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सर्वकोश
जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

७८ जगजीवन साहब की बानी
धीरज धरि संसय नहिं राखहु, नाम भरोसे रहो।
जगजीवन सतगुरु को भेंटो, भवजल पार तरो॥ २॥
॥ शब्द २७ ॥
देखो री जोगिया रहत कहाँ।
तीनि लोक महँ माया बसत है,
चौथे लोक रहत है तहाँ॥ १॥
अरध सिंहासन बनो अहै री,
जोगी बैठि रहत है तहाँ।
जगजीवन संतन महँ खोजो,
कर बिचार अपने मन महाँ॥ २॥
॥ शब्द २८ ॥
यहु मन गगन मंदिल राखु।
सब्द की चढ़ देखु सीढ़ी, प्रेम रस तहँ चाखु॥ १॥
रहहु दृढ़ करि मारि आसन, मंत्र अजपा भाखु।
मते गुरुमुख होहु तहवाँ, जगत आस न राखु॥ २॥
पाँच बसि कसि बैठि रहिकै, मानु कबहुँ न माखु।
ईस अहहि पचीस इन कै, सदा मन हित वाखु॥ ३॥
देहु सब बिसराइ करिकै, एही धंधे लागु।
जगजिवनदास निरखि करिकै, नयन दर्सन माँगु॥ ४॥
॥ शब्द २६ ॥
नामहिं बड़े भाग तें पायो।
नेग जन्म लहि भ्रमत बीता,
सूझि बूझि नहिं आयो॥ १॥
अब की सँवारु इहै करै का,
जो बिगार करि आयो।