हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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रहनेसे लाभ ही क्या ! तब मैंने कहा, “जब एक व्यक्तिको नाम
बदलना इतना कठिन है, यही नहीं बल्कि हानिकारक है, तब भला
एक समग्र जातिका नाम—वह नाम जो विदेशी नहीं बल्कि उतना
ही स्वदेशी है जितने कि हमारे वेद हैं—बदलना कितना कठिन
और कितना अधिक हानिकारक होगा, जरा सोचो ।” कोई ऐसा
नाम, जिसकी जड़ पातालमें पहुँची हो, बदलनेका प्रयत्न करना
कितना व्यर्थ है, इसका इस वैयक्तिक वृत्तान्तसे भी अधिक अच्छा
दृष्टान्त हमें पंजाबके हमारे खालसा पन्थमें मिलता है । यह वह
पन्थ है जिसे हिन्दु जातिका सिरमौर और सूरमा कहना चाहिये,
जिसे हमारे श्रेष्ठ गुरुने चुनकर तैयार किया और विजयानंदसे
गर्जना की कि, “नील वस्त्रके कपड़े फाडे तुरक पाणी अमल
गया ।” और जो पंथ संघटित करनेका कारण भी यही था कि,
“धर्म चलावन संत उबारण, दुष्ट दैत्यके मूल उपाटण, यहि काज
धरामैं जननम् । समझ लेहु साधुसम मननम् ॥ ( परित्राणाय
साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि
युगे युगे ॥) । योद्धाओंके उस दलका नाम “खालसा” रखा
गया । जिन महात्मा नानकका आज नित्य “वाह गुरुको फतेह,
वाह गुरु खालसा” कहकर साभिनन्दन वन्दन किया जाता है,
वे गुरु नानक दुःखसे कहा करते थे कि, “क्षत्रियां हि धर्म
छोडिया म्लेच्छ भाषा गहि । सृष्टि सब इक वर्ण हुई, धर्मकी
गति रही !” “दरबार”, “दीवान”, “बहादुर” इत्यादि शब्द
चोरोंकी तरह हमारे हरिमन्दिरके अन्तर्भागतक जा पहुंचे हैं ।