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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

६२ जगजीवन साहब की वानी
जामा पहिरि भयो मस्तान ।
रह दस मास न किह्यो तेवान१ ॥ ४ ॥
जरयो नहीं अगिनी महँ अंग ।
बाहर होत भयो चित भंग ॥ ५ ॥
गोद लाय फिरि दूध पियाई ।
जुबा में जुबती बहुत हिताई ॥ ६ ॥
कामी करम गयो सब भूले ।
मुक्के खात रहहु गे झूले ॥ ७ ॥
बृद्ध भयो तब बुद्धि सँभारि ।
तब नहि सुमिरन जात सँवारि ॥ ८ ॥
कफ खाँसी औ सीत सताइ ।
सँवरि सँवरि२ तब रहि पछिताइ ॥ ६ ॥
उलटि लगाय रह्यो दृढ़ डोरी ।
कहौं सिखाय रह्यो मन मोरी ॥ १० ॥
जगजीवन सत मत गहि डोरी ।
ससि चकोर ज्यों रहि टक जोरी ॥ ११ ॥
॥ शब्द ६८ ॥
साधो भजहु नाम मन लाइ ।
बहुरि नहीं अस औसर पाइ ॥ १ ॥
अब के चूका चूका सोइ ।
बहुरे नाहि सँवारहि कोइ ॥ २ ॥
माया मोह तकि सबै भुलाना ।
अंत काल सोई पछिताना ॥ ३ ॥
राजा रंक छत्र-पति सोई ।
बिनु वह नाम गये ते रोई ॥ ४ ॥
(१) फिक्र । (२) सुमिर ।

चेतावनी ६३
बुरा न मानहु कहहुँ पुकारी ।
देखु आपने मनहिं बिचारी ॥ ५ ॥
यहि ते उत्तम अरु कछु नाहीं ।
धन वै दास अहें जग माहीं ॥ ६ ॥
जगजीवन कहि प्रगट पुकारी ।
जिन सुमिरा तिन लिया कुल तारी ॥ ७ ॥
॥ शब्द ६६ ॥
जग की कही जात नहिं भाई ।
नैनन देखि परखि करि लीन्ह्यौ, तऊ न रह्यो छुपाई ॥ १ ॥
आहै साँच झूठ कहि भाषहिं, झूठेह साँच गोहराई ।
ताहि पाप संताप परैंगे, भर्म परे ते जाई ॥ २ ॥
निंदा करत हैं जानि बूझि कै, जहाँ तहाँ कुटिलाई ।
जानत अहें बनाउ ताहि का, देइहि ताहि सजाई ॥ ३ ॥
मैं तो सरन हौं ताहि चरन की, सूरति नहिं बिसराई ।
जगजीवन है ताहि भरोसे, कहै सो तैसे जाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७० ॥
प्रात नाम सतगुरु का गावै ।
अंतै मनुवाँ नाहिं बहावै ॥ १ ॥
मनुवाँ बहै भजन नहिं होय ।
जाइहि भजन बरत सब खोय ॥ २ ॥
दृढ़ ह्वै अंतर जपिये जापा ।
जेहि तें जाहिं कर्म कटि पापा ॥ ३ ॥
अजपा जाप जपै जो कोई ।
परगट कहौं भक्त सो होई ॥ ४ ॥
साधू भये सोई जग माहीं ।
जैसे पदुम कमल जल माहीं ॥ ५ ॥

