जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ६५
जगजीवन कहै परगट ज्ञान ।
उलटि पवन गहि धरि रहु ध्यान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ७३ ॥
जिन मन गह्यो नामहिं जानि ।
त्यागि दुबिधा रहे दृढ़ ह्वै, और नहिं उर आनि ॥ १ ॥
हर्ष सोक नाहिं आहै, नाहिं लाभ न हानि ।
नाहिं छूटत रहत जोरे, साध भे निर्बान ॥ २ ॥
अहैं बिरले जगत माँ यहि, कवन मैं केतानि ।
जगजीवन निर्बान भा मन, पदुम पात ज्यों पानि ॥ ३ ॥
॥ शब्द ७४ ॥
साधो दुइ अच्छर तत सार ।
सोई रटत रहौ घट भीतर,
और न करहु बिचार ॥ १ ॥
जिभ्या जपु नहिं कर माला नहिं,
सहज रमहु संसार ।
कहहु न प्रगट भेद काहू तैं,
होइहि कहे बिगार ॥ २ ॥
सुच औ असुच न मानहु एकौ,
सहज अचार बिचार ।
ऐसी रहनि गहनि करि रहिये,
मिलन न लावहु बार ॥ ३ ॥
कहौं पुकार बिचार लेहु मन,
और न मत अधिकार ।
जगजीवन बिस्वास करै सुनि,
उतरि जाय भव पार ॥ ४ ॥