जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
प्रारंभिक जीवन-चरित्र एवं कोटवा धाम महिमा
जीवन-चरित्र
बीरू साहब (दिल्ली)
।
यारी साहब
।
बुल्ला साहब (भुरकुड़ा, जिला गाज़ीपुर)
┌─────────────┴─────────────┐
जगजीवन साहब गुलाल साहब
। ।
दूलमदास साहब भीखानन्द साहब
┌─────┘
गोबिन्द साहब (अहिरौली, जिला फैज़ाबाद)
।
पलटू साहब (अयोध्या)
──────────────────────────────────────────
॥ अंगों का सूचीपत्र ॥
─────────────────────
अंग पृष्ठ
विनती और प्रार्थना .... .... १-३१
चेतावनी .... .... ३१-६७
गुरु और शब्द महिमा .... .... ६७-८४
कर्म भर्म निषेध और उपदेश सतगुरु व शब्द भक्ति का ८४-१०६
जगजीवन साहब का जीवन-चरित्र
जगजीवन साहब जाति के छत्री थे और सरदहा गाँव में जो बाराबंकी (अवध) के जिले में
सरजू नदी के किनारे कोटवा से दो कोस की दूरी पर बसा है जन्म लिया था। ठीक समय इन
के जन्म और मरन का मालूम नहीं होता लेकिन हिसाब करने से अनुमान दो सौ बरस पहिले
उनका प्रगट होना और १४० बरस गुप्त हुए होना पाया जाता है। इसका प्रमान पादरी
जान टामस के लेख से भी मिलता है जिन्हों ने लिखा है कि जगजीवन साहब ने सत्तनामी
मत को चलाया और विक्रमी संबत १८१७ मुताबिक ईसवी सन १७६१ में ज्ञान प्रकाशक ग्रंथ
लिखा। इस हिसाब से उस ग्रंथ को रचे १४७ बरस हुए। पादरी साहब ने जगजीवन साहब
की जाति खत्री लिखी है पर यह भूल जान पड़ती है--उन्हों ने छत्री को खत्री समझा।
जगजीवन साहब के पिता खेती करते थे और लड़कपन में जगजीवन साहब अपने वाप के
गाय बैल चराया करते थे परन्तु बाल अवस्था ही से इन के चित्त का संसारी कामों से हटाव
ओर परमारथ की ओर झुकाव था और साधुओं का संग जहाँ तक औसर मिलता करते थे।
एक दिन एक पूरे फ़कीर बुल्ला साहब मय एक महात्मा गोबिंद साहब के (जो पलटू साहब के
गुरू थे) जिस मैदान में जगजीवन साहब पौहे चरा रहे थे पहुँचे और उनसे चिलम चढ़ाने के
लिये आग माँगी। जगजीवन साहब तुरंत अपने घर दौड़ कर गये और आग लाये और उसी
के साथ दोनों महात्माओं के पीने को दूध भी लेते आये, पर जी में डरते थे कि वाप की मार
न पड़े। उनके चित्त की यह दशा देख कर बुल्ला साहब ने हँस कर दूध ले लिया और बोले
कि डरो मत हम लोगो को देने से तुम्हारे घर का दूध घटा नहीं बरन बढ़ गया। जगजीवन
साहब अचरज में आकर उलटे पाँव घर को लौटे तो देखते क्या हैं कि दूध का बरतन नकनक
भर कर उबल रहा है और सारे घर मे मानो दूध की नदी बह रही है। जगजीवन साहब उन
साधुओं के पीछे दौड़े जो वहाँ से चल दिये थे और कुछ दूर जाकर उनको पकड़ा और प्रार्थना
की कि हम को मंत्र उपदेश करके अपना चेला बनाइये। बुल्ला साहब ने जवाब दिया कि
कान में मंत्र फूकने की जरूरत नहीं है और साथ ही उन पर ऐसी दया की दृष्टि डाली कि
जगजीवन साहब की दशा कुछ और ही हो गई और गहरा प्रेम और वैराग जाग उठा।