६४ | जगजीवन साहब की बानी

जग तें न्यारे भये निरासा ।
जगजीवन तेहि चरन क दासा ॥ ६ ॥
॥ शब्द ७१ ॥
करहु बंदगी बंदे सोई ।
जेहि तें अंत भला कछु होई ॥ १ ॥
तजहु बिबाद न निंदा करहू ।
दीन होय मन अपने रहहू ॥ २ ॥
मत सो सत मैं देउँ बताई ।
भजहु नाम यहि जुक्ति तें जाई ॥ ३ ॥
त्यागि देहु मन गरब गुमान ।
तौ भल मानहिं कृपानिधान ॥ ४ ॥
साध कहत औ बेद पुरान ।
सत्त सब्द याहै परमान ॥ ५ ॥
दुइ अच्छर गहहू तत सार ।
याहै सत मत कीन बिचार ॥ ६ ॥
जगजीवन चरनन लिपटान ।
निरखहु छबि निरगुन निरबान ॥ ७ ॥
॥ शब्द ७२ ॥
मन मदमाते फिरहिं बेहाल ।
अंत भयो धरि खायो काल ॥ १ ॥
तत्त ज्ञान मन कीन बिचार ।
सुकृत नाम भजु होय उबार ॥ २ ॥
यह उपदेस देत हौं सोई ।
देह धरे कछु दुख न होई ॥ ३ ॥
बेद ग्रंथ ज्ञान लियो छानी ।
चेत सचेत द्वै लीजै जानी ॥ ४ ॥

चेतावनी ६५
जगजीवन कहै परगट ज्ञान ।
उलटि पवन गहि धरि रहु ध्यान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ७३ ॥
जिन मन गह्यो नामहिं जानि ।
त्यागि दुबिधा रहे दृढ़ ह्वै, और नहिं उर आनि ॥ १ ॥
हर्ष सोक नाहिं आहै, नाहिं लाभ न हानि ।
नाहिं छूटत रहत जोरे, साध भे निर्बान ॥ २ ॥
अहैं बिरले जगत माँ यहि, कवन मैं केतानि ।
जगजीवन निर्बान भा मन, पदुम पात ज्यों पानि ॥ ३ ॥
॥ शब्द ७४ ॥
साधो दुइ अच्छर तत सार ।
सोई रटत रहौ घट भीतर,
और न करहु बिचार ॥ १ ॥
जिभ्या जपु नहिं कर माला नहिं,
सहज रमहु संसार ।
कहहु न प्रगट भेद काहू तैं,
होइहि कहे बिगार ॥ २ ॥
सुच औ असुच न मानहु एकौ,
सहज अचार बिचार ।
ऐसी रहनि गहनि करि रहिये,
मिलन न लावहु बार ॥ ३ ॥
कहौं पुकार बिचार लेहु मन,
और न मत अधिकार ।
जगजीवन बिस्वास करै सुनि,
उतरि जाय भव पार ॥ ४ ॥

६६ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ७५ ॥
मन तुम रहहु चरनन लागि ।
काहू की नहिं करहु आसा, देहु सरबस त्यागि ॥ १ ॥
रह्यो सोवत बहुत दिन लहि, सुखद बहु हित लागि ।
गुरू जब उपदेस दीन्हो, चौंकि उठि तब जागि ॥ २ ॥
जुगन जुग सँग नाहिं छूटै, लेहु यह बर माँगि ।
निरखि सूरति रहहु लागे, भींज रँग रस पागि ॥ ३ ॥
निरगुनं निरबान निरमल, डोरि सत मन लागि ।
जगजीवन यहि जुक्ति तें, तब जानु आपन भागि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७६ ॥
नाम सुमिर मन बावरे,
कहा फिरत भुलाना हो ॥ टेक ॥
मट्टी का बना पूतना१,
पानी सँग साना हो ।
इक दिन हंसा चलि बसै,
घर बार बिराना हो ॥ ॥ १ ॥
निसि अँधियारी कोठरी,
दूजे दिया न बाती हो ।
बाँह पकरि जम लै चलै,
कोउ संग न साथी हो ॥ २ ॥
गज रथ घोड़ा पालको,
अरु सकल समाजा ही ।
इक दिन तजि चल जायँगे,
रानी औ राजा हो ॥ ३ ॥
(१) पुतला ।

