जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्म भर्म निषेध । ६३.
॥ शब्द २० ॥
अन्तर जो कोउ नाम धुनि लावै ।
अजपा रसना सदा लागि रहै, नाहीं भेद बतावै ॥ १ ॥
इत उत आस निरास होय जब, मन अस्थिर लै पावै ।
रहै ठहराय सिखर है सीतल, निरखि रूप तब आवै ॥ २ ॥
देखत अहै सुनत है सरवन, काहेक कहि गोहरावै ।
भयो मस्त रस पाय अमृतै, काहेक घंट बजावै ॥ ३ ॥
तब बैराग भयो अनुरागी, काल निकट नहिं आवै ।
जगजीवन सतगुरु की किरपा, नहिं आवै नहिं जावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अब तौ ज्ञान कथै को भाई ।
सब्द कहत सो मानत नाहीं, केतौ कहि समुझाई ॥ १ ॥
भेष जगत सब भूले मैं तैं, सुमति न हिये समाई ।
बहु जलधर बरषहिं पखान पर, सोखत नाहीं जाई१ ॥ २ ॥
दोख परत सब हिये सबहिन का, सुरति नाहिं ठहराई ।
जहाँ तहाँ भरमत बीतत है, नाहीं भजन दृढ़ाई ॥ ३ ॥
बहु अभिमान गुमान गर्ब तैं, करहिं बाद अधिकाई ।
सो करतूति भुगुति है काया, परै नर्क में जाई ॥ ४ ॥
कोइ कोइ जन मन को थिर राखैं, अन्तर रटनि लगाई ।
जगजीवन ते भक्त कहाये, सतगुरु लीन्ह सिखाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द २२ ॥
और कछु मंत्र नाम सम नाहिं ।
चलै न जिभ्या मुख नहिं बोलै, रटत रहै मन माहिं ॥ १ ॥
(१) जैसे बादल कितनाहीं मेंह बरसाते हैं पर पत्थर के भीतर नहीं
धसता इसी तरह जगत भेष को जितना चाहे उपदेश करो पर हृदय में असर
नहीं करता ।