हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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मतिभ्रम होता है। इन दो शब्दोंके अर्थमें जो अन्तर है वह आगे
स्पष्ट किया जायगा। यहां इतना ही बतला देना पर्याप्त होगा कि
यदि कोई शब्द विदेशियों द्वारा उत्पन्न किया हुआ हो तो वह
यही “हिन्दुइज्म” शब्द है और इसलिये इस बातसे सावधान
रहना चाहिये कि इस नवीन शब्दसे हमारे विचारोंमें कोई गड़बड़
न हो। कोई भी मनुष्य वेदोंका प्रामाण्य माने बिना भी हिन्दू हो
सकता है, यह इस बातसे बिलकुल स्पष्ट है कि और तो और
हमारे सहस्रों जैनो भाई परम्परासे अपने आपको हिन्दू कहते
चले आते हैं और उन्हें यदि कोई किसी भिन्न नामसे पुकारे तो
इसमें वे अपना अपमान समझेंगे। यह वस्तुस्थितिकी बात है
जो हमने सामने रख दी है। प्रस्तुत विषयकी मीमांसा अभी नहीं
की है जो आगे करेंगे। तबतक हम यह आशा करते हैं कि,
हमारे पाठक अपना मत किसी प्रकार पूर्वग्रहदूषित न कर लेंगे
और यह ध्यानमें रखेंगे कि यहातक जो चर्चा की गयी उसमें
किसी धर्म-संप्रदायका विचार नहीं किया है बल्कि हिन्दुत्वका
ही राष्ट्रीय, जातीय और सांस्कृतिक पहलूसे विचार किया है।
अब हम उस समन्वयसाधक कल्पनाका विश्लेषण कर सकते
हैं जो कल्पना मानवी भाषाको ज्ञात कल्पनाओंमें एक अत्यंत
व्यापक कल्पना है और जिसकी समन्वयशक्ति बड़ी ही विचित्र
है। हिन्दुत्व शब्द हिन्दु शब्दसे बना है। यह हम देख चुके कि
हमारी जातिके अत्यन्त प्राचीन और अत्यंत पुनीत ग्रन्थोंमें सप्त-
सिन्धु या हप्तहिन्दु नाम उस देशका है जिसमें वैदिक राष्ट्रकी