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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

गुरु और शब्द महिमा । ७५
तीर्थ तहवाँ बासु मूरति छवि जल अन्हाई ।
नेग कर्म भर्म छूटि छिनहिं निर्मल है जाई ॥ २ ॥
बिना नीर पिंड उदित उजियर तहँ दीपक बिनु छाई ।
अनूप रूप सुन्दरं ससि भानु जाहिं छिपाई ॥ ३ ॥
अस कर हम न साखि सो गुरु सत ना बिसराई ।
जगजिवनदास संत गुप्तं प्रगटहिं गोहराई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १८ ॥
अरे मन चरन तें रहु लागि ।
जोरि दुइ कर सीस दैकै, भक्ति बर ले माँगि ॥ १ ॥
और आसा झूठि आहे, गर्म जैसे आगि ।
परहिंगे सो जरहिंगे, पै देहु सर्ब तियागि ॥ २ ॥
समौ फिरि एहु पाइहै नहिं, सोउ नहिं गहि जागि ।
चेतु पाछिल सुद्धि करिकै, दरस रस रहु पागि ॥ ३ ॥
कठिन माया है अपरबल, संग सब के लागि ।
सूल तें कोइ बचे बिरले, गगन बैठे आगि ॥ ४ ॥
भर्म नहिं तहँ भयो निर्भय, सत्त रत बैरागि ।
जगजीवन निर्बान भे, गुरु दया जागे भागि ॥ ५ ॥
॥ शब्द १६ ॥
जब सुन सब्द मानै कोय ॥ टेक ॥
लाभ दिन दिन सुखित होवै, हानि कबहूँ न होय ।
देखि करि तेहिं मुक्ति नाहीं, नर्क परिहै सोय ॥ १ ॥
सब्द भाखै करै साँचा, सत्त सत्त समोय ।
पहुँच गे वे गगन घर माँ, काल खाय न कोय ॥ २ ॥
तहँ बैठि है निर्बान सतगुर, चरन गहि रहि सोय ।
जगजिवन ते अमर जुग जुग, आवा गवन न होय ॥ ३ ॥

७६ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द २० ॥
मन में मारि अगम जान ।
तोरु तैं यह बज्र धागा, होइहै नकसान ॥ १ ॥
गर्व और गुमान छाँड़हु, तजहु और तेवान ।
नाहिं थिर सब खाक होइहि, चलत जैसे बान ॥ २ ॥
पाँच और पचीस लैके, साँच भीतर आन ।
लाव धागा रहौ लागा, गगन कर मंडान ॥ ३ ॥
तहाँ सतगुरु बैठु तेहि ढिंग, निरखि करु पहिचान ।
जगजीवन चरनन सीस दै रहु, अनत करु न पयान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अरे मन रहहु रटना लाइ ॥ टेक ॥
नाहिं छूटै प्रीति कबहूँ, छाँड़ि दे गफिलाइ ।
जगत माया जार बंधा, अंध सूझि न आइ ॥ १ ॥
है सचेत अचेत हो नहिं, लेहु आपु बचाइ ।
चढ़हु गढ़ जहाँ गगन गुरु हैं, बैठु थिर ह्वै जाइ ॥ २ ॥
है मवासं पास चरनन, काल का डर नाहिं ।
जगजीवनदास निहार मूरति, तकहु इक-टक लाइ ॥ ३ ॥
॥ शब्द २२ ॥
मन यह नाम बिसरि न जाय ॥ टेक ॥
मूल मंत्र इहै आहै, दियो ज्ञान बताइ ।
नाम समता नहीं है कछु, अंत काहु न पाइ ॥ १ ॥
नाम बल ससि भानु रथ, चढ़ि अधर गगन उड़ाइ ।
नाम को बल पाइ हनुमंत, लंक जारयो जाइ ॥ २ ॥
सेस ब्रह्मा बिस्नु संकर, रहे ताड़ी लाइ ।
जगजीवन बिस्वास करि, गुरु चरन रहु लिपटाइ ॥ ३ ॥

