जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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॥ शब्द २० ॥
मन में मारि अगम जान ।
तोरु तैं यह बज्र धागा, होइहै नकसान ॥ १ ॥
गर्व और गुमान छाँड़हु, तजहु और तेवान ।
नाहिं थिर सब खाक होइहि, चलत जैसे बान ॥ २ ॥
पाँच और पचीस लैके, साँच भीतर आन ।
लाव धागा रहौ लागा, गगन कर मंडान ॥ ३ ॥
तहाँ सतगुरु बैठु तेहि ढिंग, निरखि करु पहिचान ।
जगजीवन चरनन सीस दै रहु, अनत करु न पयान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अरे मन रहहु रटना लाइ ॥ टेक ॥
नाहिं छूटै प्रीति कबहूँ, छाँड़ि दे गफिलाइ ।
जगत माया जार बंधा, अंध सूझि न आइ ॥ १ ॥
है सचेत अचेत हो नहिं, लेहु आपु बचाइ ।
चढ़हु गढ़ जहाँ गगन गुरु हैं, बैठु थिर ह्वै जाइ ॥ २ ॥
है मवासं पास चरनन, काल का डर नाहिं ।
जगजीवनदास निहार मूरति, तकहु इक-टक लाइ ॥ ३ ॥
॥ शब्द २२ ॥
मन यह नाम बिसरि न जाय ॥ टेक ॥
मूल मंत्र इहै आहै, दियो ज्ञान बताइ ।
नाम समता नहीं है कछु, अंत काहु न पाइ ॥ १ ॥
नाम बल ससि भानु रथ, चढ़ि अधर गगन उड़ाइ ।
नाम को बल पाइ हनुमंत, लंक जारयो जाइ ॥ २ ॥
सेस ब्रह्मा बिस्नु संकर, रहे ताड़ी लाइ ।
जगजीवन बिस्वास करि, गुरु चरन रहु लिपटाइ ॥ ३ ॥