जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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॥ शब्द १८ ॥
सब खाकहि मिलिहै रे भाई ।
किया चहहु कर लेहु बंदगी, मन तें छाँड़हु गफिलाई ॥ १ ॥
भूलै फूलै देखि न दौलत, काहु क संग न जाई ।
पैदा भये निपैद भये ते, केहु की खबर न केह पाई ॥ २ ॥
कहँ धौं गये कहाँ धौं वह घर, कहाँ जाइ धौं रहे समाई ।
छत्री जोधा जोगी दानौ१, काल लीन्ह सब खाई ॥ ३ ॥
बचा नहीं कोउ ना कोइ बचिहै, मन्द कहत गोहराई ।
जगजिवन दास नाम गहि उबरे, सतगुर चरनन सरनाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १९ ॥
बहु पद जोरि जोरि करि गावहिं ।
साधन कहा सो काटि कपटि२ कै,
अपन कहा गोहरावहिं ॥ १ ॥
निंदा करहिं विवाद जहाँ तहँ,
बक्ता बड़े कहावहिं ।
आपु अंध कुछ चेतत नाहीं,
औरन अर्थ बतावहिं ॥ २ ॥
जो कोउ नाम का भजन करत है,
तेहि कौं कहि भरमावहिं ।
माला मुद्रा भेष किये बहु,
जग परमोधि३ पुजावहिं ॥ ३ ॥
जहँ ते आये सो सुधि नाहीं,
झगरे जन्म गँवावहिं ।
जगजीवन ते निन्दक बादी,
बास नर्क महँ पावहिं ॥ ४ ॥
(१) राक्षस । (२) काट छाँट कर । (३) राजी कर के ।