गुरु और शब्द महिमा। ७७
॥ शब्द २३ ॥
मन तुम करहु गगन मँडान ।
त्यागि दे सब जगत आसा, निरख सो निर्बान ॥ १ ॥
सिद्ध साध औ कहत जोगी, भला है अस्थान ।
मारि आसन बैठु दृढ़ है, अनत करु न पयान ॥ २ ॥
बैठि रहिये पास सतगुर, देखि सिखिये ज्ञान ।
रहहु ऐसे लागि जुग जुग, मानिये परमान ॥ ३ ॥
देखि नैनन चाखि अमृत, रहिय है मस्तान ।
जगजीवन सतगुरू चरनन, सीस करु कुरबान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २४ ॥
गुरु बलिहारियाँ मैं जाउँ ॥ टेक ॥
डोरि लागी पोढ़ि, अब मैं जपहुँ तुम्हरा नाउँ ।
नहीं इत उत जात मनुवाँ, गगन बासा गाउँ ॥ १ ॥
महा निर्मल रूप छबि सत, निरखि नैन अन्हाउँ ।
नहीं दुख सुख भर्म व्यापै, तप्त नीचे आउँ ॥ २ ॥
मारि आसन बैठि थिर है, काहु नाहि डेराउँ ।
जगजीवन निर्बान भे, सत सदा संगी आउँ ॥ ३ ॥
॥ शब्द २५ ॥
मोर दिल भयो मतवारा ।
मैं तौ प्रभु के चरनन लाग्यो, बावर कहै संसारा ॥ १ ॥
अधर बैठि अमृत रस पीवौं, नाम कै करत पुकारा ।
जगजीवन सतगुर को भेंटे, उतरे भव जल पारा ॥ २ ॥
॥ शब्द २६ ॥
साधो सुमिरन भजन करो ।
मन महँ दुबिधा आनहु नाही, सहजहिं ध्यान धरो ॥ १ ॥

७८ जगजीवन साहब की बानी
धीरज धरि संसय नहिं राखहु, नाम भरोसे रहो।
जगजीवन सतगुरु को भेंटो, भवजल पार तरो॥ २॥
॥ शब्द २७ ॥
देखो री जोगिया रहत कहाँ।
तीनि लोक महँ माया बसत है,
चौथे लोक रहत है तहाँ॥ १॥
अरध सिंहासन बनो अहै री,
जोगी बैठि रहत है तहाँ।
जगजीवन संतन महँ खोजो,
कर बिचार अपने मन महाँ॥ २॥
॥ शब्द २८ ॥
यहु मन गगन मंदिल राखु।
सब्द की चढ़ देखु सीढ़ी, प्रेम रस तहँ चाखु॥ १॥
रहहु दृढ़ करि मारि आसन, मंत्र अजपा भाखु।
मते गुरुमुख होहु तहवाँ, जगत आस न राखु॥ २॥
पाँच बसि कसि बैठि रहिकै, मानु कबहुँ न माखु।
ईस अहहि पचीस इन कै, सदा मन हित वाखु॥ ३॥
देहु सब बिसराइ करिकै, एही धंधे लागु।
जगजिवनदास निरखि करिकै, नयन दर्सन माँगु॥ ४॥
॥ शब्द २६ ॥
नामहिं बड़े भाग तें पायो।
नेग जन्म लहि भ्रमत बीता,
सूझि बूझि नहिं आयो॥ १॥
अब की सँवारु इहै करै का,
जो बिगार करि आयो।

गुरु और शब्द महिमा । ७६
किरपा करि निरबाह करन कहँ,
अवसर भल इह पायो ॥ २ ॥
हूक चूक होत मन मोरे,
जब तब रहि बिसरायो ।
अब निःसंक नाहिं डेर लागत,
जब तें मंत्र सिखायो ॥ ३ ॥
अजपा जपि चढ़ि गयो गगन कहँ,
सतगुर दरस दिखायो ।
जगजीवन बिस्वास बास मे,
चरनन सीस लगायो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
मैं देख्यों निरखि निहारि मूरति पर वारी ॥टेक॥
भा बिस्वास पास बासा करि,
दुनिया सकल बिसारी ।
चमकत दृष्टि बरनि नहिं आवै,
बिनु दीपक उजियारी ॥ १ ॥
नीर पिंड बिनु रूप बिराजत,
रबि ससि की छबि वारी ।
अस निर्गुन निर्बान अमूरति,
सिव बिरंच लाये ताड़ी ॥ २ ॥
सब्द कहत अस प्रगट पुकारे,
बिरले कोउ जन लेहिं बिचारी ।
जगजीवन के सतगुरु समरथ,
सीस ताहि के चरनन वारी ॥ ३ ॥