फिर बुल्ला साहब बोले कि हम केवल तुम को चिताने के लिये आये थे तुम पिछले जन्म के
बड़े अभ्यासी हो अब थोड़े ही दिन के अभ्यास से तुम्हारा जोग पूरा हो जायगा। जगजीवन
साहब ने उन के चरणों पर गिर कर प्रार्थना की कि कोई चिन्ह अपना देते जाइये जिस पर
बुल्ला साहब ने अपने हुक्के में से एक काला धागा और गोबिंद साहब ने अपने हुक्के में से
सफेद धागा तोड़ कर उन की दहनी कलाई पर बाँध दिया। यह चाल दहनी कलाई पर काला
और सफेद धागा बाँधने की जगजीवन साहब के पंथ वालों में जो सत्तनामी कहलाते हैं अब
तक जारी है और इस दोरंगे धागे को आँदू कहते हैं।
फिर तो जगजीवन साहब तन मन की सुद्ध बिसार कर अभ्यास और भक्ति में लगे और
दूर-दूर से लोग उनके दर्शन और उपदेश लेने के निमित्त आने लगे। यह महिमा उनकी देख
कर गाँव वालों को ईर्षा पैदा हुई और उनको सताने का कोई जतन उठा नहीं रक्खा। जगजीवन
२ जीवन-चरित्र
साहब उनसे पीछा छुड़ाने के लिये सरदहा गाँव को छोड़ कर कोटवा में जा रहे। कहते हैं कि
उनके जाते ही सरदहा गाँव को सरजू नदी बहा ले गई।
कोटवा में जगजीवन साहब की समाध और सातवीं गद्दी अब तक मौजूद है और हर
साल उन के पंथ वालों और साधारण लोगों का बड़ा भारी मेला होता है पर और पुराने मतों
की तरह इस में भी अब सच्चे अभ्यासी देख नहीं पड़ते।
जगजीवन साहब गृहस्थ आश्रम में थे। उन के विषय में कितने चमत्कार प्रसिद्ध हैं जिन
में से एक यह है कि उन की लड़की का ब्याह राजा गोंडा के लड़के से ठहरा। जब बरात आई
समधी ने बिना मास के भोजन करने से इनकार किया। इस पर जगजीवन साहब ने मौज से
बैंगन की तरकारी बनवा दी जिसे सब बरातियों ने मांस समझ कर बड़ी रुचि से खाया। इसी
कारन उनके पंथ वाले बैगन को मास के तुल्य समझ कर उस को नहीं खाते।
जगजीवन साहब पूरे संत थे जिन की ऊँची गति उनकी बानी पुकारती है। संपूर्ण बानी
रत्न-जटित है जिस के अंग अंग से भेद, दीनता और प्रेम टपकता है और पाठ करने से चित्त
गद्गद होकर प्रेम के घाट पर आ जाता है। इनके गुरू बुल्ला साहब की बानी भी बड़े ऊँचे
घाट की और अत्यन्त कोमल है जो छप गई है।
जगजीवन साहब का अति मनोहर ग्रंथ शब्द-सागर है जिस का पहिला भाग यह है जो दो
लिपियों से मिलान करके अंगों के क्रम अनुसार भरसक बहुत शुद्धता के साथ छापा गया है।
दूसरा भाग भी जिस मे और और अंग हैं अब छप गया है।
इस के सिवाय पादरी जान टामस लिखते हैं कि जगजीवन साहब के दो ग्रंथ ज्ञानप्रकाश
और महाप्रलय और हैं। इन ग्रंथों को हमने नहीं देखा है। पहिली पुस्तक के विषय मे पादरी
साहब कहते है कि वह महादेव और पारवतीजी के बीच प्रश्नोत्तर के रूप में है पर उस का विषय
क्या है यह नहीं बतलाया—जाहिर में जैसा कि नाम से जान पड़ता है ज्ञान पर सम्बाद होगा।
