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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 110 में से

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पृष्ठ 63

६० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ६३ ॥
अरे मन करहु सच बिचार ।
समुझि बूझि कै जानि आपन, बृथा है संसार ॥ १ ॥
नीर बुंद तें साज कीन्ह्यो, एतो है बिस्तार ।
नगर उत्तम बनो अहै, सोइ न वारा पार ॥ २ ॥
तहाँ के परधान पाँचो, करहिं बहु अपकार ।
संग ताहि पचीस नारी१, किहेहु नहिं ब्योहार ॥ ३ ॥
मिलि चलहु बस करहु तीसौ२, संग लै कै सिधार ।
जगजिवन दास गुफा गगन महँ, निरखि छबिहि नियार ॥४॥
॥ शब्द ६४ ॥
मन बिनु समुझे नाहीं होय ।
महा अपरबल अहै माया, भूलि रहे सब कोय ॥ १ ॥
सुख आनंद में पर्यो गाफिल, डारि सर्बस खोय ।
अंत काल पछिताय रहे हैं, चले कर मलि रोय ॥ २ ॥
नाहिं काहु क अहै कोऊ, कहै आपन सोय ।
पुछिहै कछु कीन्ह करतब, बहुत फजिहत होय ॥ ३ ॥
डोरि पोढ़ि लगाय रहि जग, नाहिं पूछै कोय ।
जगजिवन दास चरन गहि मन, अचल अम्मर होय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६५ ॥
मन रे प्रभु सों चित्त लगाव ।
छाँड़ि दे जंजाल जक्त को,
गुरु मारग माँ आव ॥ १ ॥
गुरु के बचन हृदय धरु मूरख,
ज्ञान ध्यान मन लाव ।
(१) प्रकृति । (२) पाँच तत्व और पच्चीस प्रकृति ।