८०
जगजीवन साहब की बानी

॥ शब्द ३१ ॥
चरनन में लागी रहिहौं री ॥ टेक ॥
और रूप सब तिरथ बतावै,
जल नहिं पैठ नहैहौं री ।
रहिहौं बैठि नयन तें निरखत,
अनत न कतहूँ जैहौं री ॥ १ ॥
तुम्हों तें मन लाइ रहिहौं,
और नहीं मन अनिहौं री ।
जगजीवन के सतगुरु समरथ,
निर्मल नाम गहि रहिहौं री ॥ २ ॥
॥ शब्द ३२ ॥
सुरति बसी मन नाम फिरत मतवारी ॥ टेक ॥
चित तौ लाग्यो अपने पिय सों,
डग मग पाँव न जात सँभारी ।
अंतर देखि चुपाइ रहिउँ मैं,
सूरति तुम्हरी रहिउँ निहारी ॥ १ ॥
सूरति पर मूरति वह साँची,
सो मैं रहि हौं नाहिं बिसारी ।
जगजीवन सतगुरु कै मूरति,
सो मैं रहिउँ सँभारी ॥ २ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
बनत न कतहूँ अनत न जाय ।
देखहु चरन सरन ठहराय ॥ १ ॥
नीचे तकत ऊँचे काँ जाय ।
गगन मंडल माँ तब ठहराय ॥ २ ॥

गुरु और शब्द महिमा। ८१
बिन कर चरन पकरि कस जाय।
सिर नहिं माथ रहै लपटाय ॥ ३ ॥
स्त्रवन बिहूना सुनि धुनि आय।
नैन बिहून दरस तकि पाय ॥ ४ ॥
जगजीवन अस मत जेहिं आय।
मिलि सत मत तब सिद्ध कहाय ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
साधौ कहै तौ कहा न जाय।
आपन घर मत कोइ न बूझै,
हमहिं कहै समुझाय ॥ १ ॥
पंडित जोगी दंडी तपसी,
बहु बिबाद करैं धाय।
नाहिन नाम की ओर गही तिन्ह,
तीरथ बर्त लौ लाय ॥ २ ॥
नाहिन काहू जीत कहाँ लहि,
कहँ लहि कहै समुझाय।
करै जाइ तस जेहिं जस भावै,
भुग्तै तैसे आय ॥ ३ ॥
बिरला कोई भजन करतु है,
चाल चलै दिनताय।
जगजीवन सतगुरु की मूरति,
चरन रहे लपटाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
महिमा प्रभु मो सों वरनि न जाय ॥ टेक ॥
अनहद बानी मूरति बोलै, सुनहु संत चित लाय।
अनहद ताल पखावज बाजै, तहाँ सुरति चलि जाय ॥ १ ॥

अवर न रूप कहाँ लहि बरनों, सब छवि रहे समाय।
जगजीवन साँई कहँ लहि बरनौ, रहे चरन चितलाय ॥ २ ॥
॥ शब्द ३६ ॥
तीरथ ब्रत की तजि दे आसा।
सत्त नाम की रटना करि कै,
गगन मँडल चढ़ि देखु तमासा ॥ १ ॥
ताहि मँदिल का अंत नहीं कछु,
रबी बिहून किरिन परगासा।
तहाँ निरास वास करि रहिये,
काहे क भरमत फिरै उदासा ॥ २ ॥
देउँ लखाय छिपावहुँ नाहीं,
जस मैं देखेउँ अपने पासा।
ऐसा कोऊ सब्द सुनि समुझै,
कटि अघ कर्म होइ तब दासा ॥ ३ ॥
नैन चाखि दरसन रस पीवै,
ताहि नहीं है जम की त्रासा।
जगजिवन दास करम तेहि नाहीं,
गुरु के चरन करै सुख बिलासा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३७ ॥
चलु चढ़ौं अटरिया धाई री।
महल म टहल करै नहिं पाई,
करिये कौन उपाई री ॥ १ ॥
यहँ तौ बैरी बहुत हमारे,
तिन तें कछु न बसाई री।
पाँच पचीस निस दिन संतावहिं,
राखा इन अरुझाई री ॥ २ ॥

