जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्म भर्म निषेध । ६७
॥ शब्द २८ ॥
अरे मन अंतै कतहूँ न धाव ।
रहै अंतर प्रीत लागी, जगत सब बिसराव ॥ १ ॥
तीन चौथ बनाय दीन्ह्यौ, नाहिं जान्यौ भाव ।
पाय औसर चूक नाहीं, इहै आहै दाव ॥ २ ॥
तीर्थ ब्रत और दान पुन्यं, एह न मन में लाव ।
एह सब अहैं गुलाम भक्त के, सीस नाहीं नाव ॥ ३ ॥
त्यागु सर्वस आस मन तें, गगन गाँव बसाव ।
जगजिवनदास निहारि मूरति, नयन दरसन पाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द २९ ॥
जो कोइ यहि बिधि तीरथ न्हाय ॥ टेक ॥
मन का मैल लेइ मिसाय१, तब तिरबेनी घाट अन्हाय ॥ १ ॥
माया मोह दाल दै डारि, काम क्रोध मद देइ लुटाय ॥ २ ॥
काहे क कासी गंगहिं जाय, नाम तें मैलहिं डार छुड़ाय ॥ ३ ॥
जगजीवन दास कहै गोहराय,
बिन सतगुरु कोउ पार न जाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
ऐसी डोरि लगावहु पोढ़ि ।
टूटै डोरि लेहु फिरि जोरि ॥ १ ॥
जब लगि मुख तें कहिये बात ।
तब लगि नाम बिसरि मन जात ॥ २ ॥
जग प्रपंच संगति नहिं करिये ।
हिये नाम की रटना धरिये ॥ ३ ॥
चित माँ चित जो राखै लाय ।
ता पर काल कि कछु न बसाय ॥ ४ ॥
( १ ) उबटन लगा कर साफ करना ।
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