गुरु और शब्द महिमा। ६७
सेमर पर बैठा सुवना,
लाल फर देख भुलाना हो।
मारत टोंट भुआ उधिराना,
फिरि पाछे पछिताना हो॥ ४॥
गूलर कै तू भुनगा,
तू का आय समाना हो।
जगजीवन दास बिचारि कहत,
सब को वहँ जाना हो॥ ५॥
गुरु और शब्द महिमा
॥ शब्द १ ॥
अब जग हमहिं सिखवत आनि।
करत हैं चतुराइ बहु बिध, अहैं पाप की खानि॥ १ ॥
कहूँ सिखि सुनि लिहिनि बातें, कहत अहैं बखानि।
आप का कछु चेत नाहीं, भजन की है हानि॥ २ ॥
करत नहिं अंदेस भूले, अहहिं ते अभिमानि।
अन्तहूँ पछिताइ हैं, फिर डूबिहैं बिन पानि॥ ३ ॥
भजहु नाम गुनाह मेटहि, सरन आपनि आनि।
जगजिवन दास बचाउ इहि, गुरु सब्द कहि परमानि॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
जे जन नाम भजि बलवान।
ताहि केवल कोइ नाहीं, कौन मारै मान॥ १ ॥
रहत निरखत पलक छिन छिन, नाम बहु निर्बान।
चाखि पीवै जिवै जुग जुग, काल देखि डेरान॥ २ ॥
कहत कथा प्रगास करि कै, जुगन जुग का ज्ञान।
उतरि गा सो पार कामन, जानि मानि प्रमान॥ ३ ॥

६८ जगजीवन साहब की बानी
ताहि कीरति कवन गावै, कहत बेद पुरान।
जगजीवन बिस्वास करि, गुरुचरन तें लिपटान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
यहि बन बनत नाहि बनाये।
नाहिं है निर्बान कबहुँ,
नाम बिनु बहु गाये ॥ १ ॥
पाँच एइ परपंच डारहिं,
रात दिन भरमाये।
कवन हटकै कहै के नहिं,
लेत अहहिं नसाये ॥ २ ॥
पास लिहे पचीस कतियाँ,
खात अहहिं धराये।
जुक्ति डोरी लाय कै,
तौ रमहु इन्हहिं फँदाये ॥ ३ ॥
चढ़िकै सिखरहिं१ जिकिर२ लावहु,
सुरति मूरति लाये।
जगजीवन निर्बान भे,
ते दरस गुरु के पाये ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
साधो अस समौ बहुरि न होई ॥ टेक ॥
लेहु बिचारि सँभारि डोरि गहि,
यहि तें मंत्र न कोई।
भजहु जानि परतीत आनि मन,
सुफल सिद्ध सब होई ॥ १ ॥
(१) चोटी। (२) सुमिरन।

गुरु और शब्द महिमां । ६६
जिन नहिं जाना सो पछिताये,
रहे मनहिं मन रोई ।
काह भयो नर की काया धरि,
वृथा जन्म गा खोई ॥ २ ॥
जागे भागि पागि रस माते,
पल छिन नाहिं बिछोई ।
जगजीवन भवसागर तरिगे,
मूरति रहे समोई ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५ ॥
मन जग जन्मि कै भजि लेहु ।
चूकि ना यह पाय औसर,
फिरि दोष ना केहु देहु ॥ १ ॥
धाम दौलत बहुत दुनियाँ,
किहिन जानि सनेहु ।
गयो निज पछिताय कै,
सब झूठ सुत हितु गेहु ॥ २ ॥
आइ जे जे जगत महँ,
यहि भयो ते ते खेहु ।
नाम बिनु कछु काम का नहिं,
ज्यौं गल्यो कागद मेंहु१ ॥ ३ ॥
करहु मन परतीत अपने,
चित्त चरनन देहु ।
जगजिवन दुख सुख दूर होइहि,
अमर जुग जुग होहु ॥ ४ ॥
(१) बरसात ।

७० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ६ ॥
यहि जग नाम सजे तरि गये ।
आप जग महँ देह धरि कै, भक्त ते ते भये ॥ १ ॥
जौन लागी रही पुर्बुज, तौनि अंतर गये ।
ताहि रस ते प्रगट भाखौ, जबहिं मस्त भये ॥ २ ॥
रहि सँभारे डोरि लाये, दूरि दुबिधा किये ।
निरखत रहे निहारि निर्मल, सीस चरनन दिये ॥ ३ ॥
गावत हैं बेद ग्रंथहु, नाम महिमा किये ।
जगजीवन बिस्वास गहे, ते अमर जुग जुग भये ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मनुवाँ जोग करै नहिं जाना ।
चौक चौतरा बैठि रहै का,
अन्तै करत पयाना ॥ १ ॥
धावत आवत थिर न रहतु है,
दृढ़ नहिं करत अड़ाना ।
तीनि तैं आस निरास होत नहिं,
तातैं फिरत भुलाना ॥ २ ॥
गुरु गुनि मंत्र लेहु बैठि सिखि,
अचल रहहु ठहराना ।
लावहु सीस चरन में देखि कै,
झलकत छबि बिनु भाना¹ ॥ ३ ॥
पास बास रस पाइ मस्त ह्वै,
सतगुरु के मन माना ।
जगजीवन अम्मर ह्वै जोगी,
परगट कियो बखाना ॥ ४ ॥
(१) सूरज ।

गुरु और शब्द महिमा । ७१.
॥ शब्द ८ ॥
रहु मन नाम तैं लौ लाय ।
नाम तैं जे नहिं राते, गये ते पछिताय ॥ १ ॥
नाहिं दौलत धाम भूलै, प्रभुइ दीन्ह बनाय ।
जबहिं सांईं खैंचि लैहै, कहाँ कहँ दहु जाय ॥ २ ॥
गर्ब तजहु गुमान मैं तैं, चलहु कै दिनताय ।
चहहु कछु दिन भला आपन, देत अहौं लखाय ॥ ३ ॥
अहै परगट नाहिं गुप्त, बूझि जैसी आय ।
जगजीवन बिस्वास करि, गुरु चरन रहु लिपटाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ९ ॥
साधो कठिन है उदयान ॥ टेक ॥
नहीं है कछु अंत यहि का, आइ सबै भुलान ।
पियो यह रस बिसरि गावत, नाहिं करहि तेवान१ ॥ १ ॥
मरत नहिं मैं केहू बिधि तैं, करत है नुकसान ।
नहिं बिचारै परे जारै, बिसरि गा औसान ॥ २ ॥
इहाँ के नहिं उहाँ के भे, बीच बीच बिलान ।
समौ बीते काम का नहिं, समुझि कै पछितान ॥ ३ ॥
समुझि डोरी नाम की गहि, गगन कीन्ह पयान ।
जगजिवन गुरु के पास पहुँचे, निरखि तकि निर्बान ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
प्रभु जी आपनो मोहिं जानि ।
औगुनं अनेक मेटि कै, चरन सरनहिं आनि ॥ १ ॥
अमत मन यहु नाहिं थिर है, होत भजन कै हानि ।
मोरि बपुरे केरि कह बसि, नाहिं मानत कानि ॥ २ ॥
(१) फिकर ।

चहत आहौं करौं सुमिरन, अवर अवरै ठानि ।
संत पर जेहिं कियो किरपा, दियो सत मत छानि ॥ ३ ॥
पाइ रस सो मस्त है गे, निर्मल भे निर्बानि ।
जगजीवन गुरु मंत्र दीन्ह्यौ, चरन रहे लिपटानि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ११ ॥
अजब यहि नगर करे सवाँर ।
अहै काया सहर जा को, नाहिं वारा पार ॥ १ ॥
दरवाज नौ दस बंद आहैं, साजि कियो करतार ।
तहँ लोक तीनिउँ चौथ जगमग, सूकृतं बाजार ॥ २ ॥
तह झरत मन-मनि सस्त ह्वै, लै पाइ नित्र अहार ।
संतोष होइ पै तृप्ति नाहीं, मिलि होय नाहिं निनार ॥ ३ ॥
ब्रह्म बिस्नु महेस सेसं, एक चित निरधार ।
निर्बान निर्मल जोति चमकै, निर्गुनं निरंकार ॥ ४ ॥
तहँ दिस वारौं भानु ससि की, बिदित है अबिकार ।
तहँ सुद्धि नाहीं बुद्धि नाहीं, सब्द की टकसार ॥ ५ ॥
अस जानि पाइ छिपाइ कोइ कोइ, बिरल है संसार ।
जगजिवन गुरु के चरन गहि रहु, सुन्नंकार ॥ ६ ॥
॥ शब्द १२ ॥
सुनु सुनु सखि री, चरन कमल तें लागि रहु री ॥ टेक ॥
नीचे तें चढ़ि ऊँचे पाउ ।
मंदिल गगन मगन ह्वै गाउ ॥ १ ॥
दृढ़ करि डोरि पोढ़ि करि लाव ।
इत उत कतहूँ नाहीं धाव ॥ २ ॥
सत समरथ पिय जीव मिलाव ।
नैन दरस रस आनि पिलाव ॥ ३ ॥

