सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 110 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 77

७४ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १५ ॥
अरे मन गुरु चरन नहिं त्यागु ।
हर्ष सोक बिसार, दृढ़ सत नामहीं अनुरागु ॥ १ ॥
सूत सेज न मोह माया, चौंकि चेतनि जागु ।
छाँड़ि दे सब जगत आसा, उलटि तेहि तें लागु ॥ २ ॥
गगन जगमग वारि रबि ससि, निरखि रस लै पागु ।
सीस दै कर जोरि कै तहँ, भक्ति ही बर माँगु ॥ ३ ॥
अमर मरु नहिं आउ नहिं जा, रैनि बासर लागु ।
जगजीवनदासं पास है रहु, सर्ब जागह भागु ॥ ४ ॥
॥ शब्द १६ ॥
सब जग मैं मैं करि के भुलाना ।
आनि परे बसि यहि माया महँ,
सुधि नहिं पाछिल आना ॥ १ ॥
अरुझे धंध अंध मद-माते, बिसरि गयो यह ज्ञाना ।
निसु दिन परपंचहि माँ बीतत,
छिन पल राम न जाना ॥ २ ॥
फूले धाम देखि धन दौलत, संत सब्द नहिं माना ।
लीन्ह्यौ खैंचि कै प्रान जोति ज्यौं,
मिटि गा गर्व गुमाना ॥ ३ ॥
कस न बिचारि सँभारि गहै मन, जानै सकल बिराना ।
जगजीवन यहि जुक्ति जगत रहि,
तेहिं काँ नहिं नकसाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द १७ ॥
करिये निरबान ध्यान चरनन लपटाई ॥ टेक ॥
इत उत देखि नैनन सों चित्त ना बहाई ।
गगन बैठे मगन रहिये मंत्र ह्यों सिखाई ॥ १ ॥