हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
६८ हिन्दुत्व
तिरस्कारसूचक होता तो क्या हमारी जातिके श्रेष्ठ और वीर
पुरुष इसे कदापि ग्रहण करते ? हमारी जातिके लोगोंको निश्चय
ही अरबी, फारसी अपरिचित नहीं थी ! मुसलमान हमें काफिर
भी कहा करते थे, पर यह नाम क्या कभी हिन्दुओंने ग्रहण
किया ? यदि नहीं तो हिन्दुस्थान और हिन्दू, इन शब्दोंके
बारेमें ही यह राष्ट्रीय अपमान उन्होंने क्यों स्वीकार किया ?
बहुतसे लोग यह कहा करते हैं कि “हिन्दु” शब्द संस्कृतमें नहीं
है । ठीक है, पर “हिन्दु” ही क्यों, बहुतसे शब्द हैं जो
संस्कृतमें नहीं हैं पर नित्य जिनका प्रयोग हम करते हैं । जैसे
बनारस, मराठा, सिख, गुजरात, पटना इत्यादि । पर क्या ये शब्द
यहां बाहरसे आये हैं ? 'बनारस' शब्द संस्कृतमें नहीं है, फिर
भी वह हमारा है और संस्कृतके “वाराणसी” शब्दका केवल
प्राकृत रूप है । सच तो यह है कि किसी प्राकृत शब्दको हम शुद्ध
संस्कृतमें ढूंढने लगें यही मूर्खता है । फिर भी, यह प्राकृत शब्द
होनेपर भी, किसी किसी संस्कृत ग्रन्थमें यह शब्द मिलता है ।
इसे इस शब्दके महत्त्वका ही प्रबल प्रमाण समझना चाहिये ।
उदाहरणार्थ, मेरुतंत्रमें यह शब्द आता है। महाराष्ट्रके सुप्रसिद्ध
कोषकार आपटे और बंगालके तारानाथ तर्कवाचस्पतिने अपने
कोषोंमें इसका हवाला दिया है। और “शिव शिव न हिन्दुर्नय-
वनः” यह वचन तो इतना प्रसिद्ध है कि उसका उल्लेख करनेकी
भी आवश्यकता नहीं ।
यह हो सकता है कि आधुनिक मुसलमानी फारसी भाषामें
हिन्दुत्वके तीन लक्षण [४६]
इस शब्दमें कोई तिरस्कारसूचक भाव आ गया हो, पर इससे
यह थोड़े ही होता है कि हिन्दू शब्दका मूल अर्थ ही ऐसा हो
और वह "काला आदमी" का पर्यायवाची हो ? हिन्दी और हिन्दू
शब्द फारसीमें हैं, पर उनका अर्थ "काला" नहीं है और यह भी
हम जानते हैं कि ये शब्द हिन्दू शब्दके साथ ही सिन्धु या सिन्ध
इसी संस्कृत शब्दसे निकले हुए हैं। यदि यह बात हो कि हिन्दू
शब्दका अर्थ "काला" होनेसे हम लोग "हिन्दु" कहलाये तो
फिर हिन्द और हिन्दी शब्द भी हममें क्यों लगाये गये जब कि
उनका अर्थ तो "काला आदमी" नहीं है ? बात यह है कि यह
शब्द आधुनिक फारसीसे निकला हुआ नहीं बल्कि ईरानकी
प्राचीन जेंद भाषाके समयका है और उस समय "हप्तहिन्दु" का
मतलब "सप्तसिन्धु" से ही था। हिन्दुओंका रंग "काला"
देखकर उन्हें हिन्दू कहा गया हो—यह सम्भव ही नहीं है, क्योंकि
बिलकुल सीधीसादी बात है कि अवेस्ता-कालके सप्तसिन्धु
अर्थात् हिन्दू पारसिकों (ईरानियों) के समान ही शुभ्र वर्णवाले
थे और ये दोनों पास पास ही और कभी कभी एक साथ ही
रहते थे। कभी कभी (याने ईसवी सन्के आरम्भमें पारथियन
लोग हमारे सीमान्तप्रदेशोंको "श्वेतभारत" कहकर संबोधन
करते थे। इस प्रकार हिन्दू शब्दका अर्थ मूलतः "काला आदमी"
कभी रहा हो, यह सम्भव नहीं है ।
इस प्रकार हिन्दू और हिन्दुस्थान ये गौरवयुक्त और देशाभि-
मानसूचक शब्द तबसे हमारे देश और राष्ट्रके नाम हैं, जब
द्वितीय खण्ड: धर्म, संस्कृति एवं पितृभूमि-पुण्यभूमि का लक्षण
मुसलमानां या मुसलमान ईरानियोंका पता भी नहीं था और
इसलिये जहां हिन्दू शब्दका इतना गौरव है और वह इतना हमारे
प्रेमका अधिकारी है, वहां इस बातका महत्व ही क्या है कि कोई
ऐरेगैरे दीवाने इस नामको अपमानसूचक मानते हैं या क्या
करते हैं । एक समय था जब खास इङ्गलैण्डमें "इङ्गलैण्ड" नाम
उसके नार्मन विजेताओंकी नजरोंमें इतना गिर गया था कि
वह एक दूसरेको गाली देनेके काम आता था । "क्या मैं अंगरेज
हूँ" यह कहना अपनी घोर भर्त्सना करना था "तुम अंगरेज हो"
यह किसी नार्मनको कहना अक्षम्य अपराध समझा जाता था ।
पर क्या इससे अंगरेजोंने अपने देश और राष्ट्रका नाम बदल दिया
और उसे "इङ्गलैण्ड"के बदले "नारमंडी' कहना शुरू किया ? और
क्या "इङ्गलैण्ड" या "अङ्गरेज" नाम त्याग कर देनेसे वे बड़े हो
जाते ? कदापि नहीं, प्रत्युत इसके विपरीत उन्होंने अपने पूर्वजोंके
रक्त और नामका उत्तराधिकार नहीं छोड़ा, इसीसे आज हम देखते
हैं कि जहां "नार्मन" शब्द और नार्मन देशका कहीं पता भी
नहीं है, वहां अंगरेज जाति और अंगरेजी भाषाने संसारमें
अपना सबसे महान् साम्राज्य स्थापित कर लिया है। अंगरेजी
साम्राज्यका वैभव निश्चय ही महान् है, पर हिन्दू साम्राज्यके
वैभवके सामने वह क्या चीज है !
