जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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६८ जगजीवन साहब की बानी
ताहि कीरति कवन गावै, कहत बेद पुरान।
जगजीवन बिस्वास करि, गुरुचरन तें लिपटान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
यहि बन बनत नाहि बनाये।
नाहिं है निर्बान कबहुँ,
नाम बिनु बहु गाये ॥ १ ॥
पाँच एइ परपंच डारहिं,
रात दिन भरमाये।
कवन हटकै कहै के नहिं,
लेत अहहिं नसाये ॥ २ ॥
पास लिहे पचीस कतियाँ,
खात अहहिं धराये।
जुक्ति डोरी लाय कै,
तौ रमहु इन्हहिं फँदाये ॥ ३ ॥
चढ़िकै सिखरहिं१ जिकिर२ लावहु,
सुरति मूरति लाये।
जगजीवन निर्बान भे,
ते दरस गुरु के पाये ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
साधो अस समौ बहुरि न होई ॥ टेक ॥
लेहु बिचारि सँभारि डोरि गहि,
यहि तें मंत्र न कोई।
भजहु जानि परतीत आनि मन,
सुफल सिद्ध सब होई ॥ १ ॥
(१) चोटी। (२) सुमिरन।