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सर्वकोश
जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

कर्म भर्म निषेध। ८५
अहै अभेद भेद नहिं जानत, सिखि पढ़ि कहत पुकारी।
देखि करत सो आवत नाहीं, डारिन यजन बिगारी ॥ २ ॥
कहा कहौं मन समुझि रहत हौं, देख्यौं दृष्टि पसारी।
समुझाये कोइ मानत नाहीं, कपट बहुत अधिकारी ॥ ३ ॥
बिरले कोइ जन करत बंदगी, मैं तैं डारत मारी।
जगजीवन गुरु चरन सीस दै, निरखत रूप निहारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
संत कह्यौ रमज१ से बानी।
तत्त सार बताय दीन्ह्यो, काहू भेद न जानी ॥ १ ॥
बहुतक अंधे बंधे माया, आहहिं गर्व गुमानी।
समुझाये जे समुझत नाहीं, होइहि तिन की हानी ॥ २ ॥
साधन की गति कहि नहिं आवै, केहि मुख कहौं बखानी।
जगजीवन चरनन तें लागे, निरखि जोति निर्बानी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५ ॥
दुनियाँ हमहिं सिखावत ज्ञान।
आपु तौ भवजाल भूले, हमहिं कहैं हैवान ॥ १ ॥
गुणन तें मन गूंथि करि कै, करत प्रगट बखान।
नाहिं बूझत सूझ नाहीं, लागि नहिं हिय बान ॥ २ ॥
धाइ धाइ सिखाइ औरै, दोऊ भरम भुलान।
करत अहिं अस देखि नैनन, प्रगट भाखौं ज्ञान ॥ ३ ॥
बहुत फूलि कै भूलि परि हाँहिं, होइ है नुकसान।
जगजीवन जानत अहै सब, नाहिं कछू छिपान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
साधौ नाम भजन जिन ठाना।
केतौ कोइ समुझाय सिखावत,
मनहिं न आवत आना ॥ १ ॥
(१) भेद।