जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरु और शब्द महिमा। ८१
बिन कर चरन पकरि कस जाय।
सिर नहिं माथ रहै लपटाय ॥ ३ ॥
स्त्रवन बिहूना सुनि धुनि आय।
नैन बिहून दरस तकि पाय ॥ ४ ॥
जगजीवन अस मत जेहिं आय।
मिलि सत मत तब सिद्ध कहाय ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
साधौ कहै तौ कहा न जाय।
आपन घर मत कोइ न बूझै,
हमहिं कहै समुझाय ॥ १ ॥
पंडित जोगी दंडी तपसी,
बहु बिबाद करैं धाय।
नाहिन नाम की ओर गही तिन्ह,
तीरथ बर्त लौ लाय ॥ २ ॥
नाहिन काहू जीत कहाँ लहि,
कहँ लहि कहै समुझाय।
करै जाइ तस जेहिं जस भावै,
भुग्तै तैसे आय ॥ ३ ॥
बिरला कोई भजन करतु है,
चाल चलै दिनताय।
जगजीवन सतगुरु की मूरति,
चरन रहे लपटाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
महिमा प्रभु मो सों वरनि न जाय ॥ टेक ॥
अनहद बानी मूरति बोलै, सुनहु संत चित लाय।
अनहद ताल पखावज बाजै, तहाँ सुरति चलि जाय ॥ १ ॥