दूसरी पुस्तक में इस तरह चर्चा की है कि भक्त जन सब के बीच में रह कर सब से अलग है,
वह सब जानता है किसी से पूछने का मुहताज नहीं है वह न जनमता न मरता है न सीखता
न सिखाता है, न रोता न पछताता है, उस को न दुख व्यापता है न सुख, न न्याय न अन्याय,
इत्यादि—फिर पूछा है कि ऐसे पुरुष का कोई पता बतला सकता है।
जगजीवन साहब के गुरमुख चेले दूलमदास जी थे जिन का नाम प्रसिद्ध है।
श्रीमन्त राजारामजी बड़ागाँव जिला बलिया की कृपा से हम को जगजीवन साहब के गुर-घराने
की बंशावली का वृक्ष मिला है जो यहाँ छापा जाता है। उससे जान पड़ेगा कि कैसे-कैसे भारी
भक्त और महात्मा इस गुर-घराने में हुए हैं, और पलटू साहब जिन की अद्भुत कुंडलियाँ और
शब्दावली हम छाप चुके हैं और भीखा साहब जिन की शब्दावली जो छप गई है घरानेके थे।
नोट :—बंशावली तथा सूची भीतरी टाइटल पेज के पीछे देखिये।
जगजीवन साहब की बानी
बिनती और प्रार्थना
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु मैं तो अहौं तिहारा ।
पूजा अर्चा नाहीं जानों, जानों नाम पियारा ॥ १ ॥
सो हित सदा होत नहिं अनहित, बास किहे संसारा ।
कहत हौं दीन लीन रहों तुम तें, तुम ब्रत राखनहारा ॥ २ ॥
अंतर ध्यान गगन है मगना, निरखौं रूप तिहारा ।
पुहुप गूँधि कै माला लैके, सो पहिराओं हारा ॥ ३ ॥
पान चून औ खैर सुपारी, गरी जायफर डारा ।
कपुर लाइची मेरिया¹ वा में, पूजा यही हमारा ॥ ४ ॥
कटहर कोआ मेवा लायों, सोऊ पवावों² प्यारा ।
कनक नीर कर ते मुख धोओं, तकि के चरन पखारा ॥ ५ ॥
सो चरनामृत नित्त पियो है, सुभ भा जन्म हमारा ।
जगजीवन को दिहे रहहु यह, दाता होहु हमारा ॥ ६ ॥
॥ शब्द २ ॥
प्रभु गति जानि नाहीं जाइ ।
अहै केतिक बुद्धि केहि महँ, कहै को गति गाइ ॥ १ ॥
सेस सम्भू थके ब्रह्मा, बिस्नु तारी लाइ ।
है अपार अगाध गति प्रभु, कहुँ नाहीं पाइ ॥ २ ॥
भान गन ससि तीनि चौथौ, लिया छिनहिं बनाइ ।
जोति एकै कियौ बिस्तर, जहाँ तहाँ समाइ ॥ ३ ॥
सीस दैकै कहौं चरनन, कबहूँ नहिं बिसराइ ।
जगजीवन के सत्य गुरु तुम, चरन की सरनाइ ॥ ४ ॥
(१) मिलाया। खिलाऊँ।
जगजीवन साहिब की बानी
॥ शब्द ३ ॥
तुम ते कहै को बारम्बार ।
जानिये हित आपनो, मो राखिये दरबार ॥ १ ॥
टरौं ना मैं करहुँ सेवा, कठिन माया जार ।
समुझि सो डर होत निसु दिन, तारु अब की बार ॥२॥
नहीं गुन कछु अहै एकौ, औगुन अधिकार ।
करहु माफ गुनाह जैसे, मातु पालत वार१ ॥ ३ ॥
जात जानी दयति२ अब, प्रभु मोहिं है इतवार ।
जगजीवन निरबाहिये, प्रभु जवन कीन करार ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
महिं ते करि न बंदगी जाइ ।
सुद्धि तुमहीं बुद्धि तुमहीं, तुमहिं देत लखाइ ॥ १ ॥
केतनि हौं गनती में केतो, कहि न सकौं बनाइ ।
चहे चरन लगाइ राखो, चाहिये बिसराइ ॥ २ ॥
देवता मुनि जती सुर सब, रहे तारी लाइ ।
पढ़ै चारिउ बेद ब्रह्मा, गाइ गाइ सुनाइ ॥ ३ ॥
