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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

१०० / घट रामायण
आली अगम की साख, आँख हिये की खुली॥८॥
सुन अठरा के माहि, जाइ निर्ख देखिया।
आतम से परे भिन्न, परमातम पेखिया॥९॥
सुन्न उलट उन्नीस, चेति आगे चली।
खिरकी अजब अनूप, पुरुष ता में मिली॥१०॥
परे पुरुष पद चीन्ह, गई सुन बीस में।
सत्त पुरुष सुख धाम, सुन्न इक्कीस में॥११॥
गैब नगर पिय पार, सखी सतलोक ही।
चढ़ी अगमपुर धाइ, पाइ पति पै गई॥१२॥
सत्त पुरुष की पैज, सेज पति की लई।
गई भवन के माहिं, पाइ जस जो कही॥१३॥
बाइस सुन बर्तमान, जान कोइ लेइँगे।
कीनी जिन जिन सैल, संत सोइ कहिँगे॥१४॥
तुलसी निज तन तूल, मूल मन में बसी।
जिन बूझा नहिं भेद, बेद भौ में फँसी॥१५॥
अर्थ-हे सखी-सुन लो, सुन लो, मैं अपने पति (ब्रह्म) की वाणी एवं नेत्र भंगिमाओं के विषय
बताती है। वह बड़ी ही मधुरवाणी बोलता है और उसकी वियोग पीड़ा चित्त में सहती रहती हूँ॥१॥
क्षण-क्षण में प्रिय के पास रहती हूँ, अन्यत्र कहीं मेरी श्वासवृत्ति ही नहीं रुकती और मन के बीच
में होते हुए उसके लिए ऐसे तड़पती रहती हूँ-जैसे जल के बिना मछली॥२॥
हे सखी! सुनो, मेरे चित्त की शांति, चितवन एवं आत्मीय भाववृत्ति सभी को उनसे जुड़कर मिल
गई हूँ और अब तो मैं प्रिय के पास ही चल पड़ी, अतः इस शरीर एवं मन की आशा की छूट चली
है॥३॥
चौंधे भवन (संधि) को पार करके मैं मूल तत्त्व शून्य में जा पहुँची और पन्द्रहवें शून्य के उस पार
सोलहवें में आ गई॥४॥
इस सोलहवें शून्य के मध्य मैं श्रुति के द्वारा उसका आनन्द चखा और मैंने इसी हृदय में ही ज्योति
को निराकार होते देखा॥५॥
सत्तहवें शून्य में सुरति साधना के द्वारा चलकर मैंने उस सरोवर तट को जाकर देखा, यह मान
सरोवर का और वहाँ मैंने हंस (निर्मल आत्मा) को देखा॥६॥
अत्यन्त जेतवान एवं छविवान एक हंस करोड़ों सूर्य की भाँति शोभित था। उस स्थल का सौन्दर्य
अद्वितीय था और वह हंस वहीं विराजमान था॥७॥
मैं हंसों के साथ क्रीड़ा करके पर्वत शिखर के आगे चल पड़ी-हे सखी! उस अगम के साक्ष्य से
हृदय की आँखें खुल गई॥८॥
उस अट्ठारहवें शून्य के मध्य जाकर भलीभाँति देखा तो मुझे वहाँ आत्मा से भिन्न परमात्मा दिखलाई
पड़ा॥९॥
मैं उस अट्ठारहवें शून्य को उलटकर उन्नीसवें की ओर चली। वहाँ एक अनुपम एवं आश्चर्यजनक
खिड़की दिखाई पड़ी, जिसके अन्दर वह आदिपुरुष था॥१०॥