान ॥ ४ ॥
कहत हौं उपदेस छोड़ु, अँदेस रहु ठहरान ।
जगजीवन निर्बान सतगुरु, चरन रहु लिपटान ॥ ५ ॥