हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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जबतक उसके शरीरमें हमारा रक्त नहीं प्रवाहित होता और जबतक
हमारा देश उसे प्यारा ही नहीं बल्कि पूज्य नहीं होता तबतक हम
उसे हिन्दू-संघमें शामिल नहीं कर सकते । कारण, हिन्दुत्वकी
पहली बात यद्यपि यही है कि वह स्वयं और अपने पूर्वपुरुषोंके
उत्तराधिकारसे इस देशका नागरिक हो तौभी केवल यही एक
बात नहीं है जिससे कोई भी मनुष्य हिन्दू बन जा सके। हिन्दू
नाममें उसके दैशिक अर्थकी अपेक्षा और भी बहुतसा अर्थ भरा
हुआ है।
“हिन्दू” शब्द “भारतवासी” या “हिन्दुस्थानी” शब्दोंका
समानार्थक नहीं है और इसका अर्थ केवल “हिन्दुस्थानका रहने-
वाला” नहीं है यह बात जब निश्चित हुई तब स्वभावतः हिन्दुत्वके
दूसरे लक्षणका विचार यहांसे आरम्भ होता है। हिन्दू हिन्दुस्थान
शासनके केवल नागरिक नहीं हैं, क्योंकि उनका जो संघटन है
वह केवल इस बातपर नहीं है कि सब एक ही मातृभूमिको प्यार
करते हैं; बल्कि उनमें परस्पर रक्त-सम्बन्ध भी है। हिन्दू केवल
एक राष्ट्र नहीं हैं, बल्कि एक जाति भी हैं। “जाति” शब्द “जा
धातुसे निकलकर (जिसका अर्थ जनना है), भ्रातृ-संघ, एक ही
बीजसे निकली हुई जाति जिसमें एक ही रक्त प्रवाहित हो रहा है
इस अर्थका वाचक होता है। सब हिन्दुओंकी नसोंमें उसी बल-
शाली जातिका रक्त दौड़ रहा है जो वैदिक ऋषियोंसे, सिन्धुओंसे
उत्पन्न हुई है। अनेक बार छलसे यह प्रश्न किया जाता है
कि, “क्या आप लोग भी कोई एक जाति हैं? क्या यह कहा जा