जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 62, कुल 110 में से
संदर्भ में पढ़ेंजग महँ काया है उद्यान¹ ।
जो आये सो सबै भुलान ॥ ७ ॥
रहनि राम गहि नाम कि आस ।
उदित साध ते भये प्रकास ॥ ८ ॥
जगजीवन करु गगन मँडान ।
निरखहु सतगुरु सो निरबान ॥ ९ ॥
॥ शब्द ६१ ॥
डोरि पोढ़ि लागि रहै अंतर के माहीं ॥
निरखि परखि लै लगाय लखै कोउ नाहीं ।
गगन सहर लै दुकान बैठहु थिर ताहीं ॥ १ ॥
सेस ब्रह्मा बिस्नु संकर जोति निरमल वाहीं ।
भानु बिन बिहान है तहँ ससि गन नाहीं ॥ २ ॥
पवन पानी तें बिहून कनि मनि बरसाहीं ।
जगजीवन प्रकास सतगुरु सीस चरन रहीं ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६२ ॥
साधो कहौं तो कहा न जाईं ।
अनुचित चरित देखि दुनिया के, मन महँ रहौं चुपाइ ॥ १ ॥
जहवाँ चर्चा होत नाम कै, काहू नाहिं सोहाई ।
परपंची कछु औरहि भाषैं, बहुत करहिं कुटिलाई ॥ २ ॥
सुख के फल ते खाइ न पाइन, बिष रस बहुत हिताई ।
किहिन बिगार है जन्म जन्म का, परे नर्क महँ जाई ॥ ३ ॥
खाय अघाय फूलि कै बैठे, गर्व करहिं अधिकाई ।
सुमति पराय² अचेत ह्वै बैठे, कुमति प्रगट में आई ॥ ४ ॥
मैं तैं गर्व गुमान त्यागि कै, नय चालहु दिनताई ।
जगजीवन डर नाहिं काल का, लैहै नाम बचाई ॥ ५ ॥
( १ ) सैर की जगह । ( २ ) भाग गई ।