जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
चेतावनी ४५
नित उठि करहि दुष्टई सबकै, जिय महँ नाहिं डेराई।
करि बहु पाप कमाई नितहीं, सो पड़े नरक महँ जाई ॥ ३ ॥
कहैं कि हम समान को आहै, थोरे धन इतराई।
गुन त्यागिन औगुन हित लागे, डारिन सबै नसाई ॥ ४ ॥
दौलत दाम धाम सुख भले, वह सुधि गै बिसराई।
परचौ काम जब अंत न पायो, सब तजि चल पछिताई ॥ ५ ॥
समुझि बूझि हक¹ राह चलहु रे, कहत अहौं गोहराई।
जगजीवन सब झूठे आहैं, नाम भजहु चित लाई ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
अरे मन लटकि अटकि रहु लागी।
तजु परपंच कुशब्वद कुसंगति, ह्वै सचेत उठि जागी ॥ १ ॥
दुनिया अंध धंध परि भूली, कठिन मोह कै आगी।
तेहि परि जरि गै खाक उड़ाइहि, जुक्तिते रँग रहुत्यागी ॥ २ ॥
नर नारी पसु पंछी जे जग, सब छेदा है साँगी।
बचा न कोई बचाये सोई, नाम सरन रहु भागी ॥ ३ ॥
दुइ कर जोरि यहै है अवसर, दरस लेहु बर माँगी।
जगजीवन दै सीस चरन तर, मस्त रहहु रस पागी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
दुनियाँ धंध लागि अरुझानी।
हित मित चित लोभाइ रहत है, पाछिल सुद्धि हेरानी ॥ १ ॥
आयो जहाँ से घर सो भूला, यहु घर रुधिर क पानी।
ताही उद्र साज कियो करता, ताही म आनि समानी ॥ २ ॥
डोरी पोढ़ि लगाइ निरगुन ते, अगिन म भै अस्थानी।
तेहि बल गलै जरै तन नाहीं, राहि दस मास सुखानी ॥ ३ ॥
(१) सत्य।
४६ जगजीवन साहब की बानी
बाहर भयो गइ सुबुद्धि वह, भे अहंकार गुमानी ।
तीनिउ पन गे नाम बिहूने, अंत बूड़ि बिनु पानी ॥ ४ ॥
कैसेहु नहीं मुग्ध नर चेतत, कहै सब्द यह बानी ।
जगजीवन बचिहै पै सोई, चित्त चरन ठहरानी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३६ ॥
बौरे समुझि देखि मन माहीं ।
माया देखि कै भूल फूल नहिं, तोर नहीं कछु आहीं ॥ १ ॥
दिना चारि का अहै पेखना, कोउ काहू का नाहीं ।
सुधि बिसराय चेत नहिं कीन्ह्यो, अंत काल पछिताहीं ॥ २ ॥
देह धरे नर नाम न जान्यो, बृथा जियहि जग माहीं ।
जगजीवन भजु राम निर्भय ह्वै, रहिये चरनन माहीं ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३७ ॥
साधो देखहु अपने मनहिं बिचारी ॥ टेक ॥
दिना चारि का यह है खाका,
सो तकि नहिं भूलहु संसारी ।
परि कै सुखद भरम नहिं भटकहु,
ह्वै सचेत रहु डोरि सँभारी ॥ १ ॥
नाम बिहून नीच सब हीं ते,
नीच ते नीच बहुत अधिकारी ।
जैसे खाँड़ मीठ सब हीं कहँ,
अनहित लागत खारी ॥ २ ॥
करि बिबेक सों ज्ञान आपने,
जुक्ति बास करि सब ते न्यारी ।
जगजीवन अमृत रस दरसन,
पीवत रहहु सो नैन निहारी ॥ ३ ॥
चेतावनी ४७
॥ शब्द ३८ ॥
रटहु रसना नाम अच्छर फूल भूलू न भाई ।
