जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्म भर्म निषेध। ६१
दान पुन्यं करि तपस्या, बर्त बहुत रहाहिं।
त्यागि बस्ती बैठि बन महँ, कंदमूरहिं खाहिं ॥ २ ॥
पाठ करि पढ़ि बहुत बिद्या, रैन दिनहिं बकाहिं।
गाय बहुत बजाइ बाजा, मनहिं समुझत नाहिं ॥ ३ ॥
करहिं स्वाँसा बंद कष्टित, भाँड़ की गति आहिं।
साधि पवन चढ़ाय गगनहिं, कमल उलटै नाहिं ॥ ४ ॥
साध नहिं केहु कीन ऐसे, सिखे बहुत कहाहिं।
प्रीति रस मन नाहिं उपजत, परे ते भव माहिं ॥ ५ ॥
जस सँजोग बियोग तैसे, तत अच्छर दुइ आहिं।
रटत अंतर भेंट गुरु तैं, मंत्र अजपा माहिं ॥ ६ ॥
कहौं प्रगट पुकारि जेहि के, प्रीति अंतर आहिं।
जगजीवन दासँ रीति अस,
तब चरन महँ मिलि जाहिं ॥ ७ ॥
॥ शब्द १७ ॥
चरन सरन रहौं, कहूँ अंतै नाहिं जाऊँ ॥ टेक ॥
रही पास किहे बास, त्यागि सर्ब और आस,
भजत रहौं नाऊँ ॥ १ ॥
तीनि त्यागि चौथ तत्त, पाँह बैठि निरभय ह्वै,
तकौं ना उराऊँ१ ॥ २ ॥
मारि आसन रहौं बैठि, नैनन टक लाय डोरि,
निरमल सत नीर पाइ, नित्त सो अन्हाऊँ ॥ ३ ॥
जुग जुग जग बैठि संग, मगन रसँ तेहि रंग,
जगजीवन दास सतगुरु सो, चेला ताहि क आऊँ२ ॥ ४ ॥
(१) दूसरी ओर। (२) हूँ।