भस्म अंग लगाइ संकर, रहे जोति मिलाइ ।
कौन जानै गति तुम्हारो, रहे जहँ तहँ छाइ ॥ ४ ॥
जानिये जन आपना मोहिं, कबहुँ ना बिसराइ ।
जगजीवन पर करहु दाया, तबहिं भक्त कहाइ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५ ॥
अब मैं कवन गनती आउ ।
दियो जबहि लखाइ महि कहँ, तबहिं सुमिरौ नाउ ॥१॥
समुझि ऐसे परत मोहि कहँ, बसे सरबस ठाउँ ।
अहो न्यारे कहूँ३ नाहीं, रूप की बलि जाउँ ॥ २ ॥
(१) बालक । (२) दात, बख्शिश । (३) कभी ।
बिनती और प्रार्थना। ३
नाम का बल दियो जेहि कहँ, राखि निर्भय गाउँ ।
काल को डर नहीं उहवाँ, भला पायो दाउँ ॥ ३ ॥
चरन सीसहिं राखि निरखी, चाखि दरस अघाउँ ।
जगजीवन गुर करहु दाया, दास तुम्हरा आउँ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
अब मोहिं जानु आपन दास ॥ टेक ॥
सीस चरन में रहै लागो, और करौं न आस ।
दियो मोहिं उपदेस तुम्हीं, आइ तुम्हरे पास ॥ १ ॥
लियो ढिग बैठाइ कै जग, जानि सबै निरास ।
भला है अस्थान अम्मर, जोति है परगास ॥ २ ॥
करौं बिनती बहुत बिधि ते, दीजिये विस्वास ।
गति तुम्हारी कौन जानै, जगजीवन है दास ॥ ३ ॥
॥ शब्द ७ ॥
बिनती लेहु इतनी मानि ।
कहौं का कहि जात नाहीं, कवन अहौं केतानि ॥ १ ॥
कियो जबहीं दया तुम्हीं, लियो संतन छाँनि ।
रूप नीक लखाय दीन्ह्यौ, होत लाभ न हानि ॥ २ ॥
रहत लागे सदा आगे, सब्द कहत बखानि ।
लागि गा सो पागि गा, पुनि गगन चढ़ि ठहरानि ॥ ३ ॥
निरमल जोति निहारि निरखत, होत अनहद बानि१।
जगजिवन गुरु की भई दाया, लियो मन महँ छानि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
साँई को केतानि गुन गावै ।
सूझि बूझि तस आवै तेहि का, जेहि का जौन लखावै ॥ १ ॥
आपुहि भजत है आपु भजावत, आपु अलेख लखावै ।
जेहि कहँ अपनी सरनहिं राखै, सोई भगत कहावै ॥ २ ॥
३ जगजीवन साहब की बानी
टारत नहीं चरन ते कबहुँ, नहि कबहुँ बिसरावै ।
सूरति खैंचि ऐंचि जब राखत, जोतिहिं जोत मिलावै ॥ ३ ॥
सतगुर कियो गुरुमुखी तेहिकाँ, दूसर नाहिं कहावै ।
जगजीवन ते भे संग बासी, अंत न कोऊ पावै ॥ ४ ॥
॥ 'शब्द ९' ॥
अब मैं करौं कौन बयान ।
चहौ पल में करहु सोई, होय सो परमान ॥ १ ॥
सहस जिभ्या सेस बरनत, कहत वेद पुरान ।
मोहिं जैसो करहु दाया, करहुँ तैसि बखान ॥ २ ॥
संतन काँह सिखाइ लीन्ह्यो, कहत सोई ज्ञान ।
लागि पागि कै रहे अन्तर, मस्त रहत निर्बान ॥ ३ ॥
रहे मिल तुम्ह नहीं न्यारे, कबहुँ नहिं बिलगान ।
जगजीवन धरि सीस चरनन, नहीं भावै आन ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
अब मैं कहौं का कछु ज्ञान ।
बुद्धि हीनं सुद्धि हीनं, हौं अजान हैवान ॥ १ ॥
ब्रह्म सेस महेस सुमिरत, गहै अन्तर ध्यान ।
संत तंते रहत लागे, कहत ग्रंथ पुरान ॥ २ ॥
जोति एकै अहै निर्मल, करै सबै बयान ।
जहाँ जैसे भाव आहे, भयो तस परमान ॥ ३ ॥
करौ दाया जानि आपन, नहीं जानहुँ आन ।