एक दिन दुख होइ है फिर रहैगा पछिताई ॥ १ ॥
कस न जीवत सुमिर मन महँ त्यागि दे गफिलाई ।
तजहु जग परपंच निन्दा करहु ना कुटिलाई ॥ २ ॥
यहि पाप ते जम दूत कसि हैं रहौगे खिसियाई ।
रहे नहिं कछु हाथ एकौ बाँधि लैकर जाई ॥ ३ ॥
लोग सबै कुटुंब सुत हित नारि भगनी भाई ।
पिता प्रीति लगाय रोइहै रहेगा अरुगाई१ ॥ ४ ॥
भाई बर्ग सँग उहौ त्यागहि देहै सब बिसराई ।
दौलत धन धाम काम काज नहिं आई ॥ ५ ॥
छत्र पति औ नर पती सब झूठि है प्रभुताई ।
जगजीवन दास नाम साँचा ताहि रहु लौ लाई ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३९ ॥
जनम पाइ जग जान्यो नाहीं ।
भाग बड़े ते पाइ देहँ नर,
सुधि गै भूलि पर्यो भव माहीं ॥ १ ॥
देखत खात पियत गाफिल मन,
सुख आनंद बहुत हरषाहीं ।
डोलत बोलत चलत अपथ पथ,
भरे मद अंध चेत कछु नाहीं ॥ २ ॥
मैं तैं मारि सँभारि न आवे,
अघ क्रम हित करि बहुत कमाहीं ।
तेहि पर गई सुद्धि बुधि सब कर,
पग थाके जब फिरि पछिताहीं ॥ ३ ॥
(१) अलगाय।
४८ जगजीवन साहब की बानी
साधो साधि सुरति दृढ़ करिये,
रहि रसि बसि छबि अंतर माहीं ।
जगजीवन दास जगत ते न्यारे,
गुरु के चरन बिसरि नहि जाहीं ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४० ॥
अरे मन बौरे समुझि विचारु ।
को तैं अहसि कहाँ ते आयसि, अब हूँ डोरि संभारु ॥ १ ॥
बहसि न इत उत ह्वै थिर रहि कै, सुकिरत नाम पुकारु ।
नहिं कोइ अचल सबै चलि जाइ हि, कछु नहिं अहै करारु ॥ २ ॥
काया कनक देह नर पायो, करि ले कलुक सँवारु ।
समौ यही फिरि और न पैहौ, भजि कै अपुहि तारु ॥ ३ ॥
लाये प्रीति रीति ऐसी रहु, सूरति छबि न बिसारु ।
जगजीवन सतगुरु के चरनन, जानि सर्वसौ वारु ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४१ ॥
बौरे काहे का करत गुमान ।
तोरे नाहिं कछु समुझि देखु मन,
चेतहु होउ न हैवान ॥ १ ॥
दौलत धाम काम नहिं आइहि,
जब तजि है तन प्रान ।
सुत पितु नारि बंधु औ माता,
तजि हैं एउ निदान ॥ २ ॥
कस नहिं सब तजि भजु वहि नामहिं,
ये है सच्च प्रमान ।
जगजीवन दास जग से है न्यारा,
अन्तर धरि रहु ध्यान ॥ ३ ॥
चेतावनी ४६
॥ शब्द ४२ ॥
साधो मन मन रहहु बिचार ।
निरखत रहहु परखि छबि देखत,
दृढ़ करि सुरति सँवार ॥ १ ॥
सीतल ह्वै रहु धरु सँभारि पग,
तमा१ तुजुक२ तैं मार ।
पाँच बचाइ चलाइ लाइ रहु,
आपन चहसि सँभार ॥ २ ॥
मैं तैं ई तौ अहं मद गलती३ ,
एइ सब करत बिगार ।
तेहिं गरुवाई बोझ ते दाबे,
नाहीं होत सवार ॥ ३ ॥
कुमति प्रसंग पचीस एक सब,
जानि सर्बसौ वार ।
जगजीवन सब लै न्यारे रहु,
चरन औ रूप निहार ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४३ ॥
ए मन त्यागि देहु गुमान ।