लड़ाई-झगड़ोंके समय राष्ट्रोंका मन स्थिर नहीं रहता और
ऐसे समय यदि फारसवाले तथा अन्य लोग "हिन्दू" शब्दका
अर्थ "चोर" या "काला आदमी" ही मान बैठें, तो उन्हें यह भी
हिन्दुत्वके तीन लक्षण ७१
जानना चाहिये कि हिन्दू भी "मुसलमान" शब्द सदा भले आदमी-
का ही वाचक नहीं समझते थे । किसीको "मुसलमान" या
"मुसल्ला" कह देना उसे पशु कहनेसे भी बढ़कर गाली देना
था । जिस समय दो राष्ट्रोंके बीच जीवन-मृत्युका संग्राम
छिड़ता है उस समय इस तरह एक दूसरेको कोसना, गाली
देना चाहे अनिवार्य हो, पर ये बातें तब भूल जानी चाहिये जब
मनुष्य होशमें आकर भले आदमी कहलाना चाहते हैं। यह बात
भी भूलनेकी नहीं है कि प्राचीन यहूदी लोग "हिन्दू" शब्दसे बल
और तेजका अर्थ ग्रहण करते थे अर्थात् हमारे देश और राष्ट्रमें
ये गुण थे । "सोहाब मो अलक" नामक एक अरबी महाकाव्यमें
यह लिखा है कि, "घरवालोंके अत्याचार तो एक हिन्दूकी तल-
वारके प्रहारसे भी अधिक प्रखर और भीषण होते हैं" ; और
"हिन्दूकी तरह जवाब देना" यह कहावत तो ईरानियोंमें प्रसिद्ध
ही है, जिसका मतलब "हिन्दुस्थानी तलवारसे और दिलेरीके
साथ गहरा जखम करना" है । बाबीलान देशके लोग सबसे
अच्छे कपड़ेको "सिन्धु" कहा करते थे; क्योंकि ऐसा कपड़ा
प्रायः सप्तसिन्धुसे ही उन्हें मिलता था और इससे भी यह जाहिर
है कि ये लोग भी हमारे इस प्राचीन सिन्धु नामसे परिचित थे ;
और बाबिलानकी भाषामें इस शब्दका जो राष्ट्रीय अर्थ है उसके
सिवाय और कोई दूसरा अर्थ भी है, यह हमने अबतक नहीं
सुना ।
अपने पड़ोसके अत्यन्त प्राचीन और अत्यंत सुसंस्कृत चीन
७६ हिन्दुत्व
देशके सुप्रसिद्ध यात्री युआन चंगने “हिन्दू” नामका जो अर्थ
किया है, उसे जानकर कोई भी हिन्दू आत्मगौरव बोध किये बिना
न रहेगा। इसने “हिन्दू” शब्दको “इन्दु” शब्दसे मिलाया है
और कहा है कि संसार इस जातिको जो इन्दु (चन्द्रमा) कहता
है, वह ठीक ही है; क्योंकि यह जाति और इसकी संस्कृति,
चंद्रमाके समान, दुःख-संतप्त मनुष्यके मनको सदा शांति, शीतलता
और आनन्द देनेवाली है। क्या इन बातोंसे यह स्पष्ट नहीं
होता कि अपने नामका आदर उत्पन्न करनेका मार्ग उस नामको
छोड़ देना या उससे इन्कार करना नहीं बल्कि अपने शस्त्रके
तेजसे, अपने उद्देश्यकी पवित्रतासे तथा अपनी उदात्त संस्कृतिसे
संसारको विवश करना है कि वह उस नामके सामने सम्मानके
साथ नतमस्तक हो। अब हम लोगोंमेंसे कुछ लोग अपना
हौसला पूरा करनेके लिये मर्डु मशमारीकी रिपोर्टोंमें अपने आपको
“हिन्दू” न लिखाकर भले ही “आर्य” लिखायें; पर इससे होगा
क्या सिवा इसके कि “आर्य” शब्दको भी ऊपरसे नीचे खींच लावें
और शब्दकोषमें दासार्थवाची शब्दोंमें एक शब्द और बढ़ा दें ?
—जबतक हमारा राष्ट्र यथार्थमें उस प्राचीन आर्यगौरव और
आर्यतेजको नहीं प्राप्त कर लेता।
परंतु यदि हम हिन्दु या हिन्दुत्व, इन नामोंको त्याग देनेके
बेमतलब प्रस्तावपर गंभीरताके साथ कुछ भी विचार न करें
और यह मूखतापूर्ण बात भी मान लें कि विदेशियोंने ही
द्वेषबुद्धिसे हमारा यह नाम रखा तौभी क्या यह संभव है कि हम
हिन्दुत्वके तीन लक्षण ७३
इस नामको छोड़ सकें और कोई नया राष्ट्रीय नाम निर्माण करें ?