माती रहहु सबै बिसराव ।
आदि अंत तें बहु सुख पाव ॥ ४ ॥
सन्मुख है पाछे नहिं आव ।
जुग जुग बाँधहु एह्रै दाँव ॥ ५ ॥
जगजीवन सखि बना बनाव ।
अब मैं काहु क नाहि डेराँव ॥ ६ ॥
॥ शब्द १३ ॥
बौरे समुझि देखहु ज्ञान ।
महा अपरबल अहै माया, अंत काहु न जान ॥ १ ॥
पवन औ जल कियो धरतो, कियो गन ससि भान ।
लगे सब टकसार अपनी, खँभ बिनु असमान ॥ २ ॥
देखु नैन पसारि अचरज, प्रगट नाहिं छिपान ।
जहाँ जसि है तहाँ तसि है, तहाँ तसि धर ध्यान ॥ ३ ॥
सब्द ज्ञान गरंथ वेदं, करहिं सबै बयान ।
जिन कियो छिन महँ बुन्द तेनी१, ऐसे कृपानिधान ॥ ४ ॥
दुइ अंक अजपा जपहु अंतर, तजहु सबै तेवान ।
जगजीवन बिस्वास चरनं, करहिं वै औसान ॥ ५ ॥
॥ शब्द १४ ॥
चित्त नित्त रहै लागि पलक नाहिं छूटै ॥ टेक ॥
तागा ज्यौं उगिलि मकरी पुष्ट नाहिं टूटै ।
ऐसी यह जुक्ति पाइ ध्यान नाहिं मीटै ॥ १ ॥
नैनन तें उलटि निरखि सत समाय लीटै ।
संग गुरु प्रसंग ताहि कबहुँ नाहिं फूटै ॥ २ ॥
पाँच औ पचीस पाइ लाइ जुक्ति कूटै ।
जगजिवनदास दरस मोती हंस चोंच लूटै ॥ ३ ॥
(१) से।
१०

७४ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १५ ॥
अरे मन गुरु चरन नहिं त्यागु ।
हर्ष सोक बिसार, दृढ़ सत नामहीं अनुरागु ॥ १ ॥
सूत सेज न मोह माया, चौंकि चेतनि जागु ।
छाँड़ि दे सब जगत आसा, उलटि तेहि तें लागु ॥ २ ॥
गगन जगमग वारि रबि ससि, निरखि रस लै पागु ।
सीस दै कर जोरि कै तहँ, भक्ति ही बर माँगु ॥ ३ ॥
अमर मरु नहिं आउ नहिं जा, रैनि बासर लागु ।
जगजीवनदासं पास है रहु, सर्ब जागह भागु ॥ ४ ॥
॥ शब्द १६ ॥
सब जग मैं मैं करि के भुलाना ।
आनि परे बसि यहि माया महँ,
सुधि नहिं पाछिल आना ॥ १ ॥
अरुझे धंध अंध मद-माते, बिसरि गयो यह ज्ञाना ।
निसु दिन परपंचहि माँ बीतत,
छिन पल राम न जाना ॥ २ ॥
फूले धाम देखि धन दौलत, संत सब्द नहिं माना ।
लीन्ह्यौ खैंचि कै प्रान जोति ज्यौं,
मिटि गा गर्व गुमाना ॥ ३ ॥
कस न बिचारि सँभारि गहै मन, जानै सकल बिराना ।
जगजीवन यहि जुक्ति जगत रहि,
तेहिं काँ नहिं नकसाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द १७ ॥
करिये निरबान ध्यान चरनन लपटाई ॥ टेक ॥
इत उत देखि नैनन सों चित्त ना बहाई ।
गगन बैठे मगन रहिये मंत्र ह्यों सिखाई ॥ १ ॥