वहाँ ते करि कौल आयहु, नाहिं समुझत ज्ञान ॥ १ ॥
छिया बिदु का पहिरि जामा, हितं भयो हैवान ।
सुद्धि सोइ बिसारि दीन्हेव, कर्म आइ समान ॥ २ ॥
भूलु नहिं तकि देखु सुख परि, अचल नहिं अस्थान ।
जाइगा चल रहहि ना कोइ, बाल बूढ़ जवान ॥ ३ ॥
सिद्ध साधं जती जोगी, करहिं एऊ पयान ।
अमर ते मरि जाइंगे, चलि जाहिंगे ससि भान ॥ ४ ॥
( १ ) लालच । ( २ ) शान । ( ३ ) फंद, जाल ।
७
५० जगजीवन साहब की वानी
जाइगा चल रहहि ना कछु, गहहु पद निर्बान ।
जगजीवन मति निर्मलं धरु, रहहु अंतरध्यान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४४ ॥
मनुवाँ सच नाम ले गाई ।
दुनिया चली जात पल छिन दिन,
कोऊ न थिर ठहराई ॥ १ ॥
नहिं करार दिन घरी बरस का,
केहु का जानि न जाई ।
मैं तैं करि अभिमान गुमानहिं,
सुख परि गे बौराई ॥ २ ॥
कोउ काहु क नहिं मातु पिता हितु,
नारि बन्धु कुटुंबाई ।
ये सब अपने काम स्वार्थ के,
अंत रहैं अरुगाई ॥ ३ ॥
ऐसे सूल काँट ते छेदे,
नहिं कोइ लेत बचाई ।
जगजीवन सब बृथा जानिकै,
रहे चरन सिर नाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४५ ॥
कलि जागत जे राम की कानि ।
नहि डरपत आहै मन माहीं भरम पड़े हैरानि ॥ १ ॥
देत हैं दुख जानि दुखियहिं दरद नहिं मन आनि ।
होयगी दरबार फजिहत मारि बूझहिं छानि ॥ २ ॥
मारि मुगरिन मूड़ फोरहिं मानिहै न हैवान ।
जन्म कर्म नसाइ जैहै होइ है सब हानि ॥ ३ ॥
चेतावनी ५१
डारि देहैं नरक महँ जहँ अगिन है अधिकानि ।
त्रास दुख अधिकार है कोउ नहिं उबारहि आनि ॥ ४ ॥
पछिताइ है मन समुझि करि है बड़ी दुख की खानि ।
देखि ज्ञान ते परत है तस कहत अहौं बखानि ॥ ५ ॥
दीन लीनं नाम गहि रहु भर्म तैं नहिं मानि ।
जगजीवन बिस्वास बसि गुरु चरन रहु लिपटानि ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
साधो कठिन रीति कल माहीं ।
परपंचहिं माँ निसु दिन बीतत,
नामहिं सुमिरै नाहीं ॥ १ ॥
तब को हता गात नहिं काहू,
रह्यो उद्र जब माहीं ।
सूरति लाइ सत्त माँ राखिन,
जरे अगिन महँ नाहीं ॥ २ ॥
सो बिस्वास छाँड़ि सब दीन्हो,
पापै कर्म कमाहीं ।
सपनेहु समुझि बूझि नहिं आवै,
परि भव मोह बिलाहीं ॥ ३ ॥
जन्म देह उत्तम नर पायो,
सुधि बिहून कहँ जाहीं ।
गयो अकारथ नाम न जाना,
नहिं काहू महँ आहीं ॥ ४ ॥
साध का सब्द मानि जो लैहैं,
दाग न लागहि ताहीं ।
५२ जगजीवन साहब की बानी
जगजीवन अंते अंतर नहिं,
भवसागर तरि जाहीं ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४७ ॥
साधो कहत अहौं गोहराई ।
दोष देइ अपने करमन का,
डारत अहै नसाई ॥ १ ॥
बेपरतीत भयो मनहीं महँ,
दुबिधा रह्यो समाई ।
बिसरि गयो जिन पाले उद्र महँ,