इस समय तो यही बात है कि "हिन्दू" शब्द हमारी जातिका
मानो झंडा ही बन बैठा है और यही एक ऐसी बात है जो कन्या-
कुमारीसे काश्मीरतक और अटकसे लेकर कटकतक हमारी
जातीय एकताको सबसे अधिक बल प्रदान करती और उसे दृढ़
करती है। क्या आप यह संभव समझते हैं कि इस नामको हम
इतनी आसानीसे बदल, सकते हैं जैसे कोई अपने सिरकी टोपी
बदल दे ? एक बारकी घटना है कि एक सज्जन मर्दुमशुमारीकी
रिपोर्टमें अपने आपको हिन्दू न लिखा कर "आर्य" लिखाना
चाहते थे; क्योंकि उनके सिरपर भ्रमका यह भूत सवार हुआ था
कि "हिन्दू" नाम घृणामूलक है और यह मुसलमानोंने रखा है
और इसका अर्थ चोर और काला आदमी है। समय न होनेसे
मैं उनके साथ बहुत बहस तो नहीं कर सका, पर मैंने उनसे
एक ही प्रश्न किया। पूछा, "आपका नाम क्या है ?" जवाब मिला
"तख्त सिंह"। तब मैंने कहा, भले आदमी ! पहले अपने नामको
तो देखो। हिन्दू शब्द तो ज्यादासे ज्यादा विवादग्रस्त शब्द
है, पर आपका नाम तो बिना किसी सन्देहके संकरी सृष्टि है और
इसलिये पहले यह नाम बदलकर कोई शुद्ध प्राचीन आर्य नाम
रखिये—जैसे मौद्गालायन या सिंहासनसिंह । तब बात छोड़कर
उन्होंने यह बतलाना आरंभ किया कि नाम बदलनेसे अर्थोपार्ज-
नका सारा कारबार ही उलट-पलट जायगा और फिर जब दुनिया
तख्तसिंह ही कहती रही तो हमारे सिंहासनसिंह घरमें ही बने
७४ , हिन्दुत्व
रहनेसे लाभ ही क्या ! तब मैंने कहा, “जब एक व्यक्तिको नाम
बदलना इतना कठिन है, यही नहीं बल्कि हानिकारक है, तब भला
एक समग्र जातिका नाम—वह नाम जो विदेशी नहीं बल्कि उतना
ही स्वदेशी है जितने कि हमारे वेद हैं—बदलना कितना कठिन
और कितना अधिक हानिकारक होगा, जरा सोचो ।” कोई ऐसा
नाम, जिसकी जड़ पातालमें पहुँची हो, बदलनेका प्रयत्न करना
कितना व्यर्थ है, इसका इस वैयक्तिक वृत्तान्तसे भी अधिक अच्छा
दृष्टान्त हमें पंजाबके हमारे खालसा पन्थमें मिलता है । यह वह
पन्थ है जिसे हिन्दु जातिका सिरमौर और सूरमा कहना चाहिये,
जिसे हमारे श्रेष्ठ गुरुने चुनकर तैयार किया और विजयानंदसे
गर्जना की कि, “नील वस्त्रके कपड़े फाडे तुरक पाणी अमल
गया ।” और जो पंथ संघटित करनेका कारण भी यही था कि,
“धर्म चलावन संत उबारण, दुष्ट दैत्यके मूल उपाटण, यहि काज
धरामैं जननम् । समझ लेहु साधुसम मननम् ॥ ( परित्राणाय
साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि
युगे युगे ॥) । योद्धाओंके उस दलका नाम “खालसा” रखा
गया । जिन महात्मा नानकका आज नित्य “वाह गुरुको फतेह,
वाह गुरु खालसा” कहकर साभिनन्दन वन्दन किया जाता है,
वे गुरु नानक दुःखसे कहा करते थे कि, “क्षत्रियां हि धर्म
छोडिया म्लेच्छ भाषा गहि । सृष्टि सब इक वर्ण हुई, धर्मकी
गति रही !” “दरबार”, “दीवान”, “बहादुर” इत्यादि शब्द
चोरोंकी तरह हमारे हरिमन्दिरके अन्तर्भागतक जा पहुंचे हैं ।
हिन्दुत्वके तीन लक्षण ७५
पुराने जखमोंके ये चिह्न हैं। जखम भरकर अच्छे हो गये पर
उनके ये चिह्न बाकी हैं और ऐसा मालूम होता है कि ये हमारे
शरीरके साथ ही रहेंगे। इन चिह्नोंको नखोंसे खरोचकर मिटानेकी
चेष्टा करनेमें जबतक हानिके सिवाय कोई लाभ नहीं, तबतक
जो कुछ कर सकते हैं वह यही है कि इनको सह लें; क्योंकि ये
चिह्न भी तो आखिर उसी रक्तरंजित रणभूमिमें लगे हुए जखमोंके
हैं जिसने हमींको जयमाल पहनायी थी।
फिर भी यदि कोई ऐसे शब्द हैं जो चाहे हमारे देव-
मन्दिरोंके नामोंसे भी कितने ही सम्बद्ध क्यों न हों पर जिन्हें
त्याग देने या बदल देनेकी जरूरत है तो वे शब्द ये ही हैं; क्योंकि
ये स्पष्ट ही विदेशी शब्द हैं और विदेशी प्रभुत्वके ही अवशेष
स्वरूप हैं। जो लोग इन नामोंको न केवल सह लेते बल्कि प्यार
करते हैं वे हिन्दु या हिन्दुस्थान नामको छोड़ देनेकी पुकार
