जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 101, कुल 110 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ | जगजीवन साहब की वानी
जगजीवन के चरन अधार ।
सतगुरु संत उतारहिं पार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३१ ॥
बिन वहि नाम तरै कोउ नाहीं ।
देखहु समुझि बूझि मन माहीं ॥ १ ॥
तीरथ ब्रत बहु भाँति कराय ।
जो पै अन्तर देखि न पाय ॥ २ ॥
जल तन धोय मैलि गा धोय ।
मन यहु नाम तें निर्मल होय ॥ ३ ॥
भूले करि षट कर्म अचार ।
याही तें भूला संसार ॥ ४ ॥
सहज डोरि जो राखै लाय ।
अंतर भजि तब भक्त कहाय ॥ ५ ॥
झूंठ साँच बहुत नहिं बोलै ।
रहि जग अपने मारग डोलै ॥ ६ ॥
रहै छिपित नहिं देइ जनाय ।
तब भजि अंतर भक्त कहाय ॥ ७ ॥
गर्ब गुमान त्यागि चलै चालू ।
दुख तेहिं देह न कबहुँ कालू ॥ ८ ॥
जगजीवन निर्मल निर्बान ।
सतगुरु चरन रहै धरि ध्यान ॥ ९ ॥
॥ शब्द ३२ ॥
मनुवाँ रहहु जिकिरि लगाय ।
और आस न राखु एकौ, देहु सब बिसराय ॥ १ ॥
कथा ग्रंथ पुकारि भाषैं, देत संत सिखाय ।
नाहिं एहि तें कछु उत्तम, त्यागि दे अमताय ॥ २ ॥