अगिन ते लियो बचाई ॥ २ ॥
अब तब सों आपुहि सब ब्याकुल,
बूझि न मन महँ आई ।
बंधे अहहिं अन्ध है डोलहिं,
निकटहिं दूरि बताई ॥ ३ ॥
सत मत गहै रहै कौनिहु बिधि,
बकु मीनहिं टक लाई ।
जगजीवन यह जुक्ति भक्त भे,
जोति में रह्यो समाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४८ ॥
साधो सुनु कल का ब्योहारा ।
अपने अपने आगी पानी,
जरत है सब संसारा ॥ १ ॥
नाहीं सुधि अपने तन की है,
औ क करहिं बिचारा ।
ज्ञानिन काहँ कहैं अज्ञानी,
आपु बुद्धि अधिकारा ॥ २ ॥
चेतावनी ५३
हैं बल छीन ते बली कहावैं,
हम तें नहिं अधिका रा।
अहैं अदत्त कहावैं दाता,
बूड़ि मुए मँझ धारा ॥ ३ ॥
कुमति प्रसंग सुमति नहिं आवै,
गहैं न नाम अधारा।
जगजीवन अन्तर महँ सुमिरैं,
उतरैं भवजल पारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
कोउ काहुइ दोष न देई।
जो करतब्य अहै आपुनि माँ, सो तैसहि फल लेई ॥ १ ॥
जो दुख देय दुक्ख सो पावे, सुख दे सुख तेहि होई।
हाजिर राम अहैं सबहिन महँ, गर्ब न भूलै कोई ॥ २ ॥
रावन ऐसे छत्री ह्वै गे, तेहि सम भयो न कोई।
इन जब बैर कीन्ह भक्तन तें, डारयो छिन महँ खोई ॥ ३ ॥
लंका कनक सो खेह१ उड़ानी, जैसे मैल गधाई२।
पुत्रं लाख सवा लख नाती, तिन के रहा न कोई ॥ ४ ॥
नर केतानि कवनि गिनती महँ, कहत सब्द सत सोई।
जगजीवन अन्तर महँ सुमिरहु, सूरति बिलग न होई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५० ॥
मन तन खाक करि कै जान।
नीच तें ह्वै नीच तेहि तें, नीच आपुहि मान ॥ १ ॥
त्यागु मैं तैं दीन ह्वै रहु, तजहु गर्ब गुमान।
देतु हौं उपदेस याहै, निरखु सो निरखान ॥ २ ॥
(१) ख़ाक। (२) सोने की लंका की ख़ाक इस तरह उड़ी जैसे मिट्टी या
कूड़ा करकट गधे पर ढो कर ले जाने से उड़ता है।
५४ जगजीवन साहब की बानी
कर्म धागा लाय बाँधा, हिंदु मूसलमान ।
खैंचि लीन्ह्यो तोरि धागा, निरल कोइ बिलगान ॥ ३ ॥
खाक है सब खाक होइहि, समुझि आपन ज्ञान ।
सब्द सत कहि प्रगट भाषैं, रहहि नाम निदान ॥ ४ ॥
काल को डर नाहिं तिन्ह कौं, चौथ१ रहि चौगान ।
जगजीवन दास सतगुरु के, चरन रहि लिपटान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५१ ॥
भाई रे कहा न मानै कोई ।
जिहिं समुझाय कै राह बतावों,
मन परतीत न होई ॥ १ ॥
कपट रीति कै करहिं बंदगी,
सुमति न व्यापै सोई ।
भये नर हीन कुमारग परि कै,
डारिन सर्बस खोई ॥ २ ॥
गे भरुहाय२ तनिक सुख पाये,
मैं तैं रहे समोई ।
फिरि पछिताने कष्ट भये पर,
रहे मनहिं मन रोई ॥ ३ ॥
देखि परत नैनन से वैसे,
कठिन जीव है वोई ।
जगजीवन अन्तर महँ सुमरै,
जस होई तस होई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५२ ॥
