जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचहत आहौं करौं सुमिरन, अवर अवरै ठानि ।
संत पर जेहिं कियो किरपा, दियो सत मत छानि ॥ ३ ॥
पाइ रस सो मस्त है गे, निर्मल भे निर्बानि ।
जगजीवन गुरु मंत्र दीन्ह्यौ, चरन रहे लिपटानि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ११ ॥
अजब यहि नगर करे सवाँर ।
अहै काया सहर जा को, नाहिं वारा पार ॥ १ ॥
दरवाज नौ दस बंद आहैं, साजि कियो करतार ।
तहँ लोक तीनिउँ चौथ जगमग, सूकृतं बाजार ॥ २ ॥
तह झरत मन-मनि सस्त ह्वै, लै पाइ नित्र अहार ।
संतोष होइ पै तृप्ति नाहीं, मिलि होय नाहिं निनार ॥ ३ ॥
ब्रह्म बिस्नु महेस सेसं, एक चित निरधार ।
निर्बान निर्मल जोति चमकै, निर्गुनं निरंकार ॥ ४ ॥
तहँ दिस वारौं भानु ससि की, बिदित है अबिकार ।
तहँ सुद्धि नाहीं बुद्धि नाहीं, सब्द की टकसार ॥ ५ ॥
अस जानि पाइ छिपाइ कोइ कोइ, बिरल है संसार ।
जगजिवन गुरु के चरन गहि रहु, सुन्नंकार ॥ ६ ॥
॥ शब्द १२ ॥
सुनु सुनु सखि री, चरन कमल तें लागि रहु री ॥ टेक ॥
नीचे तें चढ़ि ऊँचे पाउ ।
मंदिल गगन मगन ह्वै गाउ ॥ १ ॥
दृढ़ करि डोरि पोढ़ि करि लाव ।
इत उत कतहूँ नाहीं धाव ॥ २ ॥
सत समरथ पिय जीव मिलाव ।
नैन दरस रस आनि पिलाव ॥ ३ ॥