जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ६ ॥
यहि जग नाम सजे तरि गये ।
आप जग महँ देह धरि कै, भक्त ते ते भये ॥ १ ॥
जौन लागी रही पुर्बुज, तौनि अंतर गये ।
ताहि रस ते प्रगट भाखौ, जबहिं मस्त भये ॥ २ ॥
रहि सँभारे डोरि लाये, दूरि दुबिधा किये ।
निरखत रहे निहारि निर्मल, सीस चरनन दिये ॥ ३ ॥
गावत हैं बेद ग्रंथहु, नाम महिमा किये ।
जगजीवन बिस्वास गहे, ते अमर जुग जुग भये ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मनुवाँ जोग करै नहिं जाना ।
चौक चौतरा बैठि रहै का,
अन्तै करत पयाना ॥ १ ॥
धावत आवत थिर न रहतु है,
दृढ़ नहिं करत अड़ाना ।
तीनि तैं आस निरास होत नहिं,
तातैं फिरत भुलाना ॥ २ ॥
गुरु गुनि मंत्र लेहु बैठि सिखि,
अचल रहहु ठहराना ।
लावहु सीस चरन में देखि कै,
झलकत छबि बिनु भाना¹ ॥ ३ ॥
पास बास रस पाइ मस्त ह्वै,
सतगुरु के मन माना ।
जगजीवन अम्मर ह्वै जोगी,
परगट कियो बखाना ॥ ४ ॥
(१) सूरज ।