आपु क चीन्हहु रे भाई,
बिन चीन्हे नहिं सुख पाई ।
(१) चौथे लोक में । (२) उबल पड़े ।
चेतावनी ५५
जिन जिन काहू आपु क चीन्हा,
उठि तहँ कहँ पहुँचे जाई ॥ १ ॥
वह घर बिसरा जहाँ ते आयहु,
परपंचहिं हिताई१ ।
जामा मैल पहिरि मद माते,
मैं तैं पर बौराई ॥ २ ॥
कछु बिचार मनहिं नहिं आयो,
जहँ तहँ अरुझे जाई ।
झका झोरी ऐंचा तानी,
जहँ तहँ गये बिलाई ॥ ३ ॥
ऐसी कुगति अहै दुनिया की,
नाम सरन बिन रहे पछिताई ।
सतगुरु मते मंत्र जेहि दीन्ह्यो,
अम्बर भे चरनन सिर नाई ॥ ४ ॥
जगजीवन जुग जुग२ जुग३ बंधा,
निरखत है निरमल निरथाई४ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५३ ॥
साधो करै बिबाद नहिं कोई ।
अपने मते मंत्र महँ लागहु, भजत रहहु मन सोई ॥ १ ॥
कस्यप कंस रावना कौरौ, तिन के रहा न कोई ।
और कै कौन केतनि बपुरा है, कन प्रमान है सोई ॥ २ ॥
ज्ञानी पंडित जोगी भोगी, सिद्ध साध जो होई ।
सब निर्बाह नाम तें आहै, गर्ब किहे या खोई ॥ ३ ॥
(१) अच्छा लगता है। (२) जुगान जुग । (३) जोड़ा । (४) अथाह ।
५६ जगजीवन साहब की बानी
अंतर भजै मारि कै मैं तें, चरनन चित्त समोई ।
जगजीवन भजु और आस तजि, जस होई तस होई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५४ ॥
बौरे नाम रटु मन लाय ।
खैंचि घट में आनिये कहुँ नाहिं देत बहाय ॥ १ ॥
कुसँग संगति कुटिल बौरे संग बैठु न धाय ।
ताहि पारस बेधि है तब होइ है गफिलाय ॥ २ ॥
तजहु गर्ब गुमान मैं तें हिये रहु दिनताय१ ।
त्यागि दे बकवाद बकना गहे रहु सितलाय२ ॥ ३ ॥
देत हौं उपदेस परगट कह्यो संतन गाय ।
जगजीवन बिस्वास करि कै रहु चरन लिपटाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५५ ॥
यहि जग महँ बंदे गरीब ह्वै रहना ।
साँईं तें चित लाउ रे बंदे ।
तजि दे गर्व गुमाना ॥ १ ॥
कनक कोट लंकापति रावन,
सोऊ खाक समाना ।
पाँच पचीस एक नहिं आवत,
ता तें फिरत भुलाना ॥ २ ॥
सुमति मती जे छिमा साधु हैं,
तिन हरि काँ पहिचाना ।
जगजीवन जीवत ते प्रानी,
जिन हरि चरनन ध्याना ॥ ३ ॥
(१) दीनता । (२) शीतलता ।
३ ।
॥ शब्द ५६ ॥
संतो गहहु सुरति सँभारि ।
वहि समय जो किहिन है उन, सो सुधि दिह्यो बिसारि ॥ १ ॥
इहाँ तौ कोउ नाहिं थिर है, रहेगा दिन चारि ।
खाइ लैहै काल सब कहँ, जैसे मूस मजारि१ ॥ २ ॥
भाइ भगनी मातु पितु, परिवार हितु सुत नारि ।
अन्त कोउ ना काम अइहै, कोउ न लेहि उबारि ॥ ३ ॥
जानि बृथा मन नाम सुमिरौ, कहत सब्द पुकारि ।
जगजीवन गुरु चरन गहि रहु, सोई लेहि उबारि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५७ ॥
साधो सत्त नाम जपु प्यारा ॥ टेक ॥
