जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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॥ शब्द ७५ ॥
मन तुम रहहु चरनन लागि ।
काहू की नहिं करहु आसा, देहु सरबस त्यागि ॥ १ ॥
रह्यो सोवत बहुत दिन लहि, सुखद बहु हित लागि ।
गुरू जब उपदेस दीन्हो, चौंकि उठि तब जागि ॥ २ ॥
जुगन जुग सँग नाहिं छूटै, लेहु यह बर माँगि ।
निरखि सूरति रहहु लागे, भींज रँग रस पागि ॥ ३ ॥
निरगुनं निरबान निरमल, डोरि सत मन लागि ।
जगजीवन यहि जुक्ति तें, तब जानु आपन भागि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७६ ॥
नाम सुमिर मन बावरे,
कहा फिरत भुलाना हो ॥ टेक ॥
मट्टी का बना पूतना१,
पानी सँग साना हो ।
इक दिन हंसा चलि बसै,
घर बार बिराना हो ॥ ॥ १ ॥
निसि अँधियारी कोठरी,
दूजे दिया न बाती हो ।
बाँह पकरि जम लै चलै,
कोउ संग न साथी हो ॥ २ ॥
गज रथ घोड़ा पालको,
अरु सकल समाजा ही ।
इक दिन तजि चल जायँगे,
रानी औ राजा हो ॥ ३ ॥
(१) पुतला ।