गुरु और शब्द महिमा । ८६
साँई तो निकट बैठि सुख बिलसहि,
जोतिहि जोति मिलाई री ।
जगजीवन दास अपनाय लेहिं वै,
नाहीं जीव डेराई री ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३८ ॥
नाम बिनु केहि काम का कह जीवनं संसार ॥ टेक ॥
आपनो जग कहत आहै कठिन माया जार ॥ १ ॥
लाग धागा गरे बाँधे नाहिं छूटनहार ॥ २ ॥
दास बास विस्वास जगतं निरखि रूप निहार ॥ ३ ॥
जगजीवन कोइ अहँ बिरले उतरि होवैं पार ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३९ ॥
नाम रटि रटत त्रकुटी गगन चढ़ि आयउँ ॥ टेक ॥
मैं तैं पचीस पाँच डोरि एक लायउँ ।
मैं तौ रँग संग भयो सीस ताहि नायउँ ॥ १ ॥
सतगुरु से पाय भेद जगत नाहिं आयउँ ।
मिटेव अँधकार, ज्यों भानु भे प्रकास,
निरखि दृष्टि आयउँ ॥ २ ॥
जुगति किये रहै ऐसी प्रगट सो बतायउँ ।
जगजीवन दास अम्मर भे जुग जुग जस गायउँ ॥ ३ ॥
॥ शब्द ४० ॥
भक्त जक्त त्यागि जागि लागि बरन रहु रे ॥ टेक ॥
जग प्रसंग ध्यान भंग जानि हानि तजु रे ।
रहु इकंत तंत१ लागि जानि नाम गहु रे ॥ १ ॥
पाँच औ पचीस डोरि पोढ़ि बाँधि रहु रे ।
साधि चित्त निश्च भाव चरनन गुरु परु रे ॥ २ ॥
(१) तत्व ।

८४ जगजीवन साहब की बानी
रहि निहारि निरखि रूप अनत नाहिं टरु रे ।
जुक्ति जोग भक्ति का उपदेस ऐसे करु रे ॥ ३ ॥
पाय खा अघाय अमी जुग जुग नहिं मरु रे ।
जगजिवन दास आस राखु नाहिं फाँस परु रे ॥ ४ ॥
कर्म भर्म निषेध और उपदेश सतगुरु व शब्द भक्ति का ।
॥ शब्द १ ॥
हे मन थकहु तो तकहु निसान ।
बैठहु मंडफ लाय धुनि धुनो, अनत करु न पयान ॥ १ ॥
पाँच पचीस लगाय धागा, बाँधि रहु ठहरान ।
नैन दरसन नीर पीवै, चाखि भे मस्तान ॥ २ ॥
नाहिं दुख सुख पवन पानी, नाहि ससि नहिं भान ।
नाहिं ब्रह्मा सिवं सक्ती, निर्गुनं निरवान ॥ ३ ॥
दियो दुइ कर सीस चरनन, नाहिं भावै आन ।
जगजीवन ते भये गुरमुख, अमर जोग दृढ़ान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
कर न सुमिरिनी लेहु, अंतर धुनि लावहु रे ।
मैं तैं माला डारि देहु, तुम दीन लीन ह्वै गावहु रे ॥ १ ॥
जो मनुवाँ करि खाक रहहु, वहि काहेक लगावहु रे१ ।
चंदन चरन टेक रहु निर्भय, काहेक भौजल आवहु रे ॥ २ ॥
एहु उपदेस कहि तुमहिं सुनावहुँ, मन अँदेस बिसरावहु रे ।
जगजीवन दास निहारि निरख कै, सुरति म सुरत मिलावहु रे ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३ ॥
साँई मोहिं सब कहत अनारी ।
हम कहँ कहत अजान अहँ यह, चतुर सबै संसारी ॥ १ ॥
( १ ) जब मन को खाक कर डाला तो भभूत लगाने का क्या काम है ।