मचायें, क्या यह कुछ अप्रामाणिकसी बात नहीं है?—वह नाम
जो हमारी जाति और देशका, हमारे पूर्व पुरुषों द्वारा रखा हुआ
नाम है, जो संसारके सबसे प्राचीन और सबसे पूज्य ग्रन्थ वेदोंमें
आया है—वह नाम जिसे सिन्धु नदीके दोनों ओर बसनेवाले
हमारे करोड़ों देश-भाई अधिक नहीं तो कमसे कम विगत ४०
शताब्दियोंसे धारण किये हुए हैं, जिस नाममें काश्मीरसे कन्या-
कुमारीतक और अटकसे कटकतक हमारे समग्र देशका अन्तर्भाव
होता है, जो नाम एक शब्दमें हमारी जाति और देशकी भौगो-
लिक स्थितिको प्रकट कर देता है, जो नाम अपनी विशिष्टता
७६ हिन्दुत्व
और श्रेष्ठताका दर्शक — "राष्ट्रमार्यस्यचोत्तमम्" का परिचायक
माना गया, उस नामको कोई कैसे छोड़ सकता है ? जिस नामके
लिये हमारे शत्रु हमारा तिरस्कार करते थे और जिसके लिये
हमारे शूरवीर योद्धा शालिवाहनसे शिवाजीतक महान्से महान्
पराक्रमी पुरुष शताब्दियोंतक लड़ते रहे, वह नाम यही है—
हिन्दु। यही हिन्दु नाम पद्मिनी और चित्तौड़ की अस्थियोंपर खुदा
था। यही हिन्दु नाम तुलसीदास, तुकाराम, रामकृष्ण और
रामदासने अपनाया था। हिन्दुपदपादशाहीका ध्यान ही तो
रामदासका ध्यान था, शिवाजीका यही व्रत था, बाजीराव और
बन्दा बहादुर, छत्रसाल और नानासाहेब, प्रताप और प्रतापा-
दित्यकी महत्त्वाकांक्षाओंका यही तो ध्रुव तारा था। यही नाम
उस झंडेपर अंकित था जिसकी रक्षामें एक दिनमें एक लाख
हिन्दू वीर, शत्रुओंको मारते हुए, पानीपतके मैदानमें खेत रहे और
उनके अग्र भागमें वीराग्रणी भाऊ भी हाथमें खड्ग लिये असि-
धारा तीर्थमें निमज्जित हुआ ! और इस बलिदानके पश्चात् भी,
इस बलिदानके फलस्वरूप नाना और महादजी इसी हिन्दूपद-
पादशाहीके लिये आंधी और तूफानकी कोई परवा न कर, चट्टानों
और आपदाओंको टालते हुए राष्ट्र-नौकाको उसके किनारेके
समीपतक खे ले गये थे। और आज भी यही "हिन्दू" और "हिंदु-
स्थान" नाम नेपालके राजसिंहासनसे राहके भिखारीकी झोली
तक करोड़ों मनुष्योंपर अपना प्रभुत्व चला रहा है। इस नामका
तिरस्कार करना अपनी जातिके हृदयको ही काटकर फेंक देना
हिन्दुत्वके तीन लक्षण ७७
है। ऐसा करनेके पूर्व ही तुम मर जाओगे। ऐसा करना केवल
प्राणान्तक ही नहीं बल्कि असाध्य साधन है। “हिन्दु” और
“हिन्दुस्थान” इन शब्दोंको उनके स्थानोंसे अलग करनेका ख्याल
हिमालयको ही उसके स्थानसे हटानेके समान है। भयानक और
कल्पनातीत उत्पात और उलटफेर करनेवाला कोई भीषण
भूकंप ही यह काम कर सकता है।
हिन्दु और हिन्दुस्थान इन नामोंपर जो यह मिथ्या आक्षेप
है कि ये नाम विदेशियोंके रखे हुए हैं, यदि यही एक बात हो
तो इसका समाधान निर्विवाद ऐतिहासिक प्रमाणोंसे ही अना-
यास हो सकता है। पर बात यह है कि इस आक्षेपके साथ कुछ
लोगोंके दिलमें एक गुप्त भय भी है। वे यह समझते हैं कि
यदि यह नाम हम अपनाते हैं तो यह समझा जायगा कि हम
उन सब बातोंको माननेवाले हैं जो “हिन्दू धर्म” के नामपर
प्रसिद्ध हैं। कोई इस भयको स्पष्ट रूपसे प्रकट करे या न करे,
पर इस भयसे बहुतसे लोग यह बात माननेको तैयार नहीं होते
कि यह नाम विदेशियोंका रखा हुआ नहीं है। यह भय बिल-
कुल निराधार है, यह बात भी नहीं। परन्तु जिन्हें इस प्रकारकी
आशंका होती है उन्हें वैसा स्पष्ट कहकर बतलाना चाहिये कि
अमुक कारणसे हम हिन्दू कहलानेको तैयार नहीं हैं—मिथ्या और
निराधार आक्षेपके बहाने वस्तुस्थितिको छिपाना कदापि उचित
नहीं। “हिन्दुत्व” और “हिन्दू धर्मसंप्रदाय (हिन्दुइज्म)” ये
दो शब्द आपाततः एक दूसरेके समान हैं और इससे अनेकोंका
७८ हिन्दुत्व
मतिभ्रम होता है। इन दो शब्दोंके अर्थमें जो अन्तर है वह आगे
स्पष्ट किया जायगा। यहां इतना ही बतला देना पर्याप्त होगा कि
यदि कोई शब्द विदेशियों द्वारा उत्पन्न किया हुआ हो तो वह