सत्तनाम अंतर धुनि लागी, बास किहे संसारा ।
ऐसे गुप्प चुप्प है सुमिरहु, बिरले लखै निहारा ॥ १ ॥
तजहु बिबाद कुसंगति सबकै, कठिन अहै यह धारा ।
सत्तनाम कै बेड़ा बाँधहु, उतरन कौं भव पारा ॥ २ ॥
जन्म पदारथ पाइ जक्त महँ, आपुन मरहु सँभारा ।
जगजीवन यह सत्त नाम है, पापी केतिक तारा ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५८ ॥
मन तुम भजहु नामहि नाम ।
तारि लीन्ह्यो बहुत पतितन उत्तमं अस नाम ॥ १ ॥
गह्यो जिन परतीत करिकै भये तिन के काम ।
मिटे दुख संताप तिन के भयो सुख आराम ॥ २ ॥
देखि सुख परि भूल नाहीं दौलत औ धन धाम ।
अहै यह सब झूठ आसा नाहिं आवहि काम ॥ ३ ॥
(१) बिल्ली।
८
द्वितीय भाग: शब्द एवं पद संग्रह (अघविनाश व उपसंहार)
५८ जगजीवन साहब की वानी
चढ़हु ऊंचे नीच ह्वै कै गगन है भल ग्राम ।
जगजिवन दास निहारि मूरति चरन करु बिस्राम ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५६ ॥
अरे मन करहु नाम तें प्रीति ।
सीतलं सूसील मारग चलहु ऐसी रीति ॥ १ ॥
त्यागि दे बकवाद निंदा आचलनि१ आनीति२ ।
पाइ काया कनक की यह नाम बिनु ज्यों भीति ॥ २ ॥
आइ यह मृतु लोक में पछितानि करि आनीति२ ।
मारि कालं खाइ लीन्ह्यो समुझि समय वितीति ॥ ३ ॥
जुक्ति यहि जग बास करु रहु जक्त वेपरतीति ।
जगजीवन बिस्वास करि गुरु चरन रहु सत सीति ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६० ॥
बैठि रहहु मन चरनन पास ।
काहे क भरमत फिरहु उदास ॥ १ ॥
राखहु दुइ कर सीस लगाइ ।
सोवत जागत बिसरि न जाइ ॥ २ ॥
निरखहु निर्मल जोति निहारि ।
नहिं उनकी सम कोउ अनुहारि३ ॥ ३ ॥
रबि ससि रूप डारि तैं वारि ।
रहु सत मति गहि डोरि सँभारि ॥ ४ ॥
ब्रह्मा रहे बेद धुनि लाइ ।
संकर अंग में अस्म लगाइ ॥ ५ ॥
बिस्नु जाइ मन तहाँ मसानि ।
सो अब कहि नहि जात बखानि ॥ ६ ॥
( १ ) कुचलन । ( २ ) अनीति । ( ३ ) सूरत ।
जग महँ काया है उद्यान¹ ।
जो आये सो सबै भुलान ॥ ७ ॥
रहनि राम गहि नाम कि आस ।
उदित साध ते भये प्रकास ॥ ८ ॥
जगजीवन करु गगन मँडान ।
निरखहु सतगुरु सो निरबान ॥ ९ ॥
॥ शब्द ६१ ॥
डोरि पोढ़ि लागि रहै अंतर के माहीं ॥
निरखि परखि लै लगाय लखै कोउ नाहीं ।
गगन सहर लै दुकान बैठहु थिर ताहीं ॥ १ ॥
सेस ब्रह्मा बिस्नु संकर जोति निरमल वाहीं ।
भानु बिन बिहान है तहँ ससि गन नाहीं ॥ २ ॥
पवन पानी तें बिहून कनि मनि बरसाहीं ।
जगजीवन प्रकास सतगुरु सीस चरन रहीं ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६२ ॥
साधो कहौं तो कहा न जाईं ।
अनुचित चरित देखि दुनिया के, मन महँ रहौं चुपाइ ॥ १ ॥
जहवाँ चर्चा होत नाम कै, काहू नाहिं सोहाई ।