कर्म भर्म निषेध। ८५
अहै अभेद भेद नहिं जानत, सिखि पढ़ि कहत पुकारी।
देखि करत सो आवत नाहीं, डारिन यजन बिगारी ॥ २ ॥
कहा कहौं मन समुझि रहत हौं, देख्यौं दृष्टि पसारी।
समुझाये कोइ मानत नाहीं, कपट बहुत अधिकारी ॥ ३ ॥
बिरले कोइ जन करत बंदगी, मैं तैं डारत मारी।
जगजीवन गुरु चरन सीस दै, निरखत रूप निहारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
संत कह्यौ रमज१ से बानी।
तत्त सार बताय दीन्ह्यो, काहू भेद न जानी ॥ १ ॥
बहुतक अंधे बंधे माया, आहहिं गर्व गुमानी।
समुझाये जे समुझत नाहीं, होइहि तिन की हानी ॥ २ ॥
साधन की गति कहि नहिं आवै, केहि मुख कहौं बखानी।
जगजीवन चरनन तें लागे, निरखि जोति निर्बानी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५ ॥
दुनियाँ हमहिं सिखावत ज्ञान।
आपु तौ भवजाल भूले, हमहिं कहैं हैवान ॥ १ ॥
गुणन तें मन गूंथि करि कै, करत प्रगट बखान।
नाहिं बूझत सूझ नाहीं, लागि नहिं हिय बान ॥ २ ॥
धाइ धाइ सिखाइ औरै, दोऊ भरम भुलान।
करत अहिं अस देखि नैनन, प्रगट भाखौं ज्ञान ॥ ३ ॥
बहुत फूलि कै भूलि परि हाँहिं, होइ है नुकसान।
जगजीवन जानत अहै सब, नाहिं कछू छिपान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
साधौ नाम भजन जिन ठाना।
केतौ कोइ समुझाय सिखावत,
मनहिं न आवत आना ॥ १ ॥
(१) भेद।

८ जगजीवन साहिब की बानी
तीरथ ब्रत और दान तपस्या,
नाहीं एकौ माना।
सब बिसराइ मनहि नहिं आवत,
ध्यान धरै निर्बाना ॥ २ ॥
निरखत निर्मल जोति सदा वै,
तज दिये पानि१ पखाना२।
तस आचार बिचार हैं उनके,
काहू गति नहिं जाना ॥ ३ ॥
सतगुरु पासहिं बास किहे हहिं,
नाहीं और तेवाना३।
जगजीवन गुरु चरनन लागे,
आपुहिं करै निभाना४ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
साधौ बिन किरपा भक्ति न होय।
रात दिन जो करै बंदगी, कबूल परै नहिं सोय ॥ १ ॥
जज्ञ जान उदान५ बास करै, कंदमूरि भखि सोय।
बरत रहै अस्नान तीरथ, भक्ति तबहुँ न होय ॥ २ ॥
पढ़ै चारौ बेद बिद्या, ज्ञान कबिता होय।
मौन ह्वै कै लाय तारी, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ३ ॥
काया कासी जाय कल्पै, डारि सर्बस खोय।
द्वारिका भुज लेय छापा, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ४ ॥
मुड़ाइ मूड़ औ पहिरि माला, भ्रमत फिरै सब कोय।
धीच६ तूरै करि तपस्या, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ५ ॥
(१) पानी। (२) पत्थर। (३) फ़िक्र।' (४) निबाह। (५) पाँच मुख्य पवन
में से शरीर की स्थिति है यह हैं-प्रान, अपान, व्यान, उदान, समान। (६) प्राणायाम