गुरु और शब्द महिमा । ७५
तीर्थ तहवाँ बासु मूरति छवि जल अन्हाई ।
नेग कर्म भर्म छूटि छिनहिं निर्मल है जाई ॥ २ ॥
बिना नीर पिंड उदित उजियर तहँ दीपक बिनु छाई ।
अनूप रूप सुन्दरं ससि भानु जाहिं छिपाई ॥ ३ ॥
अस कर हम न साखि सो गुरु सत ना बिसराई ।
जगजिवनदास संत गुप्तं प्रगटहिं गोहराई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १८ ॥
अरे मन चरन तें रहु लागि ।
जोरि दुइ कर सीस दैकै, भक्ति बर ले माँगि ॥ १ ॥
और आसा झूठि आहे, गर्म जैसे आगि ।
परहिंगे सो जरहिंगे, पै देहु सर्ब तियागि ॥ २ ॥
समौ फिरि एहु पाइहै नहिं, सोउ नहिं गहि जागि ।
चेतु पाछिल सुद्धि करिकै, दरस रस रहु पागि ॥ ३ ॥
कठिन माया है अपरबल, संग सब के लागि ।
सूल तें कोइ बचे बिरले, गगन बैठे आगि ॥ ४ ॥
भर्म नहिं तहँ भयो निर्भय, सत्त रत बैरागि ।
जगजीवन निर्बान भे, गुरु दया जागे भागि ॥ ५ ॥
॥ शब्द १६ ॥
जब सुन सब्द मानै कोय ॥ टेक ॥
लाभ दिन दिन सुखित होवै, हानि कबहूँ न होय ।
देखि करि तेहिं मुक्ति नाहीं, नर्क परिहै सोय ॥ १ ॥
सब्द भाखै करै साँचा, सत्त सत्त समोय ।
पहुँच गे वे गगन घर माँ, काल खाय न कोय ॥ २ ॥
तहँ बैठि है निर्बान सतगुर, चरन गहि रहि सोय ।
जगजिवन ते अमर जुग जुग, आवा गवन न होय ॥ ३ ॥

७६ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द २० ॥
मन में मारि अगम जान ।
तोरु तैं यह बज्र धागा, होइहै नकसान ॥ १ ॥
गर्व और गुमान छाँड़हु, तजहु और तेवान ।
नाहिं थिर सब खाक होइहि, चलत जैसे बान ॥ २ ॥
पाँच और पचीस लैके, साँच भीतर आन ।
लाव धागा रहौ लागा, गगन कर मंडान ॥ ३ ॥
तहाँ सतगुरु बैठु तेहि ढिंग, निरखि करु पहिचान ।
जगजीवन चरनन सीस दै रहु, अनत करु न पयान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अरे मन रहहु रटना लाइ ॥ टेक ॥
नाहिं छूटै प्रीति कबहूँ, छाँड़ि दे गफिलाइ ।
जगत माया जार बंधा, अंध सूझि न आइ ॥ १ ॥
है सचेत अचेत हो नहिं, लेहु आपु बचाइ ।
चढ़हु गढ़ जहाँ गगन गुरु हैं, बैठु थिर ह्वै जाइ ॥ २ ॥
है मवासं पास चरनन, काल का डर नाहिं ।
जगजीवनदास निहार मूरति, तकहु इक-टक लाइ ॥ ३ ॥
॥ शब्द २२ ॥
मन यह नाम बिसरि न जाय ॥ टेक ॥
मूल मंत्र इहै आहै, दियो ज्ञान बताइ ।
नाम समता नहीं है कछु, अंत काहु न पाइ ॥ १ ॥
नाम बल ससि भानु रथ, चढ़ि अधर गगन उड़ाइ ।
नाम को बल पाइ हनुमंत, लंक जारयो जाइ ॥ २ ॥
सेस ब्रह्मा बिस्नु संकर, रहे ताड़ी लाइ ।
जगजीवन बिस्वास करि, गुरु चरन रहु लिपटाइ ॥ ३ ॥

