जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरु और शब्द महिमा । ८६
साँई तो निकट बैठि सुख बिलसहि,
जोतिहि जोति मिलाई री ।
जगजीवन दास अपनाय लेहिं वै,
नाहीं जीव डेराई री ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३८ ॥
नाम बिनु केहि काम का कह जीवनं संसार ॥ टेक ॥
आपनो जग कहत आहै कठिन माया जार ॥ १ ॥
लाग धागा गरे बाँधे नाहिं छूटनहार ॥ २ ॥
दास बास विस्वास जगतं निरखि रूप निहार ॥ ३ ॥
जगजीवन कोइ अहँ बिरले उतरि होवैं पार ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३९ ॥
नाम रटि रटत त्रकुटी गगन चढ़ि आयउँ ॥ टेक ॥
मैं तैं पचीस पाँच डोरि एक लायउँ ।
मैं तौ रँग संग भयो सीस ताहि नायउँ ॥ १ ॥
सतगुरु से पाय भेद जगत नाहिं आयउँ ।
मिटेव अँधकार, ज्यों भानु भे प्रकास,
निरखि दृष्टि आयउँ ॥ २ ॥
जुगति किये रहै ऐसी प्रगट सो बतायउँ ।
जगजीवन दास अम्मर भे जुग जुग जस गायउँ ॥ ३ ॥
॥ शब्द ४० ॥
भक्त जक्त त्यागि जागि लागि बरन रहु रे ॥ टेक ॥
जग प्रसंग ध्यान भंग जानि हानि तजु रे ।
रहु इकंत तंत१ लागि जानि नाम गहु रे ॥ १ ॥
पाँच औ पचीस डोरि पोढ़ि बाँधि रहु रे ।
साधि चित्त निश्च भाव चरनन गुरु परु रे ॥ २ ॥
(१) तत्व ।