जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरु और शब्द महिमा । ७५
तीर्थ तहवाँ बासु मूरति छवि जल अन्हाई ।
नेग कर्म भर्म छूटि छिनहिं निर्मल है जाई ॥ २ ॥
बिना नीर पिंड उदित उजियर तहँ दीपक बिनु छाई ।
अनूप रूप सुन्दरं ससि भानु जाहिं छिपाई ॥ ३ ॥
अस कर हम न साखि सो गुरु सत ना बिसराई ।
जगजिवनदास संत गुप्तं प्रगटहिं गोहराई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १८ ॥
अरे मन चरन तें रहु लागि ।
जोरि दुइ कर सीस दैकै, भक्ति बर ले माँगि ॥ १ ॥
और आसा झूठि आहे, गर्म जैसे आगि ।
परहिंगे सो जरहिंगे, पै देहु सर्ब तियागि ॥ २ ॥
समौ फिरि एहु पाइहै नहिं, सोउ नहिं गहि जागि ।
चेतु पाछिल सुद्धि करिकै, दरस रस रहु पागि ॥ ३ ॥
कठिन माया है अपरबल, संग सब के लागि ।
सूल तें कोइ बचे बिरले, गगन बैठे आगि ॥ ४ ॥
भर्म नहिं तहँ भयो निर्भय, सत्त रत बैरागि ।
जगजीवन निर्बान भे, गुरु दया जागे भागि ॥ ५ ॥
॥ शब्द १६ ॥
जब सुन सब्द मानै कोय ॥ टेक ॥
लाभ दिन दिन सुखित होवै, हानि कबहूँ न होय ।
देखि करि तेहिं मुक्ति नाहीं, नर्क परिहै सोय ॥ १ ॥
सब्द भाखै करै साँचा, सत्त सत्त समोय ।
पहुँच गे वे गगन घर माँ, काल खाय न कोय ॥ २ ॥
तहँ बैठि है निर्बान सतगुर, चरन गहि रहि सोय ।
जगजिवन ते अमर जुग जुग, आवा गवन न होय ॥ ३ ॥