कर्म भर्म निषेध । ८७
पाँच अगिन तन दहि भूल भूला, पवन भच्छै सोय ।
बाँह तूरै रहहि ठाढ़े, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ६ ॥
लाइ अंग बिभूति जोगी, नारि रत नहिं होय ।
तजै माया मुलुक सर्बस, भक्ति तबहुँ न होय ॥ ७ ॥
कृपा भै दिनताइ आई, सुमन मन भा सोय ।
जगजिवन डोरी लाय पोढ़ी, रह्यो चरन समोय ॥ ८ ॥
॥ शब्द ८ ॥
साधौ नाम चाखि बौराना ॥ टेक ॥
लागे रहें चरन तें निसि दिन, भावै और न आना ।
तजो अचार बिचार जगत को, सब तें रहि बिलगाना ॥ १ ॥
उन कै गति कोउ जानत नाहीं, को करि सकै बखाना ।
मरि कै अमर भये हैं सोई, भये हैं सिद्ध निमाना ॥ २ ॥
हेत आस नहिं राखै काहू, गुरु निरखहिं निरबाना ।
जगजीवन वै सांई मिलिगे, परगट करहुँ बखाना ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६ ॥
साधौ देखहु अंतर माहीं ।
भाँवरि भवन दिहे रहि रहिये,
अवर अहै कछु नाहीं ॥ १ ॥
बड़ बिस्तार अहै काया का,
अंत खोज कछु नाहीं ।
जिन खोजा पाया काया महँ,
बहुतेक भर्म भुलाहीं ॥ २ ॥
पाँच पचीस डोरि बसि करिये,
बत्तु गुरु अहै ताहीं ।
जगजीवन निर्बानी मूरति,
मिलिगे सूरत माहीं ॥ ३ ॥

॥ शब्द १० ॥
बहुतक देखी देखा करहीं।
जोग जुक्ति कछु आवै नाहीं,
अंत भर्म महँ परहीं ॥ १ ॥
गे भरुहाइ१ अस्तुति जेइ कीन्हा,
मनहिं समुझि ना परई।
रहनी गहनी आवै नाहीं,
सब्द कहे तें लरई ॥ २ ॥
नहीं बिबेक कहै कछु औरै,
और ज्ञान कथि करई।
सुझि बूझि कछु आवै नाहीं,
भजन न एकौ सरई ॥ ३ ॥
कहा हमार जो मानै कोई,
सिद्धि सच चित धरई।
जगजीवन जो कहा न मानै,
झार२ जाय सो परई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ११ ॥
साधौ भक्ति सहजहि ध्यान ।
मनहिं ब्यापत साँचु नाहीं, कहा प्रात अस्नान ॥ १ ॥
कहा कंठी कंठ बाँधे, सैल्हि मुद्रा कान ।
कहा माला लै सुमिरनी, हिये नहिं पहिचान ॥ २

ठाढ़ बैठे घोंच तूरहिं, तकत हैं असमान ।
वृथा सब परतीत बिनु है, भ्रम भूले हैवान ॥ ५ ॥
खोज काया करहु थिर मन, त्यागि कपट सयान ।
भजहु अंतर नाम वाहै, राम सत्त प्रमान ॥ ६ ॥
लाउ रसना नाहिं बिसरै, प्रगट करु न बखान ।
जगजीवन बिस्वास निरमल, होहु जैसे भान ॥ ७ ॥
॥ शब्द १२ ॥
बौरे मन को नहिं भरमाव ।
तीन लोक के करता साँई, ताहि सों ध्यान लगाव ॥ १ ॥
तीरथ कोटि साज जिन कीन्हेउ, सो संतन हिये आव ।
चढ़ि कै गगन देखु सूरति को, ताहि काँ सीस नवाव ॥ २ ॥
सूरति सत्त प्रेम रस पानी, ताहि में चित अन्हवाव ।
अमर होहु भवसागर उतरहु, नहिं आवहु नहिं जाव ॥ ३ ॥
सतगुरु सत्त कहा यहि बानी, अलख नाम धुनि लाव ।
जगजीवन साहब को छबि में, आपनि सुरति समाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मन गृह ग्राम यह अस्थान ।
सात दोप नव खंड पृथ्वी, सिर उर तेहि माँ जान ॥ १ ॥
तीनि लोक बिस्तार है तेहिं, रमत गन ससि भान ।
चौथ इहै बनाय दोन्ह्यौ, संत राखत ध्यान ॥ २ ॥
दरवाज नौ दस प्रगट आहैं, काहु तें न छिपान ।
रमत तेहि के ब्रह्म भीतर, नहीं कहुँ बिलगान ॥ ३ ॥
काया भीतर खेल खेलहु, अनत करु न पयान ।
बाहर तौ सब देखिबे को, घट अहै सो प्रमान ॥ ४ ॥
कहत हौं उपदेस छोड़ु, अँदेस रहु ठहरान ।
जगजीवन निर्बान सतगुरु, चरन रहु लिपटान ॥ ५ ॥

६० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १४ ॥
मन तुम रहहु चरन सरनाई ।
यहि काया का अंत खोज नहिं, काहू भेद न पाई ॥ १ ॥
तीनि लोक काया रचि दीन्ह्यौ, चौथा दीन्ह बनाई ।
तीरथ कोटि अहैं याही में, संतन दीन्ह बताई ॥ २ ॥
अजपा जाप जपत रहु निसु दिन, प्रगट न देहु जनाई ।
इहि तें मंत्र नहीं है एकौ, भर्म न परहु भुलाई ॥ ३ ॥
सेस महेस बिस्नु औ ब्रह्मा, रहे हैं ध्यान लगाई ।
निर्गुन निरंकार वह मूरति, तेहि माँ रहौ समाई ॥ ४ ॥
रहु ठहराय गगन करु बासा, निरखि देखु निरथाई ।
जगजीवन सतगुरु की मूरति, रबि ससि छवि छिपि जाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द १५ ॥
साधौ भेष बाँधि गफिलाने ।
रहै अभेष भेद तब छूटहि, सहज रीति मन जाने ॥ १ ॥
जब तें माला कंठी पहिरी, गर्ब भयो इतराने ।

कर्म भर्म निषेध। ६१
दान पुन्यं करि तपस्या, बर्त बहुत रहाहिं।
त्यागि बस्ती बैठि बन महँ, कंदमूरहिं खाहिं ॥ २ ॥
पाठ करि पढ़ि बहुत बिद्या, रैन दिनहिं बकाहिं।
गाय बहुत बजाइ बाजा, मनहिं समुझत नाहिं ॥ ३ ॥
करहिं स्वाँसा बंद कष्टित, भाँड़ की गति आहिं।
साधि पवन चढ़ाय गगनहिं, कमल उलटै नाहिं ॥ ४ ॥
साध नहिं केहु कीन ऐसे, सिखे बहुत कहाहिं।
प्रीति रस मन नाहिं उपजत, परे ते भव माहिं ॥ ५ ॥
जस सँजोग बियोग तैसे, तत अच्छर दुइ आहिं।
रटत अंतर भेंट गुरु तैं, मंत्र अजपा माहिं ॥ ६ ॥
कहौं प्रगट पुकारि जेहि के, प्रीति अंतर आहिं।
जगजीवन दासँ रीति अस,
तब चरन महँ मिलि जाहिं ॥ ७ ॥
॥ शब्द १७ ॥
चरन सरन रहौं, कहूँ अंतै नाहिं जाऊँ ॥ टेक ॥
रही पास किहे बास, त्यागि सर्ब और आस,
भजत रहौं नाऊँ ॥ १ ॥
तीनि त्यागि चौथ तत्त, पाँह बैठि निरभय ह्वै,
तकौं ना उराऊँ१ ॥ २ ॥
मारि आसन रहौं बैठि, नैनन टक लाय डोरि,
निरमल सत नीर पाइ, नित्त सो अन्हाऊँ ॥ ३ ॥
जुग जुग जग बैठि संग, मगन रसँ तेहि रंग,
जगजीवन दास सतगुरु सो, चेला ताहि क आऊँ२ ॥ ४ ॥
(१) दूसरी ओर। (२) हूँ।

६२ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १८ ॥
सब खाकहि मिलिहै रे भाई ।
किया चहहु कर लेहु बंदगी, मन तें छाँड़हु गफिलाई ॥ १ ॥
भूलै फूलै देखि न दौलत, काहु क संग न जाई ।
पैदा भये निपैद भये ते, केहु की खबर न केह पाई ॥ २ ॥
कहँ धौं गये कहाँ धौं वह घर, कहाँ जाइ धौं रहे समाई ।
छत्री जोधा जोगी दानौ१, काल लीन्ह सब खाई ॥ ३ ॥
बचा नहीं कोउ ना कोइ बचिहै, मन्द कहत गोहराई ।
जगजिवन दास नाम गहि उबरे, सतगुर चरनन सरनाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १९ ॥
बहु पद जोरि जोरि करि गावहिं ।
साधन कहा सो काटि कपटि२ कै,
अपन कहा गोहरावहिं ॥ १ ॥
निंदा करहिं विवाद जहाँ तहँ,
बक्ता बड़े कहावहिं ।
आपु अंध कुछ चेतत नाहीं,
औरन अर्थ बतावहिं ॥ २ ॥
जो कोउ नाम का भजन करत है,
तेहि कौं कहि भरमावहिं ।
माला मुद्रा भेष किये बहु,
जग परमोधि३ पुजावहिं ॥ ३ ॥
जहँ ते आये सो सुधि नाहीं,
झगरे जन्म गँवावहिं ।
जगजीवन ते निन्दक बादी,
बास नर्क महँ पावहिं ॥ ४ ॥
(१) राक्षस । (२) काट छाँट कर । (३) राजी कर के ।