यही “हिन्दुइज्म” शब्द है और इसलिये इस बातसे सावधान
रहना चाहिये कि इस नवीन शब्दसे हमारे विचारोंमें कोई गड़बड़
न हो। कोई भी मनुष्य वेदोंका प्रामाण्य माने बिना भी हिन्दू हो
सकता है, यह इस बातसे बिलकुल स्पष्ट है कि और तो और
हमारे सहस्रों जैनो भाई परम्परासे अपने आपको हिन्दू कहते
चले आते हैं और उन्हें यदि कोई किसी भिन्न नामसे पुकारे तो
इसमें वे अपना अपमान समझेंगे। यह वस्तुस्थितिकी बात है
जो हमने सामने रख दी है। प्रस्तुत विषयकी मीमांसा अभी नहीं
की है जो आगे करेंगे। तबतक हम यह आशा करते हैं कि,
हमारे पाठक अपना मत किसी प्रकार पूर्वग्रहदूषित न कर लेंगे
और यह ध्यानमें रखेंगे कि यहातक जो चर्चा की गयी उसमें
किसी धर्म-संप्रदायका विचार नहीं किया है बल्कि हिन्दुत्वका
ही राष्ट्रीय, जातीय और सांस्कृतिक पहलूसे विचार किया है।
अब हम उस समन्वयसाधक कल्पनाका विश्लेषण कर सकते
हैं जो कल्पना मानवी भाषाको ज्ञात कल्पनाओंमें एक अत्यंत
व्यापक कल्पना है और जिसकी समन्वयशक्ति बड़ी ही विचित्र
है। हिन्दुत्व शब्द हिन्दु शब्दसे बना है। यह हम देख चुके कि
हमारी जातिके अत्यन्त प्राचीन और अत्यंत पुनीत ग्रन्थोंमें सप्त-
सिन्धु या हप्तहिन्दु नाम उस देशका है जिसमें वैदिक राष्ट्रकी
हिन्दुत्वके तीन लक्षण ,७६
वृद्धि हुई। हिन्दू और हिन्दुस्थान इन नामोंका यह दैशिक अर्थ इन
नामोंके साथ यदि अधिक नहीं तो कमसे कम ५००० वर्ष से
बराबर चला आ रहा है और “हिन्दुस्थान” शब्दसे सिन्धु नदीसे
सिन्धु (समुद्र) पर्यन्तके समग्र देशका बोध होता रहा है। किसी
जातिके लोगोंमें परस्पराकर्षण, सामर्थ्य और ऐक्यभाव होनेके
लिये जो सबसे बड़ी बात जरूरी होती है वह यही है कि उनका
ऐसा वासस्थान हो जो अन्दरसे सुसम्बद्ध और बाहर सीमा-
बद्ध हो, और उस वासस्थानका ऐसा नाम हो जिसका उच्चा-
रण करते ही मातृभूमिकी दिव्य मूर्त्ति और पूर्व पुरुषोंकी गौरव-
मय परम्परा एक साथ नेत्रोंके सामने खड़ी हो जाय। किसी
शक्तिशाली और एकीभूत राष्ट्रके लिये ये जो दो आवश्यकताएं
होती हैं, सौभाग्यसे ये दोनों हमें प्राप्त हैं। हमारा देश इतना
विशाल होनेपर भी ऐसा सुसंघटित है, दूसरे देशोंसे उसका
पार्थक्य इतना सुस्पष्ट है और साथ ही इतनी शक्तिके साथ सुर-
क्षित है कि संसारमें कोई ऐसा देश प्रकृति देवीने नहीं निर्माण
किया जिसकी दैशिक एकता इससे अधिक स्पष्ट और अखण्ड
हो। इसका नाम 'हिन्दुस्थान' या 'हिन्दू' भी वैसा ही है। इस
नामको लेते ही हमारे नेत्रोंके सामने अपनी मातृ-भूमिकी प्रतिमा-
खड़ी हो जाती है और यह नाम उसके सब दैशिक और प्राकृतिक
रूप सामने उपस्थित कर उसे एक जीती-जागती प्रतिमा बना
देता है। हिन्दुस्थानका अर्थ हिन्दुओंका देश होनेसे हिन्दुत्वका
प्रथम मूलतत्व यही दैशिक होना चाहिये। कोई हिन्दू तभी हिन्दू
८०, हिन्दुत्व
हो सकता है जब वह स्वयं या अपने हिन्दुस्थानवासी पूर्वजोंके
उत्तराधिकारी होनेके नाते, हिन्दुस्थानका नागरिक हो और इस
देशको अपनी मातृभूमि समझता हो । फ्रांस, अमेरिका आदि
देशोंमें हिन्दू शब्द ठीक इसी अर्थसे व्यवहृत होता है। उसमें
धार्मिक या सांस्कृतिक अर्थकी ध्वनि नहीं होती और सिन्धु
शब्दसे निकले हुए अन्य शब्दोंकी तरह यदि यह "हिन्दू" अपने मूल
अर्थका ही वाचक रहने दिया जाता, उसमें और कोई नवीन
अर्थ न आने दिया जाता तो हिन्दू शब्दका एकमात्र अर्थ हिंदु-
स्थानका नागरिक ही होता और कुछ नहीं, जैसा कि गुजरात
और महाराष्ट्रमें "हिंदी" शब्दका अर्थ है ।
परन्तु हम यहां जो अनुसन्धान कर रहे हैं वह इस बातका
नहीं कि किस शब्दका क्या अर्थ होता या होना चाहिये था बल्कि
इस बातका अनुसन्धान कर रहे हैं कि वस्तुस्थिति क्या है । क्या
