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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

६४ | जगजीवन साहब की बानी

जग तें न्यारे भये निरासा ।
जगजीवन तेहि चरन क दासा ॥ ६ ॥
॥ शब्द ७१ ॥
करहु बंदगी बंदे सोई ।
जेहि तें अंत भला कछु होई ॥ १ ॥
तजहु बिबाद न निंदा करहू ।
दीन होय मन अपने रहहू ॥ २ ॥
मत सो सत मैं देउँ बताई ।
भजहु नाम यहि जुक्ति तें जाई ॥ ३ ॥
त्यागि देहु मन गरब गुमान ।
तौ भल मानहिं कृपानिधान ॥ ४ ॥
साध कहत औ बेद पुरान ।
सत्त सब्द याहै परमान ॥ ५ ॥
दुइ अच्छर गहहू तत सार ।
याहै सत मत कीन बिचार ॥ ६ ॥
जगजीवन चरनन लिपटान ।
निरखहु छबि निरगुन निरबान ॥ ७ ॥
॥ शब्द ७२ ॥
मन मदमाते फिरहिं बेहाल ।
अंत भयो धरि खायो काल ॥ १ ॥
तत्त ज्ञान मन कीन बिचार ।
सुकृत नाम भजु होय उबार ॥ २ ॥
यह उपदेस देत हौं सोई ।
देह धरे कछु दुख न होई ॥ ३ ॥
बेद ग्रंथ ज्ञान लियो छानी ।
चेत सचेत द्वै लीजै जानी ॥ ४ ॥