कर्म भर्म निषेध । ६३.
॥ शब्द २० ॥
अन्तर जो कोउ नाम धुनि लावै ।
अजपा रसना सदा लागि रहै, नाहीं भेद बतावै ॥ १ ॥
इत उत आस निरास होय जब, मन अस्थिर लै पावै ।
रहै ठहराय सिखर है सीतल, निरखि रूप तब आवै ॥ २ ॥
देखत अहै सुनत है सरवन, काहेक कहि गोहरावै ।
भयो मस्त रस पाय अमृतै, काहेक घंट बजावै ॥ ३ ॥
तब बैराग भयो अनुरागी, काल निकट नहिं आवै ।
जगजीवन सतगुरु की किरपा, नहिं आवै नहिं जावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अब तौ ज्ञान कथै को भाई ।
सब्द कहत सो मानत नाहीं, केतौ कहि समुझाई ॥ १ ॥
भेष जगत सब भूले मैं तैं, सुमति न हिये समाई ।
बहु जलधर बरषहिं पखान पर, सोखत नाहीं जाई१ ॥ २ ॥
दोख परत सब हिये सबहिन का, सुरति नाहिं ठहराई ।
जहाँ तहाँ भरमत बीतत है, नाहीं भजन दृढ़ाई ॥ ३ ॥
बहु अभिमान गुमान गर्ब तैं, करहिं बाद अधिकाई ।
सो करतूति भुगुति है काया, परै नर्क में जाई ॥ ४ ॥
कोइ कोइ जन मन को थिर राखैं, अन्तर रटनि लगाई ।
जगजीवन ते भक्त कहाये, सतगुरु लीन्ह सिखाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द २२ ॥
और कछु मंत्र नाम सम नाहिं ।
चलै न जिभ्या मुख नहिं बोलै, रटत रहै मन माहिं ॥ १ ॥
(१) जैसे बादल कितनाहीं मेंह बरसाते हैं पर पत्थर के भीतर नहीं
धसता इसी तरह जगत भेष को जितना चाहे उपदेश करो पर हृदय में असर
नहीं करता ।

६४' जगजीवन साहब की बानी
कोउ कासी कोउ जात द्वारकै, हित कर तीरथ न्हाहिं ।
कोउ ब्रत दान अचार करै बहु, कोऊ तपस्यहिं जाहिं ॥ २ ॥
तूरत बाहैं धींच गगन मुख१, उलटी धूम घुटाहिं२ ।
पीवत दूध दूब फल बन के, कंद मूरि खनि३ खाहिं ॥ ३ ॥
कोउ रहैं ठाढे कोउ रहैं बैठै, कोउ होइ जोगी जोग कराहिं ।
कोउ जागै निसि दिन नहिं सोवैं, कोउ दम साध रहाहिं ॥ ४ ॥
जज्ञ राग रस निर्त रंग कबि, ज्ञानी ज्ञान कथाहिं ।
पंडित कथा पुरान बखानहिं, पढ़तै जन्म सिराहिं४ ॥ ५ ॥
माला मुद्रा भस्म लगावहिं, चंदन तिलक कराहिं ।
सलिग्राम औ पीतर पुतरी, पूजि पूजि हरषाहिं ॥ ६ ॥
एह सब करै सरै न भजन बिन, मन थिर होवै नाहिं ।
परहिं आय भौजाल फेरि फिरि, समुझि समुझि पछिताहिं ॥ ७ ॥