जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरु और शब्द महिमा । ७१.
॥ शब्द ८ ॥
रहु मन नाम तैं लौ लाय ।
नाम तैं जे नहिं राते, गये ते पछिताय ॥ १ ॥
नाहिं दौलत धाम भूलै, प्रभुइ दीन्ह बनाय ।
जबहिं सांईं खैंचि लैहै, कहाँ कहँ दहु जाय ॥ २ ॥
गर्ब तजहु गुमान मैं तैं, चलहु कै दिनताय ।
चहहु कछु दिन भला आपन, देत अहौं लखाय ॥ ३ ॥
अहै परगट नाहिं गुप्त, बूझि जैसी आय ।
जगजीवन बिस्वास करि, गुरु चरन रहु लिपटाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ९ ॥
साधो कठिन है उदयान ॥ टेक ॥
नहीं है कछु अंत यहि का, आइ सबै भुलान ।
पियो यह रस बिसरि गावत, नाहिं करहि तेवान१ ॥ १ ॥
मरत नहिं मैं केहू बिधि तैं, करत है नुकसान ।
नहिं बिचारै परे जारै, बिसरि गा औसान ॥ २ ॥
इहाँ के नहिं उहाँ के भे, बीच बीच बिलान ।
समौ बीते काम का नहिं, समुझि कै पछितान ॥ ३ ॥
समुझि डोरी नाम की गहि, गगन कीन्ह पयान ।
जगजिवन गुरु के पास पहुँचे, निरखि तकि निर्बान ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
प्रभु जी आपनो मोहिं जानि ।
औगुनं अनेक मेटि कै, चरन सरनहिं आनि ॥ १ ॥
अमत मन यहु नाहिं थिर है, होत भजन कै हानि ।
मोरि बपुरे केरि कह बसि, नाहिं मानत कानि ॥ २ ॥
(१) फिकर ।