होना चाहिये, इसका विचार करनेमें कोई अनौचित्य हो यह बात
नहीं, बल्कि यह समझिये कि इसका विचार करना भी अत्यन्त
आवश्यक है, उपस्थित विषयसे भी अधिक उत्साहप्रद है; परन्तु
उसके लिये पहले यह जानना होगा कि अभी क्या है। अभी क्या
है, यह अच्छी तरह जाननेसे आगे क्या होना चाहिये इसका
विचार किया जा सकता है। इसलिये बड़ी सावधानीके साथ
ही हमें "हिन्दुत्व क्या है" यह समझनेके लिये इस बातकी जांच
करनी होगी कि इस शब्दमें क्या क्या भाव भरे हुए हैं। इसलिये
यद्यपि हिन्दू शब्दका मूल अर्थ "हिन्दो" के समान "हिन्दुस्थानी"
[Header] हिन्दुत्वके तीन लक्षण ८१
ी है, तौभी यदि हम किसी हिन्दुस्थानवासी मुसलमानको हिन्दू
हेंगे तो इस शब्दके प्रयोगकी व्याप्ति इतनी खिंच जाती है कि
ह वहीं टूट जाती है, अर्थका अनर्थ हो जाता है। यह हो सकता
ै कि भविष्यत्में कोई ऐसा समय आ जाय जब हिन्दू शब्दका
अर्थ केवल हिन्दुस्थानी या हिन्दुस्थानवासी ही रह जाय। पर
ह दिन तभी उदय होगा जब सांप्रदायिक अहङ्कारकी परापहारी
ौतानी सेना नष्ट भ्रष्ट हो जाय और संप्रदायधर्म उन सनातन
सेद्धान्तोंके अधीन होकर रहें जो सबके समान रूपसे आधार-
भूत सिद्धान्त हैं, जिनकी बुनियादपर ही मनुष्य-समाज सुस्थिर
ह सकता है। परन्तु जबतक इस परम वांछनीय, सर्वसमाज-
सुख-साधक एकीकरणके प्रथम किरणोंका भी क्षितिजपर कोई
चेह्न नहीं दिखायी देता तबतक वस्तुस्थिति जो जैसी है उसकी
उपेक्षा करना केवल मूर्खता है। जबतक और दूसरे धर्म-संप्र-
दाय अपने ऐसे मतोंको नहीं छोड़ देते जिनके कारण बार बार
युद्ध होनेकी नौबत आती है तबतक कोई सांस्कृतिक या राष्ट्रीय
संघ अपने बन्धनोंको-खासकर उन बन्धनोंको जिनसे संघकी
अखण्डता और सामर्थ्य बढ़ती है—कभी ढीले नहीं कर सकता।
कोई अमेरिकन भी भारतका नागरिक बन सकता है। यदि वह
यथार्थमें भारतीय नागरिक बने तो उसे हम भारतीय या हिन्दु-
स्थानी कह सकते हैं, अपना देशवासी मानकर उसके साथ वैसा ही
व्यवहार कर सकते हैं। परन्तु हमारे देशको अपनानेके साथ साथ
जबतक वह हमारी संस्कृति और इतिहासको भी नहीं अपनाता,
६
८२ हिन्दुत्व
जबतक उसके शरीरमें हमारा रक्त नहीं प्रवाहित होता और जबतक
हमारा देश उसे प्यारा ही नहीं बल्कि पूज्य नहीं होता तबतक हम
उसे हिन्दू-संघमें शामिल नहीं कर सकते । कारण, हिन्दुत्वकी
पहली बात यद्यपि यही है कि वह स्वयं और अपने पूर्वपुरुषोंके
उत्तराधिकारसे इस देशका नागरिक हो तौभी केवल यही एक
बात नहीं है जिससे कोई भी मनुष्य हिन्दू बन जा सके। हिन्दू
नाममें उसके दैशिक अर्थकी अपेक्षा और भी बहुतसा अर्थ भरा
हुआ है।
“हिन्दू” शब्द “भारतवासी” या “हिन्दुस्थानी” शब्दोंका
समानार्थक नहीं है और इसका अर्थ केवल “हिन्दुस्थानका रहने-
वाला” नहीं है यह बात जब निश्चित हुई तब स्वभावतः हिन्दुत्वके
दूसरे लक्षणका विचार यहांसे आरम्भ होता है। हिन्दू हिन्दुस्थान
शासनके केवल नागरिक नहीं हैं, क्योंकि उनका जो संघटन है
वह केवल इस बातपर नहीं है कि सब एक ही मातृभूमिको प्यार
करते हैं; बल्कि उनमें परस्पर रक्त-सम्बन्ध भी है। हिन्दू केवल
एक राष्ट्र नहीं हैं, बल्कि एक जाति भी हैं। “जाति” शब्द “जा
धातुसे निकलकर (जिसका अर्थ जनना है), भ्रातृ-संघ, एक ही
बीजसे निकली हुई जाति जिसमें एक ही रक्त प्रवाहित हो रहा है
इस अर्थका वाचक होता है। सब हिन्दुओंकी नसोंमें उसी बल-
शाली जातिका रक्त दौड़ रहा है जो वैदिक ऋषियोंसे, सिन्धुओंसे
उत्पन्न हुई है। अनेक बार छलसे यह प्रश्न किया जाता है
कि, “क्या आप लोग भी कोई एक जाति हैं? क्या यह कहा जा
हिन्दुत्वके तीन लक्षण ८३
सकता है कि आप लोगोंमें एक ही रक्त प्रवाहित हो रहा है?" इस
प्रश्नका उत्तर हम यह प्रतिप्रश्न करके ही दे सकते हैं कि, "क्या