जगजीवन दास सत्य समरथ, चरन रहु लिपटान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ११ ॥
साँई मैं नहीं कछु जाना ॥ टेक ॥
बाल बुद्धि कछु नाहिं जान्यो,
रह्यो सदा हैवाना ।
बिनती और प्रार्थना ।
करि कुसंग कुमारग डोल्यौ,
निसि बासर अभिमाना ॥ १ ॥
नहिं मति मोरि कहौं मैं कहँ लगि,
तुम सब कृपा-निधाना ।
मोहिं सिखाई पढ़ाइ दृढ़ावहु,
तबहिं धरौं मैं ध्याना ॥ २ ॥
मैं बपुरा केतनि किन माहीं,
करि नहिं सकौं बखाना ।
जगजीवन पर दाया करिये,
गुरु निरखै निरबाना ॥ ३ ॥
॥ शब्द १२ ॥
साँई जब तुम मोहिं बिसरावत ।
भूलि जात भौजाल जगत माँ,
मोहिं नहीं कछु आवत ॥ १ ॥
जानि परत पहिचान होत जब,
चरन सरन लै आवत ।
तब पहिचान होत है तुम ते,
सूरति सुरति मिलावत ॥ २ ॥
जो कोइ चहै कि करौं बंदगी,
बपुरा कौन कहावत ।
चाहत खैंचि सरन ही राखत,
चाहत दूरि बहावत ॥ ३ ॥
हौं अजान अज्ञान अहौं प्रभु,
तुम ते कहि कै सुनावत ।
जगजीवन पर करत हौ दाया,
तेहि ते नहिं बिसरावत ॥ ४ ॥
जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १३ ॥
प्रभुजी का बसि अहै हमारी।
जब चाहत तब भजन करावत,
चाहत देत बिसारी ॥ १ ॥
चाहत पल छिन छूटत नाहीं,
बहुत होत हितकारी ।
चाहत डोरि सूखि पल डारत,
डारि देत संसारी ॥ २ ॥
कहँ लहि बिनय सुनावौं तुम ते,
मैं तो अहौं अनारी।
जगजिवन दास पास रहै चरनन,
कबहुँ करहु न न्यारी ॥ ३ ॥
॥ शब्द १४ ॥
बंदा कौन बंदगी करई।
रात दिवस मिलि करै बंदगी,
जो पै कबूल न परई ॥ १ ॥
चाहत है मैं रहौं चरन ढिग,
दृढ़ ह्वै धरनी धरई।
साँई चहत मोर है नाहीं,
दूर दूर ह्वै रहई ॥ २ ॥
जोगी जती मुनि जब सब थाके,
करि कै तपस्या मरई।
नाहीं हित करि जानत आपन,
नाहिं काज कछु सरई ॥ ३ ॥
आपु बंदगी करत करावत,
जेहिं पर किरपा करई।
बिनती और प्रार्थना । ७
जगजीवन दास बिनती करि,
बिनवै सीस चरन तर धरई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १५ ॥
प्रभु जी तुम जानत गति मेरी ।
तुम ते छिपा नहीं आहै कछु,
कहा कहौं मैं टेरी ॥ १ ॥
जहँ जहँ गाढ़ पर्यो भक्तन कां,
तहँ तहँ कीन्ह्यो फेरी ।
गाढ़ मिटाय तुरन्तहि डारयो,
दीन्ह्यो सुख घनेरी ॥ २ ॥
जुग जुग होत ऐसै चलि आवा,
सो अब साँझ सबेरी ।
दियो जनाय सोई तस जानै,
बास मनहिं तेहि केरी ॥ ३ ॥
कर औ सीस दियो चरनन महँ,
नहिं अब पाछे हेरी ।
जगजीवन के सतगुरु साहब,
आदि अंत तेहि केरो ॥ ४ ॥
॥ शब्द १६ ॥
प्रभु बिन किरपा भक्ति न होय ।
कर्म अघ तेहि मेटि डारयो, मंत्र सिखयो सोय ॥ १ ॥
तिरथ बरत करि तपस्या, डारि यहु तन खोय ।
नाहि लाहत नाम रस बहु, नाहिं दृढ़ता होय ॥ २ ॥
कोटि तीर्थ अस्नान करि कै, सैन रहे समोय ।
ऐस करि कै बिचार नाहीं, रहे मन मन रोय ॥ ३ ॥
जगजीवन साहब की बानी
पढ़ि पुरान गरंथ गीता, बकत कीरति सोय।
नहीं अजपा डोरि लागे, भक्ति कैसे होय ॥ ४ ॥
हो दयाल निहाल कर मोहिं दूजा नाहिन कोय।
