जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजगजीवन साहब का जीवन-चरित्र
जगजीवन साहब जाति के छत्री थे और सरदहा गाँव में जो बाराबंकी (अवध) के जिले में
सरजू नदी के किनारे कोटवा से दो कोस की दूरी पर बसा है जन्म लिया था। ठीक समय इन
के जन्म और मरन का मालूम नहीं होता लेकिन हिसाब करने से अनुमान दो सौ बरस पहिले
उनका प्रगट होना और १४० बरस गुप्त हुए होना पाया जाता है। इसका प्रमान पादरी
जान टामस के लेख से भी मिलता है जिन्हों ने लिखा है कि जगजीवन साहब ने सत्तनामी
मत को चलाया और विक्रमी संबत १८१७ मुताबिक ईसवी सन १७६१ में ज्ञान प्रकाशक ग्रंथ
लिखा। इस हिसाब से उस ग्रंथ को रचे १४७ बरस हुए। पादरी साहब ने जगजीवन साहब
की जाति खत्री लिखी है पर यह भूल जान पड़ती है--उन्हों ने छत्री को खत्री समझा।
जगजीवन साहब के पिता खेती करते थे और लड़कपन में जगजीवन साहब अपने वाप के
गाय बैल चराया करते थे परन्तु बाल अवस्था ही से इन के चित्त का संसारी कामों से हटाव
ओर परमारथ की ओर झुकाव था और साधुओं का संग जहाँ तक औसर मिलता करते थे।
एक दिन एक पूरे फ़कीर बुल्ला साहब मय एक महात्मा गोबिंद साहब के (जो पलटू साहब के
गुरू थे) जिस मैदान में जगजीवन साहब पौहे चरा रहे थे पहुँचे और उनसे चिलम चढ़ाने के
लिये आग माँगी। जगजीवन साहब तुरंत अपने घर दौड़ कर गये और आग लाये और उसी
के साथ दोनों महात्माओं के पीने को दूध भी लेते आये, पर जी में डरते थे कि वाप की मार
न पड़े। उनके चित्त की यह दशा देख कर बुल्ला साहब ने हँस कर दूध ले लिया और बोले
कि डरो मत हम लोगो को देने से तुम्हारे घर का दूध घटा नहीं बरन बढ़ गया। जगजीवन
साहब अचरज में आकर उलटे पाँव घर को लौटे तो देखते क्या हैं कि दूध का बरतन नकनक
भर कर उबल रहा है और सारे घर मे मानो दूध की नदी बह रही है। जगजीवन साहब उन
साधुओं के पीछे दौड़े जो वहाँ से चल दिये थे और कुछ दूर जाकर उनको पकड़ा और प्रार्थना
की कि हम को मंत्र उपदेश करके अपना चेला बनाइये। बुल्ला साहब ने जवाब दिया कि
कान में मंत्र फूकने की जरूरत नहीं है और साथ ही उन पर ऐसी दया की दृष्टि डाली कि
जगजीवन साहब की दशा कुछ और ही हो गई और गहरा प्रेम और वैराग जाग उठा।
फिर बुल्ला साहब बोले कि हम केवल तुम को चिताने के लिये आये थे तुम पिछले जन्म के
बड़े अभ्यासी हो अब थोड़े ही दिन के अभ्यास से तुम्हारा जोग पूरा हो जायगा। जगजीवन
साहब ने उन के चरणों पर गिर कर प्रार्थना की कि कोई चिन्ह अपना देते जाइये जिस पर
बुल्ला साहब ने अपने हुक्के में से एक काला धागा और गोबिंद साहब ने अपने हुक्के में से
सफेद धागा तोड़ कर उन की दहनी कलाई पर बाँध दिया। यह चाल दहनी कलाई पर काला
और सफेद धागा बाँधने की जगजीवन साहब के पंथ वालों में जो सत्तनामी कहलाते हैं अब
तक जारी है और इस दोरंगे धागे को आँदू कहते हैं।
फिर तो जगजीवन साहब तन मन की सुद्ध बिसार कर अभ्यास और भक्ति में लगे और
दूर-दूर से लोग उनके दर्शन और उपदेश लेने के निमित्त आने लगे। यह महिमा उनकी देख
कर गाँव वालों को ईर्षा पैदा हुई और उनको सताने का कोई जतन उठा नहीं रक्खा। जगजीवन