घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ / घट रामायण
४. अजसार " १५. खलक "
५. बिलंद " १६. झलक "
६. सुखनंद " १७. सरवाट "
७. अछरंद " १८. दसघाट "
८. सबसंध " १९. खिरकाट "
९. ब्रह्मांड " २०. अजआठ "
१०. सबअंड ब्रह्मांड " २१. सतलोक "
११. भौंभंड " २२. परमोख "
॥ सोरठा ॥
बाइस सुन बर्तमान, जानि संत कोइ परखिहै।
गगन गगन परमान, सुन्न सुन्न भिनि भिनि लखै॥
अर्थ-इस बर्तमान बाईस शून्यों को समझ कर कोई सन्त परखेगा। शून्य के लिए आकाश ही प्रमाण
है और उसमें भिन्न-भिन्न रूपों में शून्य दिखाई पड़ता है॥
॥ चौपाई ॥
सुन्न बाइस कौ भाखौं लेखा। सो कोइ साधू करै बिबेका॥
भिन्न भिन्न ग्रंथन में गाई। बूझै वोही भेद जिन पाई॥
सुन्न सुन्न निज निरनै भाखा। तुलसी निरखि देखि निज आँखा॥
अर्थ-मैंने बाईस शून्य के सन्दर्भों का वर्णन किया-उसका कोई साधु ही विवेकपूर्वक उल्लेख
करेगा। यद्यपि भिन्न-भिन्न ग्रंथों में शून्य का गान किया गया है किन्तु उसे वही समझेगा-जिसने उसको
प्राप्त कर लिया है। मैंने शून्य का निर्णय कहा है-अपनी इस आँखों से भलीभाँति निरख करके॥
॥ सोरठा ॥
कह निरनै निरधार, सुन्न सुन्न बिधि यों कही।
सुरति उतर गई पार, सुन्न बाइस वर भाखिया॥
अर्थ-शून्य की शून्य विधि को इस प्रकार से निर्धारित करके मैंने बताया है। इस बाईस शून्य का
वर्णन सुनकर सुरति समाधि उस पार उतर गई अर्थात् उसने मुक्ति का अनुभव किया॥
॥ चौपाई ॥
बाइस सुन का कहौं बखाना। सुन्न सुन्न का ठौर ठिकाना॥
जो जेहि सुन्न जौन अस्थाना। भाखौं जोई सुन्न जेहि नामा॥
सत्तलोक सत के तहँ राजा। रामायन में भाख समाजा॥
सत्त केत सत नाम कहइया। ता से निरगुन ब्रह्म जो भइया॥
सोला निरगुन कहि कै भाखा। भिनि भिनि भेद कहौं मैं ताका॥
एक सुन्न इक निरगुन होई। निरगुन सुन्न एक है सोई॥
निरगुन चौधा चौधा सुन्नी। पद्मा धर्म सुन्न है भिन्नी॥
सोला सुन्न निरंजन नामा। रचा ताहि ब्रह्मांड समाना॥