जगजीवन को चरन गुरु के, नहीं न्यारा होय ॥ ५ ॥
॥ शब्द १७ ॥
प्रभु जी बुद्धि मोहिं केतानि।
दया जब तुम कीन मो पर, कह्यौ ज्ञान बखानि ॥ १ ॥
भ्रमत रह्यौ अपंथ मारग, पर्यो जाही जानि।
कहाँ लहि मैं कहौं औगुन, महा अघ की खानि ॥ २ ॥
मेटि सकल गुनाह औगुन, सरन लीन्ह्यो आनि।
जानि हित करि आपना मोहिं, और नाहीं मानि ॥ ३ ॥
कहत हौं कर जोरि सुनिये, मोरि अन्तर जानि।
जगजिवन दास तुम्हार आहै, तुमहिं लियो पहिचानि ॥ ४ ॥
॥ शब्द १८ ॥
मैं तौ दास तुम्हार कहावौं।
तुम तजि और न जानौं कोई,
औरै सीस न नावौं ॥ १ ॥
चरन तुम्हारे लागि रहौं मैं,
और सबै बिसरावौं।
तुम्हीं ते निरबाह हमारा,
तुम्हरी कीरति गावौं ॥ २ ॥
चलौं दीनता ह्वै कै सब ते,
नाहिं बिबाद बढ़ावौं।
जो कोइ कीन १ जानि है मोहीं,
तेहि का दूरि बहावौं ॥ ३ ॥
(१) द्रोही।
बिनती और प्रार्थना । ६
आदि अन्त का आहौँ संगी,
त्यागि न अन्तै धावौं ।
जब तुम खुसी सुचित्त होत हौँ,
तब मैं सुरति मिलावौं ॥ ४ ॥
अपने अपने रँग रस माते,
केहि केहि राह लगावौं ।
जगजीवन गुरु चरनन परि कै,
नाहीं सीस उठावौं ॥ ५ ॥
॥ शब्द १६ ॥
साईं इतनो बिनती मोरि ।
माँगत हौँ कर जोरि कै तुम ते,
लागि रहै दृढ़ डोरि ॥ १ ॥
रह्योँ अजान नहीं मैं जान्यो,
बहुत हीन मति थोरि ।
जब ते कृपा करि आपन जान्यो,
तब ते सकौँ का तोरि ॥ २ ॥
अब उसवास१ न एकौ मानौँ,
चाखि नाम रस घोरि ।
सदा भरोसा आस तुम्हारी,
भर्म फंद ते तोरि ॥ ३ ॥
चरन ते सीस टरै नहिं टारे,
दीजै हमहि न खोरि ।
जगजिवन दास तुम्हार कहावै,
सतसंगति गहि पोढ़ि ॥ ४ ॥
(१) संसय ।
३
जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द २० ॥
अब मोर मनुवां समुझि डेरात ।
वहि दिन का मोहिं संसा ब्यापत,
कछु गति जानि न जात ॥ १ ॥
काम न आइहि कोउ काहू के,
नारि बंधु पितु मात ।
धोखा देखि सबै कोउ भूला,
थिर नाहीं सब जात ॥ २ ॥
जन्म पाइ जो जानै नाहीं,
कौनि कहौं कुसलात ।
जगजीवन साईं तुम तारहु,
तुमहिं हाथ सब बात ॥ ३ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अब सुनि लीजै इतनी हमारी ।
लागी रहै प्रीति निसि बासर,
दास को अपने नाहिं बिसारी ॥ १ ॥
जो मैं चहौं कहि कहँ लौ सुनावों,
औगुन कर्म बहुत अधिकारी ।
सरन चरन की राखि आपनी,
यहु कछु मन में नाहिं बिचारो ॥ २ ॥
काया यहि कर्महिं की आहै,
आपु ते नाहीं जात सँवारो ।
भौसागर हित जानि बूड़ जग,
जेहिं जान्यो तेहिं लियो उबारी ॥ ३ ॥
बिनती और प्रार्थना । ५
लीजै राखि भाखि कहौं तुम ते,
केतिक बात लियो अनगन१ तारी ।
जगजीवन के सांई समरथ,
अपने निकट ते कबहुँ न टारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द २२ ॥
सांई मैं नहिं आप का चीन्हा ।
को मैं आहुँ कहाँ ते आयो,
तुम हीं सब कछु कीन्हा ॥ १ ॥
बिंदम बुंद बनायो जामा,
सो पहिराइ कै दीन्हा ।
रहि दस मास अगिन महँ बासा,
तहँ तुम रच्छा कीन्हा ॥ २ ॥
