जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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६० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १४ ॥
मन तुम रहहु चरन सरनाई ।
यहि काया का अंत खोज नहिं, काहू भेद न पाई ॥ १ ॥
तीनि लोक काया रचि दीन्ह्यौ, चौथा दीन्ह बनाई ।
तीरथ कोटि अहैं याही में, संतन दीन्ह बताई ॥ २ ॥
अजपा जाप जपत रहु निसु दिन, प्रगट न देहु जनाई ।
इहि तें मंत्र नहीं है एकौ, भर्म न परहु भुलाई ॥ ३ ॥
सेस महेस बिस्नु औ ब्रह्मा, रहे हैं ध्यान लगाई ।
निर्गुन निरंकार वह मूरति, तेहि माँ रहौ समाई ॥ ४ ॥
रहु ठहराय गगन करु बासा, निरखि देखु निरथाई ।
जगजीवन सतगुरु की मूरति, रबि ससि छवि छिपि जाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द १५ ॥
साधौ भेष बाँधि गफिलाने ।
रहै अभेष भेद तब छूटहि, सहज रीति मन जाने ॥ १ ॥
जब तें माला कंठी पहिरी, गर्ब भयो इतराने ।