गुरु और शब्द महिमा। ७७
॥ शब्द २३ ॥
मन तुम करहु गगन मँडान ।
त्यागि दे सब जगत आसा, निरख सो निर्बान ॥ १ ॥
सिद्ध साध औ कहत जोगी, भला है अस्थान ।
मारि आसन बैठु दृढ़ है, अनत करु न पयान ॥ २ ॥
बैठि रहिये पास सतगुर, देखि सिखिये ज्ञान ।
रहहु ऐसे लागि जुग जुग, मानिये परमान ॥ ३ ॥
देखि नैनन चाखि अमृत, रहिय है मस्तान ।
जगजीवन सतगुरू चरनन, सीस करु कुरबान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २४ ॥
गुरु बलिहारियाँ मैं जाउँ ॥ टेक ॥
डोरि लागी पोढ़ि, अब मैं जपहुँ तुम्हरा नाउँ ।
नहीं इत उत जात मनुवाँ, गगन बासा गाउँ ॥ १ ॥
महा निर्मल रूप छबि सत, निरखि नैन अन्हाउँ ।
नहीं दुख सुख भर्म व्यापै, तप्त नीचे आउँ ॥ २ ॥
मारि आसन बैठि थिर है, काहु नाहि डेराउँ ।
जगजीवन निर्बान भे, सत सदा संगी आउँ ॥ ३ ॥
॥ शब्द २५ ॥
मोर दिल भयो मतवारा ।
मैं तौ प्रभु के चरनन लाग्यो, बावर कहै संसारा ॥ १ ॥
अधर बैठि अमृत रस पीवौं, नाम कै करत पुकारा ।
जगजीवन सतगुर को भेंटे, उतरे भव जल पारा ॥ २ ॥
॥ शब्द २६ ॥
साधो सुमिरन भजन करो ।
मन महँ दुबिधा आनहु नाही, सहजहिं ध्यान धरो ॥ १ ॥

७८ जगजीवन साहब की बानी
धीरज धरि संसय नहिं राखहु, नाम भरोसे रहो।
जगजीवन सतगुरु को भेंटो, भवजल पार तरो॥ २॥
॥ शब्द २७ ॥
देखो री जोगिया रहत कहाँ।
तीनि लोक महँ माया बसत है,
चौथे लोक रहत है तहाँ॥ १॥
अरध सिंहासन बनो अहै री,
जोगी बैठि रहत है तहाँ।
जगजीवन संतन महँ खोजो,
कर बिचार अपने मन महाँ॥ २॥
॥ शब्द २८ ॥
यहु मन गगन मंदिल राखु।
सब्द की चढ़ देखु सीढ़ी, प्रेम रस तहँ चाखु॥ १॥
रहहु दृढ़ करि मारि आसन, मंत्र अजपा भाखु।
मते गुरुमुख होहु तहवाँ, जगत आस न राखु॥ २॥
पाँच बसि कसि बैठि रहिकै, मानु कबहुँ न माखु।
ईस अहहि पचीस इन कै, सदा मन हित वाखु॥ ३॥
देहु सब बिसराइ करिकै, एही धंधे लागु।
जगजिवनदास निरखि करिकै, नयन दर्सन माँगु॥ ४॥
॥ शब्द २६ ॥
नामहिं बड़े भाग तें पायो।
नेग जन्म लहि भ्रमत बीता,
सूझि बूझि नहिं आयो॥ १॥
अब की सँवारु इहै करै का,
जो बिगार करि आयो।

