जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्म भर्म निषेध । ८७
पाँच अगिन तन दहि भूल भूला, पवन भच्छै सोय ।
बाँह तूरै रहहि ठाढ़े, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ६ ॥
लाइ अंग बिभूति जोगी, नारि रत नहिं होय ।
तजै माया मुलुक सर्बस, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ७ ॥
कृपा भै दिनताइ आई, सुमन मन भा सोय ।
जगजिवन डोरी लाय पोढ़ी, रह्यो चरन समोय ॥ ८ ॥
॥ शब्द ८ ॥
साधौ नाम चाखि बौराना ॥ टेक ॥
लागे रहें चरन तें निसि दिन, भावै और न आना ।
तजो अचार बिचार जगत को, सब तें रहि बिलगाना ॥ १ ॥
उन कै गति कोउ जानत नाहीं, को करि सकै बखाना ।
मरि कै अमर भये हैं सोई, भये हैं सिद्ध निमाना ॥ २ ॥
हेत आस नहिं राखै काहू, गुरु निरखहिं निरबाना ।
जगजीवन वै सांई मिलिगे, परगट करहुँ बखाना ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६ ॥
साधौ देखहु अंतर माहीं ।
भाँवरि भवन दिहे रहि रहिये,
अवर अहै कछु नाहीं ॥ १ ॥
बड़ बिस्तार अहै काया का,
अंत खोज कछु नाहीं ।
जिन खोजा पाया काया महँ,
बहुतेक भर्म भुलाहीं ॥ २ ॥
पाँच पचीस डोरि बसि करिये,
बत्तु गुरु अहै ताहीं ।
जगजीवन निर्बानी मूरति,
मिलिगे सूरत माहीं ॥ ३ ॥