अंग्रेज एक जाति हैं ? आंग्ल रक्त, फ्रेंच रक्त, जर्मन रक्त या
चोनो रक्त नामकी भी कोई चीज दुनियामें है ?" जो लोग दूसरी
दूसरी जातियोंसे विवाह-सम्बन्ध करके दूसरी जातियोंका रक्त
अपने अन्दर ले आते हैं वे क्या कभी एक रक्त होनेका दावा कर
सकते हैं और एक जाति कहला सकते हैं? यदि वे ऐसा कर
सकते हैं तो हिन्दू तो सिर ऊंचा करके और भी जोरके साथ ऐसा
कह सकते हैं । कारण, जिस जाति-भेदका यथार्थ स्वरूप आप
लोगोंने अभीतक नहीं समझा, जिसका वास्तविक अर्थ अभी-
तक आप लोगोंकी समझमें नहीं आया, उस जाति-भेदसे आप
लोग कहते हैं कि हिन्दू-जातिमें अलग अलग रक्त-प्रवाह जहांके
तहां ही रुके रहे, उनका परस्पर मिश्रण नहीं हुआ; परन्तु आपके
ध्यानमें यह बात नहीं आती कि उस जाति-भेदने अपने रक्तकी
अपेक्षा दूसरोंका रक्त हमारे अन्दर न आने देनेका ही अधिक
काम किया है। यही नहीं, बल्कि इन अलग अलग जातियोंके
अस्तित्वसे ही क्या यह बात सिद्ध नहीं होती कि ब्राह्मणसे
चांडालतक संपूर्ण हिन्दू जातिमें एक ही रक्त प्रवाहित हो रहा
है ? सरसरी निगाहसे भी अपनी किसी भी स्मृतिका अवलोकन
करनेसे यह मालूम हो जाता है कि किसी समय अनुलोम और
प्रतिलोम विवाह हुआ करते थे और उन्हींसे आज जो इतनी
जातियां दिखायी देती हैं, उत्पन्न हुई हैं। यदि किसी शूद्रा
८४ हिन्दुत्व
स्त्रीसे किसी क्षत्रिय पुरुषके सन्तान हो तो वह सन्तति "उग्र"
जातिकी होती है। उसी प्रकार यदि किसी उग्रा स्त्रीसे क्षत्रियके
पुत्र हो तो वह श्वपच जातिका होता है। ब्राह्मणी माता और शूद्र
पितासे उत्पन्न पुत्र चांडाल होता है। सत्यकाम जाबालिकी
वैदिक कथासे महादजी शिन्देतक हमारे इतिहासका प्रत्येक पृष्ठ
यही बतलाता है कि हमारे रक्तकी गङ्गा कालके उच्चातिउच्च
वैदिक शिखरसे निकलकर आधुनिक इतिहासके मैदानमें बरा-
बरसे प्रवाहित होती चली आ रही है और इस प्रकार प्रवाहित
होनेमें उसने अन्य अनेक प्रवाहोंको अपने अन्दर मिला लिया है,
कितने ही पतितोंको पावन किया है; विस्तार, गांभीर्य और सम्प-
न्नतासे प्रतिदिन बढ़ती हुई इस गङ्गाने किसी जङ्गल या मरुभूमि-
में लुप्त हो जानेके भयको पार किया है और इस प्रकार पहलेसे
अधिक शुद्धता और अधिक वेगके साथ आज वह अखण्डरूपसे
बह रही है। अपने अन्दर जो जो कुछ ऊसर और दरिद्र था उसे
उपजाऊ और समृद्ध बनानेके लिये और अपने अन्दर जो जो कुछ
उत्पादक और सम्पन्नकारक था उसकी वृद्धि जारी रखनेके
लिये जो जो साधन हमारे उदात्तचरित और देशभक्त पूर्वजोंको
आवश्यक प्रतीत हुए उन उन साधनोंसे इस पावन प्रवाहका
मार्ग उन्होंने जातिभेद संस्थासे प्रशस्त किया था। जातिभेद
संस्थाके द्वारा यही काम हुआ है।
यह बात केवल चातुर्वर्ण्यके चार प्रधान वर्णोंके संमिश्र
विवाहोंसे उत्पन्न उपजातियोंके सम्बन्धमें या इन [मुख्य] जातियों
हिन्दुत्वके तीन लक्षण ८५
और इन उपजातियोंके परस्पर सम्बन्धसे उत्पन्न हुई सन्ततिके
ही सम्बन्धमें नहीं है, बल्कि अति प्राचीन कालमें गिरोह बनाकर
सबसे अलग पृथक् पृथक् रहनेवाली "जङ्गली" जातियोंके सम्बन्धमें
भी यही बात है। इसका दृष्टांत यदि देखना हो तो मलाबार या
नेपालमें देखिये। वहां उच्चकुलके हिन्दुओंको अन्य याने हिंद्वेतर
जातियोंकी कन्याओंसे विवाह करनेकी अनुज्ञा है। ये जातियां
आर्येतर हैं यह कल्पना ठीक भी हो तौभी इन जातियोंने हिन्दू-
संस्कृतिकी रक्षा करनेमें जो प्रेम और पराक्रम दिखाया उससे वे
हिन्दू-जातिमें मिला ली गयीं, यही नहीं, बल्कि सब बन्धनोंमें जो
सबसे कोमल बन्धन है उस विवाह-बन्धनसे उन्हें सदाके लिये
हिन्दू-जातिसे बांध रखा है। नागवंश क्या द्राविड़ वंश है ? नहीं,
फिर भी जब अग्निवंशके पुरुषोंको नागकन्याएं अर्पण की गयीं
