जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाती रहहु सबै बिसराव ।
आदि अंत तें बहु सुख पाव ॥ ४ ॥
सन्मुख है पाछे नहिं आव ।
जुग जुग बाँधहु एह्रै दाँव ॥ ५ ॥
जगजीवन सखि बना बनाव ।
अब मैं काहु क नाहि डेराँव ॥ ६ ॥
॥ शब्द १३ ॥
बौरे समुझि देखहु ज्ञान ।
महा अपरबल अहै माया, अंत काहु न जान ॥ १ ॥
पवन औ जल कियो धरतो, कियो गन ससि भान ।
लगे सब टकसार अपनी, खँभ बिनु असमान ॥ २ ॥
देखु नैन पसारि अचरज, प्रगट नाहिं छिपान ।
जहाँ जसि है तहाँ तसि है, तहाँ तसि धर ध्यान ॥ ३ ॥
सब्द ज्ञान गरंथ वेदं, करहिं सबै बयान ।
जिन कियो छिन महँ बुन्द तेनी१, ऐसे कृपानिधान ॥ ४ ॥
दुइ अंक अजपा जपहु अंतर, तजहु सबै तेवान ।
जगजीवन बिस्वास चरनं, करहिं वै औसान ॥ ५ ॥
॥ शब्द १४ ॥
चित्त नित्त रहै लागि पलक नाहिं छूटै ॥ टेक ॥
तागा ज्यौं उगिलि मकरी पुष्ट नाहिं टूटै ।
ऐसी यह जुक्ति पाइ ध्यान नाहिं मीटै ॥ १ ॥
नैनन तें उलटि निरखि सत समाय लीटै ।
संग गुरु प्रसंग ताहि कबहुँ नाहिं फूटै ॥ २ ॥
पाँच औ पचीस पाइ लाइ जुक्ति कूटै ।
जगजिवनदास दरस मोती हंस चोंच लूटै ॥ ३ ॥
(१) से।
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