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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 92

घट रामायण / ९१
सत्तनाम से उपजा सोई। ऐसे सोला निरगुन होई॥
यह सब पिंड ब्रह्मांड के माईं। सोला निरगुन सुन्न समाई॥
अर्थ-मैं बाइस शून्यों का वर्णन करता हूँ इस शून्य के शून्य स्थान का ठौर ठिकाना इस प्रकार है।
जो जहाँ है, और जिस शून्य का जो स्थान है और उस शून्य का वैसा नामकरण क्यों हुआ है-मैं उन
सबका वर्णन करता हूँ॥
सत्यलोक (एक शून्य है) में सत्यभाव के राजागण हैं-उस समाज का वर्णन रामायण में किया
गया है। उनकी ध्वजा सत्य की है, उनका नाम सत्यकेतु है-उन्हीं से निर्गुंण ब्रह्म उद्भूत हुआ है॥
सोलह निरगुणों को मैंने कहकर बताया है, उनके मैं भिन्न-भिन्न भेदों का वर्णन करता हूँ।
एक शून्य है, एक निर्गुण है, एक निर्गुण शून्य है। चौदह निर्गुण हैं और चौदह शून्य हैं-पन्द्रहवाँ
शून्य भिन्न-भिन्न धर्म रूप है।
सोलहवें शून्य का निरंजन नाम है-और उसको ब्रह्मांड की भाँति रचा गया है। वह सत्यनाम से ही
अवतरित हुआ है-सोलह निर्गुण इसी प्रकार के ही हैं॥
ये सभी पिंड तथा ब्रह्माण्ड के मध्य हैं इस प्रकार सोलह निर्गुंण शून्य में समाये हैं॥
॥ सोरठा ॥
छै सुन बाइस माँहि रहा भेद आगे कही॥
तुलसी निरखि निहार सुन बाइस चढ़ि देखिया॥
अर्थ-बाइस शून्य में इस प्रकार छः शून्य हैं, इनके भेदों को मैं आगे कहता हूँ। तुलसी साहब कहते हैं
कि इन्हें खूब समझ कर देखो। इन बाइस शून्यों के पर चढ़कर इन्हें देखा है॥
॥ मंगल ॥
सुन सुन री सखि, सैन बैन पिय के कहौं।
बोलै मधुरे बोल, चोल चित्त में सहौं॥ १॥
छिन छिन रहौं पिय, पास स्वाँस कहुँ ना रुचै।
जैसे जल बिन मीन, तलफ मन के बिचै॥ २॥
सुन सखि चैन चिनाव, भाव बिधि में मिली।
छूटी तन मन आस, पास पिय के चली॥ ३॥
चौथा भवन भौ पार, सार सुन में गई।
पुनि पंद्रा के पार, सोला सही॥ ४॥
सोला लोक मँझार, तार स्रुति से चखी।
निराकार जहाँ जोति, होत हिये में लखी॥ ५॥
सत्रा सुरति चलि चाल, ताल तट देखिया।
मान सरोवर घाट, हंस तहँ पेखिया॥ ६॥
एक हंस छबि तेज, कोटि रबि राजही।
सोभा भूमि अपार, सो हंस बिराजही॥ ७॥
करि हंसन सँग केल, सैल आगे चलो।