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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

गुरु और शब्द महिमा। ७७
॥ शब्द २३ ॥
मन तुम करहु गगन मँडान ।
त्यागि दे सब जगत आसा, निरख सो निर्बान ॥ १ ॥
सिद्ध साध औ कहत जोगी, भला है अस्थान ।
मारि आसन बैठु दृढ़ है, अनत करु न पयान ॥ २ ॥
बैठि रहिये पास सतगुर, देखि सिखिये ज्ञान ।
रहहु ऐसे लागि जुग जुग, मानिये परमान ॥ ३ ॥
देखि नैनन चाखि अमृत, रहिय है मस्तान ।
जगजीवन सतगुरू चरनन, सीस करु कुरबान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २४ ॥
गुरु बलिहारियाँ मैं जाउँ ॥ टेक ॥
डोरि लागी पोढ़ि, अब मैं जपहुँ तुम्हरा नाउँ ।
नहीं इत उत जात मनुवाँ, गगन बासा गाउँ ॥ १ ॥
महा निर्मल रूप छबि सत, निरखि नैन अन्हाउँ ।
नहीं दुख सुख भर्म व्यापै, तप्त नीचे आउँ ॥ २ ॥
मारि आसन बैठि थिर है, काहु नाहि डेराउँ ।
जगजीवन निर्बान भे, सत सदा संगी आउँ ॥ ३ ॥
॥ शब्द २५ ॥
मोर दिल भयो मतवारा ।
मैं तौ प्रभु के चरनन लाग्यो, बावर कहै संसारा ॥ १ ॥
अधर बैठि अमृत रस पीवौं, नाम कै करत पुकारा ।
जगजीवन सतगुर को भेंटे, उतरे भव जल पारा ॥ २ ॥
॥ शब्द २६ ॥
साधो सुमिरन भजन करो ।
मन महँ दुबिधा आनहु नाही, सहजहिं ध्यान धरो ॥ १ ॥