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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

१०४ / घट रामायण
पंचम सुन का भेद बताउँ। पूरन ब्रह्म जीव तेहि नाऊँ॥
ता को आतम बेद बखाना। जीव नाम आतम कर जाना॥
षटवीं सुनि मन तन के माईं। इन्द्री संग तास लिपटाई॥
परमहंस तेहि ब्रह्म बतावैं। नेतहि नेत बेद गोहरावै॥
सुन तेहि मन कौ ब्रह्म बखाना। ता को नाम निरंजन जाना॥
येही निरंजन जोति कहाई। ब्रह्मा बिस्नू सिव सुत है ताही॥
तिन पुनि रचा पिंड ब्रह्मांडा। सातौ दीप और नौखंडा॥
जोति निरंजन इनको जानी। ता को संतन काल बखानी॥
यह जम काल जाल जग डारा। ज्यों धीमर मछरी गहि मारा॥
दस औतार निरंजन काला। बाँधे जीव कर्म जग जाला॥
तीरथ बरत नेम अरु धरमा। कर्म भाव कहियत है रामा॥
ता की जगत जपै मन लाई। बार बार भरमै भव माहीं॥
जग सब अंद फंद नहिं बूझै। अंधा भया हिये नहिं सूझै॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैं उन सन्त चरणों की बलिहारी जाता हूँ-जो सुरति समाधि को
सम्हाल कर अगम पर्वत पर चढ़े हैं। उन्होंने उसे देख-देख कर जैसे-जैसे भेदों को बताया है, साखी एवं
'सबद' द्वारा इस ग्रंथ में गाया है॥ (यहाँ साखी का अर्थ सन्तों का साक्ष्य सब शब्द का अर्थ सन्तों का
वर्णन है, मेरा अपना कुछ नहीं है॥)
मैं भी उनके चरणों में लगकर और देखकर वर्णन किया है जैसे सन्तों की कृपा होती गई, रहस्य
खुलता गया। मेरी मति सन्त चरणों की दासी बन गई। मति ने ही उसी भाँति लिखकर शान्ति प्राप्त की॥
मैं उन सन्तों के चरणों की बलिहारी जाता हूँ-जिन्होंने मुझ जैसे अज्ञानी को ज्ञानी बनाकर प्रभु के
प्रति संसक्त बनाया। बाईस रूपों के शून्य का वर्णन करके जिन्होंने खुले नेत्रों से सुरति समाधि में देखा॥
और मैं शून्य के विषय में क्या कहूँ, किसी-किसी सन्त ने उसे अपनी सुरति समाधि में देखा है।
तुलसी साहब कहते हैं-जो मुझे कभी अबूझ थी, सन्तों की कृपा से उसे समझा। यह सन्तों की ही कृपा
थी कि उन्हें भी कभी दुर्नाम शिखर पर वह प्रतीत हुई होगी॥
सन्तों ने जिसे आँखों से देखकर बताया है, मैं अपनी उस गति का कैसे-कैसे वर्णन करूँ? मैं उन
सन्तों का सेवक तथा दास हूँ जिन्होंने अपनी प्रज्ञा से उस अगम तमाशे को देखा है॥
किस शून्य में किसका निवास है, उनके मदों को मैंने प्रगट रूप से कहा है। प्रथम शून्य में निःनामी
है-जिसका ज्ञान तथा जिसकी थाह सन्त ही जानते हैं॥
मैं दूसरे शून्य का वर्णन बता रहा हूँ जहाँ 'सत्य नाम' का अस्तित्व है। तीसरा शून्य एक शब्द मात्र
है-जहाँ कोई-कोई सन्त सुरति समाधि में विलीन रहते हैं॥
मैं चौथे शून्य को समझाकर कहता हूँ-जहाँ पार ब्रह्म समाया रहता है। सन्तगण उसे ही परमात्मा
कहते हैं-जिसको वे हृदय की आंख से देखते हैं॥
मैं पंचम शून्य का भेद बता रहा हूँ। उसका नाम पूर्णब्रह्म जीव है। वेदों ने उसे आत्मा तत्त्व कहा है-
और जीव का नाम ही आत्मा है॥
छठें शून्य के विषय में सुनो, वह मन तथा तन में निरन्तर है। उसी के साथ सम्पूर्ण इन्द्रियाँ संसक्त
हैं-परमहंस साधुगण उसे ही ब्रह्म कहते हैं और वेदादि उसे नेति नेति (जिसक अन्त नहीं है) कह कर
बुलाते रहते हैं॥