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सर्वकोश
जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

चेतावनी ६३
बुरा न मानहु कहहुँ पुकारी ।
देखु आपने मनहिं बिचारी ॥ ५ ॥
यहि ते उत्तम अरु कछु नाहीं ।
धन वै दास अहें जग माहीं ॥ ६ ॥
जगजीवन कहि प्रगट पुकारी ।
जिन सुमिरा तिन लिया कुल तारी ॥ ७ ॥
॥ शब्द ६६ ॥
जग की कही जात नहिं भाई ।
नैनन देखि परखि करि लीन्ह्यौ, तऊ न रह्यो छुपाई ॥ १ ॥
आहै साँच झूठ कहि भाषहिं, झूठेह साँच गोहराई ।
ताहि पाप संताप परैंगे, भर्म परे ते जाई ॥ २ ॥
निंदा करत हैं जानि बूझि कै, जहाँ तहाँ कुटिलाई ।
जानत अहें बनाउ ताहि का, देइहि ताहि सजाई ॥ ३ ॥
मैं तो सरन हौं ताहि चरन की, सूरति नहिं बिसराई ।
जगजीवन है ताहि भरोसे, कहै सो तैसे जाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७० ॥
प्रात नाम सतगुरु का गावै ।
अंतै मनुवाँ नाहिं बहावै ॥ १ ॥
मनुवाँ बहै भजन नहिं होय ।
जाइहि भजन बरत सब खोय ॥ २ ॥
दृढ़ ह्वै अंतर जपिये जापा ।
जेहि तें जाहिं कर्म कटि पापा ॥ ३ ॥
अजपा जाप जपै जो कोई ।
परगट कहौं भक्त सो होई ॥ ४ ॥
साधू भये सोई जग माहीं ।
जैसे पदुम कमल जल माहीं ॥ ५ ॥