गुरु और शब्द महिमा । ७६
किरपा करि निरबाह करन कहँ,
अवसर भल इह पायो ॥ २ ॥
हूक चूक होत मन मोरे,
जब तब रहि बिसरायो ।
अब निःसंक नाहिं डेर लागत,
जब तें मंत्र सिखायो ॥ ३ ॥
अजपा जपि चढ़ि गयो गगन कहँ,
सतगुर दरस दिखायो ।
जगजीवन बिस्वास बास मे,
चरनन सीस लगायो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
मैं देख्यों निरखि निहारि मूरति पर वारी ॥टेक॥
भा बिस्वास पास बासा करि,
दुनिया सकल बिसारी ।
चमकत दृष्टि बरनि नहिं आवै,
बिनु दीपक उजियारी ॥ १ ॥
नीर पिंड बिनु रूप बिराजत,
रबि ससि की छबि वारी ।
अस निर्गुन निर्बान अमूरति,
सिव बिरंच लाये ताड़ी ॥ २ ॥
सब्द कहत अस प्रगट पुकारे,
बिरले कोउ जन लेहिं बिचारी ।
जगजीवन के सतगुरु समरथ,
सीस ताहि के चरनन वारी ॥ ३ ॥

८०
जगजीवन साहब की बानी

॥ शब्द ३१ ॥
चरनन में लागी रहिहौं री ॥ टेक ॥
और रूप सब तिरथ बतावै,
जल नहिं पैठ नहैहौं री ।
रहिहौं बैठि नयन तें निरखत,
अनत न कतहूँ जैहौं री ॥ १ ॥
तुम्हों तें मन लाइ रहिहौं,
और नहीं मन अनिहौं री ।
जगजीवन के सतगुरु समरथ,
निर्मल नाम गहि रहिहौं री ॥ २ ॥
॥ शब्द ३२ ॥
सुरति बसी मन नाम फिरत मतवारी ॥ टेक ॥
चित तौ लाग्यो अपने पिय सों,
डग मग पाँव न जात सँभारी ।
अंतर देखि चुपाइ रहिउँ मैं,
सूरति तुम्हरी रहिउँ निहारी ॥ १ ॥
सूरति पर मूरति वह साँची,
सो मैं रहि हौं नाहिं बिसारी ।
जगजीवन सतगुरु कै मूरति,
सो मैं रहिउँ सँभारी ॥ २ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
बनत न कतहूँ अनत न जाय ।
देखहु चरन सरन ठहराय ॥ १ ॥
नीचे तकत ऊँचे काँ जाय ।
गगन मंडल माँ तब ठहराय ॥ २ ॥

गुरु और शब्द महिमा। ८१
बिन कर चरन पकरि कस जाय।
सिर नहिं माथ रहै लपटाय ॥ ३ ॥
स्त्रवन बिहूना सुनि धुनि आय।
नैन बिहून दरस तकि पाय ॥ ४ ॥
जगजीवन अस मत जेहिं आय।
मिलि सत मत तब सिद्ध कहाय ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
साधौ कहै तौ कहा न जाय।
आपन घर मत कोइ न बूझै,
हमहिं कहै समुझाय ॥ १ ॥
पंडित जोगी दंडी तपसी,
बहु बिबाद करैं धाय।
नाहिन नाम की ओर गही तिन्ह,
तीरथ बर्त लौ लाय ॥ २ ॥
नाहिन काहू जीत कहाँ लहि,
कहँ लहि कहै समुझाय।
करै जाइ तस जेहिं जस भावै,
भुग्तै तैसे आय ॥ ३ ॥
बिरला कोई भजन करतु है,
चाल चलै दिनताय।
जगजीवन सतगुरु की मूरति,
चरन रहे लपटाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
महिमा प्रभु मो सों वरनि न जाय ॥ टेक ॥
अनहद बानी मूरति बोलै, सुनहु संत चित लाय।
अनहद ताल पखावज बाजै, तहाँ सुरति चलि जाय ॥ १ ॥