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सर्वकोश
जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

॥ शब्द १० ॥
बहुतक देखी देखा करहीं।
जोग जुक्ति कछु आवै नाहीं,
अंत भर्म महँ परहीं ॥ १ ॥
गे भरुहाइ१ अस्तुति जेइ कीन्हा,
मनहिं समुझि ना परई।
रहनी गहनी आवै नाहीं,
सब्द कहे तें लरई ॥ २ ॥
नहीं बिबेक कहै कछु औरै,
और ज्ञान कथि करई।
सुझि बूझि कछु आवै नाहीं,
भजन न एकौ सरई ॥ ३ ॥
कहा हमार जो मानै कोई,
सिद्धि सच चित धरई।
जगजीवन जो कहा न मानै,
झार२ जाय सो परई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ११ ॥
साधौ भक्ति सहजहि ध्यान ।
मनहिं ब्यापत साँचु नाहीं, कहा प्रात अस्नान ॥ १ ॥
कहा कंठी कंठ बाँधे, सैल्हि मुद्रा कान ।
कहा माला लै सुमिरनी, हिये नहिं पहिचान ॥ २