परपंची कछु औरहि भाषैं, बहुत करहिं कुटिलाई ॥ २ ॥
सुख के फल ते खाइ न पाइन, बिष रस बहुत हिताई ।
किहिन बिगार है जन्म जन्म का, परे नर्क महँ जाई ॥ ३ ॥
खाय अघाय फूलि कै बैठे, गर्व करहिं अधिकाई ।
सुमति पराय² अचेत ह्वै बैठे, कुमति प्रगट में आई ॥ ४ ॥
मैं तैं गर्व गुमान त्यागि कै, नय चालहु दिनताई ।
जगजीवन डर नाहिं काल का, लैहै नाम बचाई ॥ ५ ॥
( १ ) सैर की जगह । ( २ ) भाग गई ।
६० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ६३ ॥
अरे मन करहु सच बिचार ।
समुझि बूझि कै जानि आपन, बृथा है संसार ॥ १ ॥
नीर बुंद तें साज कीन्ह्यो, एतो है बिस्तार ।
नगर उत्तम बनो अहै, सोइ न वारा पार ॥ २ ॥
तहाँ के परधान पाँचो, करहिं बहु अपकार ।
संग ताहि पचीस नारी१, किहेहु नहिं ब्योहार ॥ ३ ॥
मिलि चलहु बस करहु तीसौ२, संग लै कै सिधार ।
जगजिवन दास गुफा गगन महँ, निरखि छबिहि नियार ॥४॥
॥ शब्द ६४ ॥
मन बिनु समुझे नाहीं होय ।
महा अपरबल अहै माया, भूलि रहे सब कोय ॥ १ ॥
सुख आनंद में पर्यो गाफिल, डारि सर्बस खोय ।
अंत काल पछिताय रहे हैं, चले कर मलि रोय ॥ २ ॥
नाहिं काहु क अहै कोऊ, कहै आपन सोय ।
पुछिहै कछु कीन्ह करतब, बहुत फजिहत होय ॥ ३ ॥
डोरि पोढ़ि लगाय रहि जग, नाहिं पूछै कोय ।
जगजिवन दास चरन गहि मन, अचल अम्मर होय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६५ ॥
मन रे प्रभु सों चित्त लगाव ।
छाँड़ि दे जंजाल जक्त को,
गुरु मारग माँ आव ॥ १ ॥
गुरु के बचन हृदय धरु मूरख,
ज्ञान ध्यान मन लाव ।
(१) प्रकृति । (२) पाँच तत्व और पच्चीस प्रकृति ।
चेतावनी ६१
अष्ट कमल दल भीतर राजा,
पाँच तत्त को राव ॥ २ ॥
त्रिकुटी मध्य दृष्टि करु नैनन,
ताड़ी तहाँ लगाव ।
मणि समान दीपक करु मनसा,
जोति में जोति मिलाव ॥ ३ ॥
मन औ पवन होत जब इकतर १ ,
नाहीं बीच बराव ।
जगजीवन के प्रभु सिर नायक,
आनंद मंगल गाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६६ ॥
सत्त नाम सुमिरहु मन माहीं ॥टेक॥
यह तौ बजार है पाप पुन्न को ।
नेकी बदी दुइ सौदा बिकाहीं ॥ १ ॥
केहु नेकी केहु बदी बनिज करि ।
सो बिसाहि अपने घर माहीं ॥ २ ॥
जगजिवनदास जे नाम बनिज कियो ।
अमर भये ते मरहीं नाहीं ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६७ ॥
ए मन काहे क परयो भुलाइ ।
काहे डार्यो सुधि बिसराइ ॥ १ ॥
जब तुम आयहु करि इकरार ।
तब तुम नाहीं कीन्ह बिचार ॥ २ ॥
खिया बुंद माँ रह्यो समाइ ।
तब हूँ नाहीं कछू चेताइ ॥ ३ ॥
(१) एक रस ।
६२ जगजीवन साहब की वानी
जामा पहिरि भयो मस्तान ।
रह दस मास न किह्यो तेवान१ ॥ ४ ॥
जरयो नहीं अगिनी महँ अंग ।
बाहर होत भयो चित भंग ॥ ५ ॥