और इन दोनों वंशोंमें जब चन्द्रवंश और सूर्यवंशके क्षत्रियोंने
अपनी कन्याओंको ब्याह दिया तब इनमें उनमें भेद ही क्या
रहा ? बौद्धोंके समयमें जब चातुर्वर्ण्य और जाति-भेदके बन्धन
टूट चुके थे तबकी बात ही जाने दीजिये। पर इधर हर्षवर्धन-
तक भी वही बात थी-परस्पर विवाह बराबर हुआ करते थे।
पांडवोंके ही कुलका दृष्टान्त लीजिये। पराशर ऋषि ब्राह्मण
थे। एक धीवरकी रूपवती कन्यापर वे मुग्ध हुए और इन्हींकी
सन्तान जगद्विख्यात कृष्णद्वैपायन भगवान वेदव्यास हुए। इन
व्यास भगवानने क्षत्रिय कुलकी राजकन्या अंबा और अंबालिकासे
दो पुत्र उत्पन्न किये। इन दो पुत्रोंमेंसे पांडने "नियोग" पद्धतिका
८६ हिन्दुत्व
अवलम्बन कर सन्तान जननेकी अनुमति अपनी स्त्रियोंको दी।
और उन स्त्रियोंने अज्ञात जातिके पुरुषोंके प्रेमकी याचना करके
महाभारतके नायकोंको उत्पन्न किया। इसी प्रकार उस कालके
कर्ण, बभ्रुवाहन, घटोत्कच, विदुर तथा अन्य व्यक्तियोंके इति-
हासका उल्लेख न करके उससे बहुत इधर आधुनिक कालके
चंद्रगुप्तका ही उदाहरण देखनेके लिये हम अपने पाठकोंसे कहते
हैं। चंद्रगुप्तने एक ब्राह्मणकन्यासे विवाह किया और इनसे
अशोकके पिताकी उत्पत्ति हुई। और इस अशोकने युवराज रहते
एक वैश्यकन्यासे विवाह किया। हर्ष वैश्य था और उसने
अपनी कन्या एक क्षत्रिय राजपुत्रको ब्याह दी। व्याधकर्मा एक
व्याधका पुत्र था और उसकी माता उस व्याधकी सहधर्मिणी एक
विप्रकन्या थी। और यह व्याधकर्मा विक्रमादित्यका यज्ञाचार्य
हुआ था। कृष्ण भट्ट ब्राह्मण होकर भी एक चांडालकन्यापर
इतना मोहित हुआ कि उसने खुल्लमखुल्ला उससे विवाह किया।
इसने फिर "मातंगी पन्थ" नामका एक धर्म-सम्प्रदाय चलाया।
ये सब लोग हिन्दू ही कहलाते थे और आज भी उन्हें कोई अहिन्दु
नहीं कहता। उन्हें हिन्दू कहलानेका अधिकार भी है। पर बात
यहीं खतम नहीं होती। यह भी हो सकता है कि कोई स्त्री या
पुरुष अपने अच्छे-बुरे कर्मसे एक जातिसे उन्नत या च्युत होकर
दूसरी जातिमें मिल सकते हैं। "शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति
शूद्रताम्।” "न कुलं कुलमित्याहुराचारं कुलमुच्यते। आचार
कुशलो राजन् इह चामुत्र नंदते ॥ उपासते ये न पूर्वा द्विजा संध्यां
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न पश्चिमाम् । सर्वांस्तान् धार्मिको राजा शूद्रकर्मणि योजयेत् ॥" यह
केवल धमकी ही नहीं थी—ऐसा होता भी था । बहुतसे क्षत्रिय
कृषिकर्म या अन्य व्यवसाय करने लगे, इससे क्षत्रियके पदसे च्युत
हो गये और अन्य जातियोंके बने । इसी प्रकार बहुतसे वीर पुरुष
और कभी कभी तो समस्त जातिके सब मनुष्य अपने शौर्य और
पराक्रमसे क्षत्रिय पदको प्राप्त होकर क्षत्रिय कहलाने लगे। एक
जातिसे बहिष्कृत होकर दूसरी जातिमें मिल जाना, यह बात तो
एक मामूली बात हो गयी थी।
वैदिक आज्ञासे स्थापित चातुर्वर्ण्यके माननेवालोंकी ही नहीं,
बल्कि हिन्दू-जातिके अवैदिक संप्रदायोंकी भी यही बात है। जैसे
बौद्धकालमें यह बात थी कि एक ही घरमें पिता यदि बौद्ध हैं
तो माता वैदिक हैं और पुत्र जैन हैं; वैसे ही आज भी गुजरातमें
जैनों और वैष्णवोंमें परस्पर शादी ब्याह होता है, मारवाड़ और
राजपूतानेमें भी होता है और पंजाब और सिन्धमें सिख और
सनातनियोंमें भी परस्पर ऐसा ही संबंध है। इसके अतिरिक्त
आज जो मानभाव या लिंगायत या सिख या सतनामी हैं वे कल
हिन्दू थे और आजके कोई हिन्दू कल ब्राह्मो, लिंगायत या सिख हो
सकते हैं। पर जातिकी एकता और अखंडता वैसी ही बनी
हुई है।
इस जातीय एकताकी पूर्ण अभिव्यक्ति करनेवाला कोई ऐसा
दूसरा शब्द नहीं है जैसा कि हिन्दू है। हम लोगोंमेंसे कोई आर्य
थे और कोई अनार्य । पर कोई आयर हो या नायर, थे सब हिन्दू