बाहर होत पियत पय बिसरयो,
वह सुधि सब हरि लीन्हा ।
बाल तरुन फिर बृद्ध भये जब,
तबहुँ बिचार न कीन्हा ॥ ३ ॥
अब दाया करि दास जानि कै,
आपन करि कै लीन्हा ।
जगजीवन निरगुन छबि देखै,
चरन कमल चित दीन्हा ॥ ४ ॥
॥ शब्द २३ ॥
तुम सों मन लागो है मोरा ।
हम तुम बैठे रही अटरिया,
भला बना है जोरा ॥ १ ॥
(१) अनगिनत ।
२ जगजीवन साहब की बानी
सत की सेज बिछाय सूति रहि,
सुख आनन्द घनेरा ।
करता हरता तुमहीं आहहु,
करौं मैं कौन निहोरा ॥ २ ॥
रह्यौँ अजान अब जानि पर्यो है,
जब चितयो एक कोरा ।
अब निर्बाह किये बनि आइहि,
लाय प्रीति नहि तोरिय डोरा ॥ ३ ॥
आवा गमन निवारहु साईं,
आदि अंत का आहिउ चोरा ।
जगजीवन बिनती करि माँगै,
देखत दरस सदा रहौं तोरा ॥ ४ ॥
॥ शब्द २४ ॥
साँई मोहिं ते सुमिर न जाई ।
पाँच अपरबल जोर अहैं एइ,
इन ते कछु न बिसाई ॥ १ ॥
निसि बासर कल देहि नहीं एइ,
मोहिं औरै राह लगाई ।
जो मैं चहौं गहौं तुव चरना,
इन छिन छिन भरमाई ॥ २ ॥
साथ स
बिनती और प्रार्थना ।
ऊँचे चढ़त आनि कै रोकत,
मानहिं नहीं दोहाई ॥ ४ ॥
अब करु दाया जानि आपना,
बिनय कै कहौं सुनाई ।
जगजीवन कै इतनी बिनती,
तुम सब लेहु बनाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द २५ ॥
साईं मैं तो बड़ा अनारी ।
कुमति प्रसंग बास नर्कहिं मा,
आवत नाहिं बिचारी ॥ १ ॥
पर्यों अपरबल महा मोह महँ,
सुधि वह नाहि सँभारी ।
गुन नाहीं औगुन सब बहु बिधि,
बिसरी सुरति हमारी ॥ २ ॥
केतौ करि उपाय मैं थाक्यों,
मैं मन मान्यों हारी ।
अब दाया करि चरन लाई कै,
निकट ते कबहुँ न टारी ॥ ३ ॥
देहु सिखाइ पढ़ाइ ज्ञान मोहिं,
करहु योग अधिकारी ।
जगजीवन को चरन तुम्हारे,
सूरति रहौं निहारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द २६ ॥
साईं कुदरति अजब तुम्हारो ।
तुम हहु अजब अजब हैं बन्दे,
मैं तुम्हरी बलिहारी ॥ १ ॥
जगजीवन साहेब की बानी
दुनिया अजब धंध मा लागी,
सुधि बुधि नाहिं सँभारी ।
आये फूटि टूटि गारत भै,
का सों कहौं पुकारी ॥ २ ॥
समुझै बूझै बूझै नाहीं,
शब्द कही कहि हारी ।
सो अँदेस होत मन मोरे,
का धौं करहि बिचारी ॥ ३ ॥
आये कहँ ते फिरि कहँ जैहैं,
कहँ ग्रह ग्राम सँवारी ।
भूले फिरहिं मोह मद माते,
इहँ हहिं दिन दुइ चारी ॥ ४ ॥
जेहिं अपनाइ कै चेत चितायौ,
तिन सत सुरति सँभारी ।
जगजीवन मूरति मा मिलि गे,
नैन सों निरखि निहारी ॥ ५ ॥
॥ शब्द २७ ॥
सतगुरु समरथ साहब चरनन पर वारी ॥ टेक ॥
हौं अज्ञान बुद्धिहीन सुद्धि ना सँभारी ।
कर दोऊ तन सीस दीन्ह्यौ गोद हौं तुम्हारी ॥ १ ॥
राखिये अब सरन अपनी कर्म ना बिचारी ।
नेग१ जन्म भर्म के रे डारिये मिटा री ॥ २ ॥
हौं तुम्हार आदि अन्त देहु ना बिसारी ।
ऐसी भाँति दिनं राति चित्त ते न टारी ॥ ३ ॥
(१) अनेक।
बिनती और प्रार्थना । १५
बिनय करि कै कहत हौं सुनि लीजिये हमारी ।
