जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ जगजीवन साहब की वानी
जामा पहिरि भयो मस्तान ।
रह दस मास न किह्यो तेवान१ ॥ ४ ॥
जरयो नहीं अगिनी महँ अंग ।
बाहर होत भयो चित भंग ॥ ५ ॥
गोद लाय फिरि दूध पियाई ।
जुबा में जुबती बहुत हिताई ॥ ६ ॥
कामी करम गयो सब भूले ।
मुक्के खात रहहु गे झूले ॥ ७ ॥
बृद्ध भयो तब बुद्धि सँभारि ।
तब नहि सुमिरन जात सँवारि ॥ ८ ॥
कफ खाँसी औ सीत सताइ ।
सँवरि सँवरि२ तब रहि पछिताइ ॥ ६ ॥
उलटि लगाय रह्यो दृढ़ डोरी ।
कहौं सिखाय रह्यो मन मोरी ॥ १० ॥
जगजीवन सत मत गहि डोरी ।
ससि चकोर ज्यों रहि टक जोरी ॥ ११ ॥
॥ शब्द ६८ ॥
साधो भजहु नाम मन लाइ ।
बहुरि नहीं अस औसर पाइ ॥ १ ॥
अब के चूका चूका सोइ ।
बहुरे नाहि सँवारहि कोइ ॥ २ ॥
माया मोह तकि सबै भुलाना ।
अंत काल सोई पछिताना ॥ ३ ॥
राजा रंक छत्र-पति सोई ।
बिनु वह नाम गये ते रोई ॥ ४ ॥
(१) फिक्र । (२) सुमिर ।