जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्म धर्म निषेध । ६५
परपंची परपंच करहिं जे, परा ते भव प्रतिकूला ।
जगजीवन एहि देखि तमासा, सतगुर छवि गहि मूला ॥ ४ ॥
॥ शब्द २४ ॥
सब जग दीन्ह धंधे लाय ॥ टेक ॥
जहाँ तहाँ लगाय धागा, सुद्धि गई भुलाय ।
जारि डारि संसार माया, लीन्ह सबहिं विरुफाय१ ॥ १ ॥
बिना दाया नाहिं छूटै, करै कोटि उपाय ।
पाँच और पचीस मिलि कै, अपथ गैल चलाय ॥ २ ॥
चुभे पाँवन कर्म काँटा, दरद भे अधिकाय ।
गये गल पचि नाम बिनु बहि, ज्यों बुल्ला बुंद बिलाय ॥ ३ ॥
करि कृपा मन खैंचि लीन्ह्यो, राखि लइ सरनाय ।
जगजीवन सोइ भयो निर्भय, काल तें न डेराय ॥ ४ ॥
॥ शब्द २५ ॥
भे जे नाम भजि मस्तान ।
सदा लागी रहत तारी नाहिं सूझत आन ॥ १ ॥
दीनता गहि सीस वारे तजे गर्व गुमान ।
अबल कोऊ कहै नहिं तेहिं महा है बलवान ॥ २ ॥
काल तिन तें करत बिनती रहत सदा हैरान ।
कहत सब्द पुकारि कै सुनि मान ले परमान ॥ ३ ॥
रहत नीचे तकत ठाढ़े जहँ सतगुर निर्वान ।
जगजीवन गहि चरन मन तें, भये ताहि समान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २६ ॥
कर मुकाम जहाँ निर्गुन नाम ।
ए मन बैठ रहौ तेहिं के ढिग,
तबही सुख पैहौ बिस्राम ॥ १ ॥
(१) ऐसा उलझना कि फिर न छूटै ।