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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

८४ जगजीवन साहब की बानी
रहि निहारि निरखि रूप अनत नाहिं टरु रे ।
जुक्ति जोग भक्ति का उपदेस ऐसे करु रे ॥ ३ ॥
पाय खा अघाय अमी जुग जुग नहिं मरु रे ।
जगजिवन दास आस राखु नाहिं फाँस परु रे ॥ ४ ॥
कर्म भर्म निषेध और उपदेश सतगुरु व शब्द भक्ति का ।
॥ शब्द १ ॥
हे मन थकहु तो तकहु निसान ।
बैठहु मंडफ लाय धुनि धुनो, अनत करु न पयान ॥ १ ॥
पाँच पचीस लगाय धागा, बाँधि रहु ठहरान ।
नैन दरसन नीर पीवै, चाखि भे मस्तान ॥ २ ॥
नाहिं दुख सुख पवन पानी, नाहि ससि नहिं भान ।
नाहिं ब्रह्मा सिवं सक्ती, निर्गुनं निरवान ॥ ३ ॥
दियो दुइ कर सीस चरनन, नाहिं भावै आन ।
जगजीवन ते भये गुरमुख, अमर जोग दृढ़ान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
कर न सुमिरिनी लेहु, अंतर धुनि लावहु रे ।
मैं तैं माला डारि देहु, तुम दीन लीन ह्वै गावहु रे ॥ १ ॥
जो मनुवाँ करि खाक रहहु, वहि काहेक लगावहु रे१ ।
चंदन चरन टेक रहु निर्भय, काहेक भौजल आवहु रे ॥ २ ॥
एहु उपदेस कहि तुमहिं सुनावहुँ, मन अँदेस बिसरावहु रे ।
जगजीवन दास निहारि निरख कै, सुरति म सुरत मिलावहु रे ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३ ॥
साँई मोहिं सब कहत अनारी ।
हम कहँ कहत अजान अहँ यह, चतुर सबै संसारी ॥ १ ॥
( १ ) जब मन को खाक कर डाला तो भभूत लगाने का क्या काम है ।