जगजीवन का और ना पनाह है तुम्हारो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २८ ॥
बालक बुद्धि हीन मति मोरी ।
भरमत फिरौं नाहिं दृढ़ डोरी ॥ १ ॥
सूरति राखौ चरनन मोरी ।
लागि रहै कबहुँ नहिं तोरी ॥ २ ॥
निरखत रहौं जाउँ बलिहारी ।
दास जानि कै नाहिं बिसारी ॥ ३ ॥
तुमहिं सिखाय पढ़ायो ज्ञाना ।
तब मैं धर्यौ चरन का ध्याना ॥ ४ ॥
साईं समरथ तुम हौ मोरे ।
बिनती करौं ठाढ़ कर जोरे ॥ ५ ॥
अब दयाल ह्वै दाया कीजै ।
अपने जन कहँ दरसन दीजै ॥ ६ ॥
नाम तुम्हार मोहिं है प्यारा ।
सोइ भजे घट भा उजियारा ॥ ७ ॥
जगजीवन चरनन दियो माथ ।
साहब समरथ करहु सनाथ ॥ ८ ॥
॥ शब्द २६ ॥
तेरा नाम सुमिरि ना जाय ।
नहीं बस कछु मोर आहै, करहुँ कौन उपाय ॥ १ ॥
जबहिं चाहत हितू करि कै, लेत चरनन लाय ।
बिसरि जब मन जात आहै, देत सब बिसराय ॥ २ ॥
अजब ख्याल अपार लीला, अंत काहु न पाय ।
जीव जंत पतंग जग महँ, काहु ना बिलगाय ॥ ३ ॥
जगजीवन साहब की बानी
करौं बिनती जोरि दुउ कर, कहत अहौं सुनाय ।
जगजीवन गुरु चरन सरनं, ह्वै तुम्हार कहाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
मैं तौ अरज करौं दरबार ।
भौसागर तकि भरम होत मोहिं,
अब की उतारहु पार ॥ १ ॥
औगुन बहुंत नहीं गुन एकौ,
काम करत बिन कार ।
पग बिहीन कर नाहीं जिन के,
ताहि खवावत चार ॥ २ ॥
बुद्धि हीन सुधि हीन अहौं मैं,
का करि सकौं बिचार ।
अहौं भरोसे सदा तुम्हारे,
तुम प्रति पालनहार ॥ ३ ॥
सुनियत ग्रंथ पुरान कहत अस,
बहुतन करि निस्तार ।
छिनहिं निहाल किहेउ प्रभु बहुतन,
द्विज के दारिद मार ॥ ४ ॥
अब दाया करिये प्रभु इतनी,
आवै मोहिं इतबार ।
जगजीवन चरनन परि बिनवै,
मन ना बहै हमार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३१ ॥
हम तें चूक परत बहुतेरी ।
मैं तौ दास अहौं चरनन का, हम हूँ तन हरि हेरी ॥ १ ॥
बिनती और प्रार्थना । १७
बाल-ज्ञान प्रभु अहै हमारा, झूठ साँच बहुतेरी ।
सो औगुन गुन का कहौं तुम तें, भौसागर तें निबेरी ॥ २ ॥
भव तें भागि आयौं तुव सरनै, कहत अहौं अस टेरी ।
जगजीवन की बिनती सुनिये, राखौ पत जन केरी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३२ ॥
अब तुम होहु दयाल तुम्हारी पैयाँ परौं ॥टेक॥
सूझत नहिं मैं भ्रमत फिरत हौं,
पर्यों मोह के जाल ॥ १ ॥
नाम तुम्हार सुमिरि नहिं आवै,
जग संगति जंजाल ॥ २ ॥
आवत जब सुधि वहै समय की,
ब्याकुल होहुँ बेहाल ॥ ३ ॥
हाथ पाँव मेरे बल नाहीं है,
तुमहिं करहु प्रतिपाल ॥ ४ ॥
जगजीवन कौ दरसन दीजै,
अब मोहिं करहु निहाल ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
बार बार कहि बिनय सुनावौं ।
तुम्हरी कृपा तें सुरति लगावौं ॥ १ ॥
अनत न जाउँ जाउँ बलिहारी ।
सूरति कबहुँ रहै न न्यारी ॥ २ ॥
जब तुम चहहु रहौं तब पासा ।
कृपा करहु तब बसि बिस्वासा ॥ ३ ॥
दास केर बस एकौ नाहीं ।
तुम जानौ जानै मन माहीं ॥ ४ ॥
३