गोद लाय फिरि दूध पियाई ।
जुबा में जुबती बहुत हिताई ॥ ६ ॥
कामी करम गयो सब भूले ।
मुक्के खात रहहु गे झूले ॥ ७ ॥
बृद्ध भयो तब बुद्धि सँभारि ।
तब नहि सुमिरन जात सँवारि ॥ ८ ॥
कफ खाँसी औ सीत सताइ ।
सँवरि सँवरि२ तब रहि पछिताइ ॥ ६ ॥
उलटि लगाय रह्यो दृढ़ डोरी ।
कहौं सिखाय रह्यो मन मोरी ॥ १० ॥
जगजीवन सत मत गहि डोरी ।
ससि चकोर ज्यों रहि टक जोरी ॥ ११ ॥
॥ शब्द ६८ ॥
साधो भजहु नाम मन लाइ ।
बहुरि नहीं अस औसर पाइ ॥ १ ॥
अब के चूका चूका सोइ ।
बहुरे नाहि सँवारहि कोइ ॥ २ ॥
माया मोह तकि सबै भुलाना ।
अंत काल सोई पछिताना ॥ ३ ॥
राजा रंक छत्र-पति सोई ।
बिनु वह नाम गये ते रोई ॥ ४ ॥
(१) फिक्र । (२) सुमिर ।
चेतावनी ६३
बुरा न मानहु कहहुँ पुकारी ।
देखु आपने मनहिं बिचारी ॥ ५ ॥
यहि ते उत्तम अरु कछु नाहीं ।
धन वै दास अहें जग माहीं ॥ ६ ॥
जगजीवन कहि प्रगट पुकारी ।
जिन सुमिरा तिन लिया कुल तारी ॥ ७ ॥
॥ शब्द ६६ ॥
जग की कही जात नहिं भाई ।
नैनन देखि परखि करि लीन्ह्यौ, तऊ न रह्यो छुपाई ॥ १ ॥
आहै साँच झूठ कहि भाषहिं, झूठेह साँच गोहराई ।
ताहि पाप संताप परैंगे, भर्म परे ते जाई ॥ २ ॥
निंदा करत हैं जानि बूझि कै, जहाँ तहाँ कुटिलाई ।
जानत अहें बनाउ ताहि का, देइहि ताहि सजाई ॥ ३ ॥
मैं तो सरन हौं ताहि चरन की, सूरति नहिं बिसराई ।
जगजीवन है ताहि भरोसे, कहै सो तैसे जाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७० ॥
प्रात नाम सतगुरु का गावै ।
अंतै मनुवाँ नाहिं बहावै ॥ १ ॥
मनुवाँ बहै भजन नहिं होय ।
जाइहि भजन बरत सब खोय ॥ २ ॥
दृढ़ ह्वै अंतर जपिये जापा ।
जेहि तें जाहिं कर्म कटि पापा ॥ ३ ॥
अजपा जाप जपै जो कोई ।
परगट कहौं भक्त सो होई ॥ ४ ॥
साधू भये सोई जग माहीं ।
जैसे पदुम कमल जल माहीं ॥ ५ ॥
६४ | जगजीवन साहब की बानी
जग तें न्यारे भये निरासा ।
जगजीवन तेहि चरन क दासा ॥ ६ ॥
॥ शब्द ७१ ॥
करहु बंदगी बंदे सोई ।
जेहि तें अंत भला कछु होई ॥ १ ॥
तजहु बिबाद न निंदा करहू ।
दीन होय मन अपने रहहू ॥ २ ॥
मत सो सत मैं देउँ बताई ।
भजहु नाम यहि जुक्ति तें जाई ॥ ३ ॥
त्यागि देहु मन गरब गुमान ।
तौ भल मानहिं कृपानिधान ॥ ४ ॥
साध कहत औ बेद पुरान ।
सत्त सब्द याहै परमान ॥ ५ ॥
दुइ अच्छर गहहू तत सार ।
याहै सत मत कीन बिचार ॥ ६ ॥
जगजीवन चरनन लिपटान ।
निरखहु छबि निरगुन निरबान ॥ ७ ॥
॥ शब्द ७२ ॥
मन मदमाते फिरहिं बेहाल ।
अंत भयो धरि खायो काल ॥ १ ॥
तत्त ज्ञान मन कीन बिचार ।
सुकृत नाम भजु होय उबार ॥ २ ॥
यह उपदेस देत हौं सोई ।
देह धरे कछु दुख न होई ॥ ३ ॥
बेद ग्रंथ ज्ञान लियो छानी ।
चेत सचेत द्वै लीजै जानी ॥ ४ ॥